केरल में IUML की सांप्रदायिक राजनीति और कांग्रेस-गांधी परिवार की मजबूरी
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होम विश्लेषण

केरल में IUML की सांप्रदायिक राजनीति और कांग्रेस-गांधी परिवार की मजबूरी

केरल में IUML की सांप्रदायिक राजनीति और वी.डी. सतीशन का बचाव। जिन्ना की मुस्लिम लीग से जुड़ा IUML का इतिहास, वायनाड में गांधी परिवार की निर्भरता और मोपलिस्तान की मांग का खुलासा।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
May 18, 2026, 11:12 am IST
in विश्लेषण, केरल
Kerala IUML congress VD Satishan

आईयूएमएल के समक्ष नतमस्तक होना कांग्रेस की मजबूरी

केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग अपनी योजना में सफल होती दिख रही है। आईयूएमएल ने सबसे पहले अपने पसंद के मुख्यमंत्री का चयन गांधी परिवार और कांग्रेस से वी.डी. सतीशन के रूप में करवाया। इस अहसान को चुकाने के लिए अब वी.डी. सतीशन ने आईयूएमएल की साम्प्रदायिक राजनीति का बचाव करने की जिम्मेदारी का निर्वाह करना शुरू कर दिया है।

आईयूएमएल शीर्ष नेताओं पार्टी के राज्य अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिकली शिहाब थंगल और राष्ट्रीय महासचिव पी.के. कुन्हालीकुट्टी की उपस्थिति में वी.डी. सतीशन ने कहा है कि वो आईयूएमएल को साम्प्रदायिक पार्टी बताने का खुद ही प्रतिकार करेंगे। वी.डी. सतीशन ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा है कि आईयूएमएल की आलोचना करने वालों को एक सेक्युलर और स्थिर करने वाली ताकत के तौर पर पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका को पहचानना चाहिए। पूर्व के कई अवसरों का उदाहरण देते हुए सतीशन ने आईयूएमएल का बचाव करने का प्रयास किया है।

दागदार रहा है आईयूएमएल का इतिहास

आईयूएमएल का इतिहास काफी दागदार रहा है। इसका जन्म मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग से हुआ है। आईयूएमएल का क्रिया कलाप काफी विवादास्पद है। 2019 के बाद आईयूएमएल का महत्व न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के लिए, बल्कि गांधी परिवार के लिए काफी बढ़ गया है या यों कहें कि गांधी परिवार वर्तमान में पूर्णतः आईयूएमएल पर अपना राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए निर्भर हो गई है। 2019 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी के अलावा केरल के वायनाड लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। राहुल गांधी द्वारा वायनाड सीट का चयन पूर्णतः आईयूएमएल के कारण किया गया था। दरअसल, वायनाड लोकसभा सीट पर लगभग एक तिहाई मुस्लिम मतदाता हैं जो आईयूएमएल के इशारे पर मतदान करते हैं। 2024 में राहुल गांधी द्वारा वायनाड और राय बरेली दोनों सीट जीतने के बाद वायनाड सीट को खाली करने के बाद प्रियंका वढेरा द्वारा इस सीट से चुनाव लड़ना गांधी परिवार को और भी आईयूएमएल पर निर्भर बना देता है।

इसे भी पढ़ें: कांग्रेस पर हावी हुई IUML: सतीशन सिर्फ डमी मुख्यमंत्री बनकर रह गए

IUML की सांप्रदायिकता की फेहरिस्त है लंबी

आईयूएमएल के सांप्रदायिक राजनीति की फेहरिस्त काफी लंबी है और सतीशन के समक्ष उसे आँख मूंद कर बर्दाश्त करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। 26 अक्टूबर 2023 को कोझिकोड में आईयूएमएल केरल प्रदेश के अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने अपने भाषण में भारत सरकार पर हमेशा इजरायल का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि जो भी इजरायल के साथ हाथ मिलाता है वह आतंकवाद का समर्थन करता है। दूसरे शब्दों में इजरायल को एक आतंकवादी देश बोलने की कोशिश की गई थी।

इसी रैली में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता और विधायक एम के मुन्नेर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अमर बलिदानी भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना हमास आतंकियों से कर दी थी। जुलाई 2023 में मुस्लिम लीग की युवा शाखा ने केरल के कासरगोड की एक रैली में हिंदुओं के खिलाफ भयंकर भड़काऊ नारे लगाए थे। यूडीएफ सरकार के दौरान इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के शिक्षा मंत्री पी के अब्दुर रब्ब ने अपने आधिकारिक आवास का नाम गंगा से बदलकर ग्रेस कर दिया था।

इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने कक्षा में लड़के और लड़कियां को एक साथ नहीं बैठना चाहिए इनके अलग-अलग क्लासेस होना चाहिए जैसा वक्तव्य भी दिया था। 2015 में मुस्लिम लीग ने अपने मंत्रालय से जुड़े किसी भी कार्यक्रम में दीपक जलाने से इंकार कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार, दीप प्रज्वलन इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ है। वहीं फरवरी 2013 में एक मुस्लिम लीग के एक नेता ने केरल यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट में मुस्लिम सदस्यों के लिए अधिक से अधिक सीटों की मांग करके विवाद खड़ा कर दिया था क्योंकि उसे सांप्रदायिक आधार पर शिक्षा नीति को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा गया था। इसके बावजूद भी गाँधी परिवार को अपने लिए वायनाड लोकसभा सीट बचाये रखने के लिए आईयूएमएल को धर्म निरपेक्ष पार्टी बताना पड़ता है।

कांग्रेस आईयूएमएल की कारस्तानियों पर डाल रही पर्दा

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के कई नेता कहते हैं कि वर्तमान आईयूएमएल का पाकिस्तान बनाने वाली जिन्ना की मुस्लिम लीग से कोई रिश्ता नहीं है। मगर यह हकीकत से मुँह मोड़ने के जैसा या जानबूझ कर ध्यान भटकाने जैसा है। आजादी के पूर्व 40 के दशक की शुरुआत में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग को ताकतवर बनाने की मुहिम चलाई तो उन्हें पूरे दक्षिण भारत में जबरदस्त कामयाबी मिली थी। आज़ादी के पूर्व केरल मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। आजादी से पहले 1945-46 में संविधान सभा और प्रांतीय असेंबली चुनाव में मद्रास प्रेसीडेंसी में 28 सीटें मुसलमानों के लिए रिजर्व की गई थी। मद्रास प्रेसिडेंसी की सभी मुस्लिमों रिज़र्व सीटों पर मुस्लिम लीग जीती थी। साथ ही संविधान सभा के लिए मद्रास प्रेसिडेंसी के सभी तीन रिज़र्व मुस्लिम सीटें भी मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग जीती थी। ये चुनाव परिणाम यह बताने के लिए काफी है कि मुस्लिम लीग की जड़ें केरल और दक्षिण भारत में कितनी गहरी थी।

मद्रास प्रेसिडेंसी से ही जीते थे जिन्ना के तीनों चहेते

संविधान सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी से जिन्ना की मुस्लिम लीग के विजयी तीन उम्मीदवारों में बी. पॉकर साहिब बहादुर और एम मोहम्मद इस्माइल जिन्ना के बहुत खास थे। इन दोनों का संबंध आज के केरल राज्य से था। जिन्ना इन दोनों को दक्षिण भारत में अपनी दो आंखों के समान मानते थे। मगर देश का बंटवारा होने के बाद जिन्ना के ये दोनों विश्वासपात्र पाकिस्तान नहीं गए और भारत में ही रहकर एक बार फिर से जिन्ना की मुस्लिम लीग को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नाम से स्थापित कर दिया। आजादी के महज सात महीने बाद 10 मार्च 1948 को एम मोहम्मद इस्माइल और बी. पॉकर साहिब बहादुर ने मुस्लिम लीग के वैसे नेता जो पाकिस्तान नहीं गए थे उनके साथ एक बैठक वर्तमान चेन्नई के राजाजी हॉल में आयोजित किया। विदित हो कि  मुस्लिम लीग के दक्षिण भारत से चुने गए 28 में से 27 विधायक भारत में ही रहे और सिर्फ एक विधायक अब्दुल सेठ पाकिस्तान गए थे। इतना ही नहीं, बल्कि संविधान सभा के मुस्लिम लीग से तीनों निर्वाचित सदस्य भी भारत में ही रहे।

जिन्ना के चहेतों ने चेन्नई में स्थापित की थी मुस्लिम लीग

चेन्नई के राजाजी हॉल में मुस्लिम लीग का फिर से गठन किया गया और एम मोहम्मद इस्माइल इसके पहले अध्यक्ष चुने गए, जिन्हें कायदे मिल्लत यानी देश के नेता की उपाधि दी गई। मोहम्मद इस्माइल ने पाकिस्तान की तरह ही केरल को भी मोपलिस्तान नाम से एक अलग मुस्लिम देश बनाने की मांग मुस्लिम लीग के मुखपत्र डॉन में 18 जून 1947 को लिखकर किया था। 3 जून 1947 को भारत के बंटवारे की घोषणा होने के 15 दिन बाद मोहम्मद इस्माइल ने यह मांग की थी। मोहम्मद इस्माइल ने मोपलिस्तान बनाने की मांग की थी, क्योंकि उसका मानना था कि मोपला मुस्लिमों की नस्ल हिंदुओं से अलग है और वे अरबों के वंशज हैं। उनके अनुसार, मोपला मुस्लिमों का मजहब ही नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और उनका रहन-सहन इस इलाके के बाकी हिंदुओं से अलग है। मोहम्मद इस्माइल ने अपनी इस मांग के पीछे तर्क दिया था कि मालाबार की कुल आबादी 15 लाख है, जिसमें 9 लाख मोपला मुसलमान हैं और यह इलाका यूरोप के अल्बानिया से भी बड़ा है।

आईयूएमएल की स्थापना के बाद मोहम्मद इस्माइल एक बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार केरल के मंजेरी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। वहीं मुस्लिम लीग के दूसरे बड़े नेता पी बी पोकर बहादुर साहिब मंजेरी और मलप्पुरम लोकभा सीटों से एक-एक बार लोकसभा सांसद चुने गए। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर केरल के सभी दलों कभी कांग्रेस तो कभी कम्युनिस्ट पार्टी का दामन थामती रही है। जिन्ना के करीबी रहे के एम सेठी को 1960 में केरल विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया। जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में जिन्ना के मुस्लिम लीग के सिपहसालारों ने स्वतंत्र भारत में इस तरह का सत्ताशीन हुए थे।

इंदिरा गांधी के शासनकाल में रहे मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री

जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, जिन्होंने देश विभाजन और मुस्लिम लीग की भूमिका को काफी करीब से देखा था उनके कांग्रेस अध्यक्षीय कार्यकाल में 1979 में कांग्रेस के समर्थन से मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री थे। मोहम्मद कोया 1945 में कालीकट में मुस्लिम लीग के जिन्ना के बाद दूसरे बड़े नेता लियाकत अली खान का गर्मजोशी से स्वागत किया था। लियाकत अली खान 1947 में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे। मोहम्मद कोया 1947 में मुस्लिम लीग मलयाली मुखपत्र चंद्रिका में बड़े पद पर कार्यरत थे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कट्टर ही रहे कोया

कांग्रेस के समर्थन से केरल के मुख्यमंत्री लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भी मोहम्मद कोया का मुस्लिम कट्टरपंथी सोच पूर्ववत बना रहा। मोहम्मद कोया ने 30 नवंबर 1979 को इंडिया टुडे मैगजीन को साक्षात्कार दिया था, जिसमें कोया ने कहा था कि अल्पसंख्यकों के सांप्रदायिक संगठन और बहुसंख्यक के सांप्रदायिक संगठन अलग-अलग होते हैं। हम अल्पसंख्यक अपनी सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होते हैं, लेकिन बहुसंख्यक तो कहीं भी अधिकार जमा सकते हैं उन्हें सांप्रदायिक संगठनों की जरूरत ही क्या है?

Topics: गांधी परिवारमुस्लिम लीगवीडी सतीशनराहुल गांधी वायनाड IUMLIUML सांप्रदायिक राजनीति
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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