'चटगांव को भारत में मिलाया जाए' : चकमा ब्लैक डे पर उठी बड़ी मांग, 1947 की ऐतिहासिक भूल सुधारने की अपील!
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‘चटगांव को भारत में मिलाया जाए’ : चकमा ब्लैक डे पर उठी बड़ी मांग, 1947 की ऐतिहासिक भूल सुधारने की अपील!

Chakma Black Day Chittagong: 17 अगस्त को बौद्ध चकमा समुदाय ने 11वां 'चकमा ब्लैक डे' मनाया। 1947 में चटगांव पहाड़ी क्षेत्र को पाकिस्तान को सौंपने को ऐतिहासिक भूल बताते हुए भारत में मिलाने की मांग की।

Written byहेमेन्द्र शर्माहेमेन्द्र शर्मा — edited by Shivam Dixit
Aug 18, 2026, 07:06 pm IST
inभारत, विश्लेषण
Chakma Black Day Buddhist Community Demands Chittagong Hill Tracts Merge With India Panchjanya

हर वर्ष 17 अगस्त को दुनिया भर में फैले चकमा समुदाय के लोग एक ऐसा दिन मनाते हैं, जिसे वे उत्सव नहीं बल्कि शोक और स्मरण दिन के रूप में याद करते हैं – “चकमा ब्लैक डे”। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर मिज़ोरम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में बसे चकमा समुदाय के साथ-साथ बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी क्षेत्र (चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स — CHT) में रहने वाले चकमा और अन्य समुदाय इस दिन को अपने पूर्वजों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की याद में स्मरण करते हैं।

इस वर्ष यह दिवस 11वें चकमा ब्लैक डे के रूप में मनाया गया, जिसमें भारत और बांग्लादेश दोनों जगह चकमा संगठनों ने स्मृति दिवस कार्यक्रम आयोजित किए।

1947 का विभाजन और चकमा समुदाय की त्रासदी

इस दिवस को समझने के लिए हमें 1947 के भारत विभाजन के समय में लौटना होगा। चटगांव पहाड़ी क्षेत्र, जो आज बांग्लादेश का हिस्सा है, उस समय बंगाल प्रांत का एक विशेष क्षेत्रों में से एक था। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से विभाजन पूर्व भारत का सीमावर्ती क्षेत्र था।  यहाँ की लगभग 97 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिम थी, इसमें बौद्ध चकमा, हिंदू और अन्य आदिवासी समुदाय जैसे मार्मा, त्रिपुरी आदि शामिल थे। 15 अगस्त 1947 को जब स्वतंत्रता मिली, तो रंगामाटी में चटगांव पहाड़ी क्षेत्र के हजारों निवासियों ने उत्साहपूर्वक भारतीय तिरंगा फहराया। उनका मानना था कि भौगोलिक निकटता, धार्मिक-सांस्कृतिक समानता और जनसांख्यिकीय आधार पर उनका क्षेत्र स्वाभाविक रूप से भारत का हिस्सा बनेगा। उस समय के ब्रिटिश उपायुक्त कर्नल जी. एल. हाइड ने भी यह पुष्टि की थी कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अंतर्गत चटगांव पहाड़ी क्षेत्र भारतीय अधिराज्य का हिस्सा है।

परंतु दो दिन बाद, 17 अगस्त 1947 को रेडक्लिफ सीमा आयोग के फैसले की सार्वजनिक घोषणा हुई, जिसमें चटगांव पहाड़ी क्षेत्र को नवगठित पाकिस्तान (जो पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश बना) को सौंप दिया गया। इस निर्णय ने चकमा समुदाय की उम्मीदों को झकझोर दिया और यही दिन आज “चकमा ब्लैक डे” के रूप में याद किया जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस बंटवारे पर उस समय भी सवाल उठे थे। 16 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में हुई एक बैठक के दस्तावेज बताते हैं उस समय के जनप्रतिनिधियों ने चटगांव पहाड़ी क्षेत्र को पूर्वी बंगाल को दिए जाने की संभावना पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि यह क्षेत्र एक बहिष्कृत क्षेत्र है, बंगाल परिषद में इसका कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, और यहाँ की आबादी में लगभग 97 प्रतिशत लोग बौद्ध और हिंदू थे। इस क्षेत्र के निवासी भारत का हिस्सा बनना चाहते हैं और धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर भी यह क्षेत्र भारत में शामिल होना तर्कसंगत है। इसके बावजूद, रेडक्लिफ आयोग का अंतिम निर्णय चकमा समुदाय की अपेक्षाओं के विपरीत गया।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर चकमा नेशनल काउंसिल ऑफ इंडिया (CNCI) ने 2016 में गुवाहाटी में आयोजित अपने राष्ट्रीय सम्मेलन में यह निर्णय लिया कि प्रत्येक वर्ष 17 अगस्त को “चकमा ब्लैक डे” के रूप में मनाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी को इस ऐतिहासिक अन्याय की याद दिलाई जा सके और व्यापक जनमानस में इसके प्रति जागरूकता फैलाई जा सके।

चकमा ब्लैक डे 2026

इस वर्ष चकमा ब्लैक डे को 11वें संस्करण के रूप में मनाया गया। इसका मुख्य आयोजन मिज़ोरम स्थित चकमा स्वायत्त जिला परिषद (CADC) के मुख्यालय कमलानगर में हुआ, जहाँ CADC कला एवं संस्कृति भवन में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन चकमा नेशनल काउंसिल ऑफ इंडिया (CNCI) की मिज़ोरम राज्य समिति ने सेंट्रल यंग चकमा एसोसिएशन, सेंट्रल मिज़ोरम चकमा स्टूडेंट्स यूनियन और चकमा महिला समिति के सहयोग से आयोजित किया।

मिज़ोरम के चांगते क्षेत्र में भी चकमा ब्लैक डे मनाया गया : जहाँ CADC के मुख्य कार्यकारी सदस्य निरूपम चकमा स्वयं उपस्थित रहे। भारत के अन्य हिस्सों — त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में बसे चकमा समुदायों — में भी स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे स्मरण कार्यक्रम, मोमबत्ती जलाने के आयोजन और सामुदायिक चर्चाएँ आयोजित की गईं। परंपरागत रूप से यह दिवस बड़े प्रदर्शनों या जनांदोलन के रूप में नहीं बल्कि शांत स्मरण, मौखिक इतिहास की चर्चा और नई पीढ़ी को ऐतिहासिक घटनाओं से अवगत कराने के माध्यम से मनाया जाता रहा है, और 2026 में भी यही परंपरा कायम रही।

नई दिल्ली (भगवान बिरसा मुंडा भवन) : यह कार्यक्रम 1947 के विभाजन के दौरान चकमा समुदाय के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की स्मृति में आयोजित किया गया। आयोजकों के अनुसार, भारत की स्वतंत्रता के दो दिन बाद रैडक्लिफ अवॉर्ड के तहत चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (CHT) को पाकिस्तान में शामिल कर दिया गया, जबकि वहां लगभग 98.5% आबादी गैर-मुस्लिम थी और स्थानीय लोगों की इच्छा इसके विपरीत थी। चकमा तथा अन्य स्वदेशी समुदायों की मांग है कि चटगांव हिल ट्रैक्ट्स को भारत का अभिन्न हिस्सा माना जाए।

CNCI के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. निरूपम चकमा ने 16 अगस्त 1947 की नई दिल्ली बैठक के कार्यवृत्त का हवाला देते हुए नेहरू की आपत्ति और उनके तर्कों को दोहराया। उन्होंने इस निर्णय को चकमा और अन्य आदिवासी समुदायों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में एक गहरी दरार बताया। उन्होंने अपने इतिहास और मूल दस्तावेजों का अध्ययन करने का आवाहन किया साथ ही अपनी भाषा, साहित्य, संगीत, नृत्य और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखने का भी आवाहन किया। उन्होंने समुदाय से एकजुट रहने और शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक माध्यमों से अपनी आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने का आग्रह किया।

चटगाव को भारत मे मिलाने की अपील

भारत के चकमा नेताओं के एक समूह ने केंद्र सरकार से बांग्लादेश को डीजल और बिजली की सप्लाई रोकने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने 1947 में चटगांव हिल ट्रैक्स को पाकिस्तान को सौंपने को “ऐतिहासिक गलती” बताते हुए इसे भारत में मिलाने की वकालत की है। चकमा नेतृत्व ने यह इच्छा भी व्यक्त की कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) जैसे वैश्विक मंच पर ले जाया जाए, ताकि इस ऐतिहासिक दावे को कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल सके। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदाय डर के माहौल मे जी रह हे इसी के चलते चटगांव पहाड़ी इलाकों में बौद्ध भिक्षुओं ने 2,500 साल पुरानी सालाना परंपरा ‘Kathin Chivar Dana’ नहीं मनाई।

 

चकमा ब्लैक डे केवल एक ऐतिहासिक तिथि का स्मरण भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे समुदाय की पहचान, स्मृति और आकांक्षा की कहानी है जो विभाजन की राजनीतिक प्रक्रिया में हाशिए पर छूट गया। 11वें चकमा ब्लैक डे ने एक बार फिर यह दिखाया कि यह समुदाय अपने इतिहास को भुलाने के बजाय उसे संजोए रखना चाहता है, और शांतिपूर्ण, संवैधानिक तरीकों से अपनी सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयासरत है। जबकि भारत में विलय की पुरानी मांग आज भी समुदाय की सामूहिक चेतना में जीवित है।

Topics: Panchjanya newsChakma Black DayChittagong Hill TractsCNCI MizoramRadcliffe Line 1947Bangladesh Minority News
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