America के खिलाफ अब Iran ने खोला Online मोर्चा, AI से बने वीडियो और पोस्ट से जनमत को कर रहा प्रभावित
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America के खिलाफ अब Iran ने खोला Online मोर्चा, AI से बने वीडियो और पोस्ट से जनमत को कर रहा प्रभावित

इस ईरानी दुष्प्रचार अभियान का मुख्य उद्देश्य अमेरिका में युद्ध-विरोधी भावनाओं को भड़काना और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव डालकर इस संघर्ष को समाप्त कराना है।

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Mar 26, 2026, 07:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
Representational Image

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अमेरिका—इस्राएल और ईरान के बीच युद्ध सिर्फ आसमान में यहां से वहां उड़ती बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों के माध्यम से ही नहीं हो रहा है। अब ईरान सोशल मीडिया की ताकत का इस्तेमाल कर युद्ध को लेकर भ्रामकता फैलाने में जुटा है। इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि ईरान एआई की मदद से भ्रमक तस्वीरें और वीडियो साझे करके अपने हमलों की ‘कामयाबी’ से अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। यह ऑनलाइन वॉर अब एक नए मोड़ पर जा पहुंची है जिसमें एआई का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है।

ईरानी शासन ने विशेष तौर पर एआई से बनी तस्वीरें, वीडियो और मीम्स का उपयोग कर ऑनलाइन अभियान चलाया हुआ है। इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य अमेरिका में युद्ध-विरोधी भावनाओं को भड़काना और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव डालकर इस संघर्ष को समाप्त कराना है।

गत 28 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी करके घोषणा की थी कि अमेरिका और इस्राएल ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए हैं। इसके फौरन बाद मध्य पूर्व में युद्ध भड़क उठा। लेकिन साथ ही एक ऑनलाइन सूचना युद्ध भी शुरू हुआ था जो अधिकांशत: मीडिया की नजरों से छुपा ही रहा। विश्लेषकों का कहना है कि इसमें एआई से बनाई सामग्री प्रमुख रूप से जारी की गई है। ये फोटो और वीडियो युद्ध के बारे में फर्जी खबरें फैला रहे हैं।

दक्षिण कैरोलिना के क्लेम्सन विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका और इस्राएल के हमले शुरू होने के 24 घंटे के अंदर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़े दर्जनों सोशल मीडिया खाते एकाएक सक्रिय हो गए थे। इनमें युद्ध संबंधी ईरानी प्रचार सामग्री पोस्ट की गई, जो लाखों लोगों तक पहुंची। सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सामग्री में ट्रंप का मजाक उड़ाते एआई वीडियो शामिल हैं, जो लेगो मूवीज और टेलीटुबीज जैसे पश्चिमी मीडिया का हवाला देते हैं। साथ ही, इस्राएल और खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों के कथित विनाश को दिखाने वाले एआई वीडियो और तस्वीरें भी वायरल की गईं।

विश्वविद्यालय के मीडिया फॉरेंसिक हब के सह-निदेशक डैरन लिनविल कहते हैं, “ये मीम्स और कार्टून असली न लगने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन ‘पॉलिटिकल मैसेज’ फैलाने में बहुत प्रभावी रहते हैं।” डीपफेक असलियत का एक अलग संस्करण पेश करते हैं, जिसमें ईरान को संघर्ष में अधिक ‘सफल’ दिखाया गया है। ये डीपफेक युद्ध-विरोधी सोच रखने वालों में तेजी से फैल रहे हैं।

राजनीतिक रूप से विभाजनकारी
क्लेम्सन अध्ययन में जांचे गए सोशल मीडिया खाते पहले भी ईरानी दुष्प्रचार अभियानों में इस्तेमाल हो चुके हैं। ये पश्चिम में ईरानी हितों को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय दरार का फायदा उठाते थे। उदाहरण के लिए, हाल की अमेरिकी आप्रवासन नीति। इनसे इसकी आलोचना जैसी राजनीतिक रूप से विभाजनकारी सामग्री पोस्ट की जाती थीं।

ईरान एआई की मदद से भ्रमक तस्वीरें और वीडियो साझे करके अपने हमलों की ‘कामयाबी’ से अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है

युद्ध शुरू होते ही ये खाते एक्स (पूर्व ट्विटर), इंस्टाग्राम और ब्लूस्काई जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ‘युद्ध प्रचार मोड’ में चले गए। इससे पता चलता है कि ईरान ने सोशल मीडिया रणनीति को एकदम से बदल दिया। पिछले करीब एक महीने में संघर्ष बढ़ने के साथ ईरान ने राज्य मीडिया और प्रॉक्सी के जरिए अमेरिकी लोगों को ‘टारगेट’ किया।

लिनविल आगे कहते हैं, “ईरानी शासन अमेरिका और इस्राएल के लिए संघर्ष को दर्दनाक बनाना चाहता है। अगर वे ट्रंप और नेतन्याहू के पीछे जुटे समर्थन को निशाना बना पाए, तो युद्ध छोटा हो सकता है।”

अमेरिका में मध्य पूर्व में सैन्य दखल की आलोचना के लिए एक बड़ा दर्शकवर्ग उपलब्ध है। मार्च के मध्य में इप्सोस पोल में 58 फीसदी अमेरिकियों ने ईरान पर अमेरिकी हमलों का विरोध दर्ज कराया था, जबकि 78 फीसदी जमीन पर सैनिक भेजने के खिलाफ थे।

कई मामलों में ईरान को मूल या फर्जी सामग्री बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। उदाहरण के लिए उसने अमेरिकी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के पूर्व प्रमुख, जो केंट के युद्ध-विरोध में इस्तीफे पर हुए साक्षात्कार के अंश ईरानी राज्य मीडिया के हैंडल से वायरल किए थे।

सच के पीछे छुपा झूठ
नॉटिंघम ट्रेंट विश्वविद्यालय की अपराधशास्त्र की वरिष्ठ व्याख्याता टाइन मुंक कहती हैं कि एआई वीडियो भावनाओं से सीधे जुड़ते हैं और तेजी से फैलते हैं। ये सांस्कृतिक संदर्भों से उलझन भरे विचारों को आसानी से व्यक्त करते हैं, जबकि वो भले फर्जी हों।”

लेकिन कई फोटो और वीडियो, जो जमीनी घटनाओं को दिखाने का दावा करते हैं, को पहचान पाना मुश्किल होता है। सूचना युद्ध विश्लेषक ताल हागिन एक्स पर इन्हें ट्रैक कर रहे हैं, जहां युद्ध को लेकर ‘डिसइंफॉर्मेशन’ का बोलबाला है। इनमें इस्राएल और खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों के सैकड़ों उदाहरण हैं, जो साल पुराने, दूसरे देशों के या एआई से बने हैं।

हागिन कहते हैं, “28 फरवरी को तेल अवीव पर हमला हुआ था। उसके वीडियो और फोटो रोज नए हमलों के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। यह रणनीति प्रभावी है क्योंकि शुरुआती हमला असल में हुआ था। फिर उस सच के पर्दे में ढेर सारा झूठ मिलाया जाता है, जिससे लोग सच्चाई भूल जाते हैं।”

इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग की सूचना संचालन विशेषज्ञ मेलानी स्मिथ कहती हैं, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फर्जी सामग्री को लेबल करने या हटाने की गारंटी पर खरे नहीं उतरते। लाखों व्यूज के बाद ही किसी सामग्री में एआई का प्रयोग साबित किया जाता है।”

अमेरिका और इस्राएल के हमले शुरू होने के 24 घंटे के अंदर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़े दर्जनों सोशल मीडिया खाते एकाएक सक्रिय हो गए थे

सूचनाओं का मैदानेजंग
मध्य पूर्व संघर्ष ऐसा पहला संघर्ष नहीं जिसमें वायरल वीडियो और मीम्स हथियार बनाए गए हैं। यूक्रेन भी रूस के खिलाफ इस चीज का इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन एआई से युद्ध प्रचार का यह नया स्वरूप है। स्मिथ कहती हैं, “यह पहला संघर्ष है जहां एआई से बनी सामग्री जानबूझकर जमीनी घटनाओं को लेकर भ्रम फैलाने के लिए इस्तेमाल हो रही है।” स्मिथ के अनुसार, इससे “एक बड़ा सूचना शून्य बनता है, जिसे सिंथेटिक सामग्री, प्रचार और अराजकता से भरा जा रहा है।”

एक अन्य विशेषज्ञ का कहना है कि ईरान सैन्य रूप से हमेशा हावी नहीं रह सकता, इसलिए धारणाओं को शक्ल देकर वह संदेह और अनिश्चितता पैदा कर रहा है। ट्रंप ने ईरान पर एआई-जनित ‘फेक न्यूज’ को ‘डिसइंफॉर्मेशन’ हथियार बताया ही है। हालांकि व्हाइट हाउस ने खुद ईरान हमले के वास्तविक फुटेज के साथ ‘एक्शन मूवीज’ और वीडियो गेम्स के क्लिप्स वाला एक विवादास्पद एआई वीडियो शेयर किया।

Topics: propagandaIranisraelkhameineiaiDeepfakecyber warsocial mediafake imagesAmericairan armywartrump
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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