उम्मा की दीवार और राष्ट्रहित : क्यों इस्लामिक देश भी मजहब से ऊपर 'देश' को चुन रहे ? भारत के लिए इसके क्या मायने
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उम्मा की दीवार और राष्ट्रहित : क्यों इस्लामिक देश भी मजहब से ऊपर ‘देश’ को चुन रहे ? भारत के लिए इसके क्या मायने

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तथाकथित “उम्मा” की अवधारणा व्यवहारिक रूप में बहुत सीमित है। इस्लामिक देश स्वयं विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Mar 19, 2026, 09:45 pm IST
inमत अभिमत

अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है, बल्कि इसने वैश्विक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप तेल और गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है और पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितता की ओर बढ़ रही है। लेकिन इस संघर्ष का एक दूसरा पहलू भी है-यह हमें एक मूलभूत सत्य की याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्र अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं, न कि केवल धार्मिक या वैचारिक एकता के आधार पर।

भारत के लिए यह केवल एक बाहरी घटना नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मचिंतन का अवसर है-विशेषकर राष्ट्रीय एकता, पहचान और जिम्मेदारी के संदर्भ में।

विभाजन की विरासत और मूल समझ

1947 में भारत का विभाजन इस आधार पर हुआ कि मुस्लिमों के लिए एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण किया जाए। इसके बावजूद, एक बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी ने भारत में रहना चुना और देश की बहुलतावादी, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास जताया। इस निर्णय के पीछे एक गहरी और महत्वपूर्ण भावना निहित थी कि भारत में रहने वाले सभी नागरिक, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखेंगे। यह अपेक्षा थी कि धार्मिक पहचान कभी भी राष्ट्रीय हितों से ऊपर नहीं रखी जाएगी। यह समझ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी।

वैश्विक वास्तविकता: राष्ट्र पहले, धर्म बाद में

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तथाकथित “उम्मा” की अवधारणा व्यवहारिक रूप में बहुत सीमित है। इस्लामिक देश स्वयं विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे के विरोध में खड़े दिखाई देते हैं। मध्य पूर्व के हालिया घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि जब राष्ट्रीय हित और धार्मिक पहचान के बीच चयन करना होता है, तो अधिकांश देश राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हैं। यह भारत के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि राष्ट्रीय पहचान ही सर्वोच्च होनी चाहिए।

भारतीय संदर्भ: धारणा, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी

भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में केवल वास्तविकता ही नहीं, बल्कि धारणा (perception) भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जब समाज का कोई वर्ग अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ऐसा रुख अपनाता है, जो देश की व्यापक जनभावना से मेल नहीं खाता, तो इससे अनावश्यक दूरी और संदेह उत्पन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि इज़राइल ने कठिन समय में भारत का साथ दिया है। ऐसे में उसके खिलाफ सार्वजनिक विरोध, विशेषकर उन मुद्दों पर जो सीधे भारत के हितों से जुड़े नहीं हैं, कई लोगों को असंगत प्रतीत होता है।

इसी प्रकार, जब पाकिस्तान, बांग्लादेश या कश्मीर में हिंदू समुदाय के खिलाफ घटनाएं सामने आती हैं और उन पर समान स्तर की प्रतिक्रिया नहीं दिखती, तो इससे यह धारणा बनती है कि संवेदनशीलता चयनात्मक है। यही चयनात्मकता संदेह को जन्म देती है-चाहे वह पूरी तरह सही हो या न हो।

अवैध प्रवासन: भावनाओं से परे एक कठोर यथार्थ

बांग्लादेश और म्यांमार (रोहिंग्या) से होने वाला अवैध प्रवासन भारत के सामने एक गंभीर चुनौती है। यह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। भारत पहले से ही जनसंख्या दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में अवैध प्रवासियों की उपस्थिति रोजगार के अवसरों और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
एक व्यावहारिक पहलू यह भी है कि अवैध प्रवासी कम वेतन पर काम करने को तैयार होते हैं, जिससे स्थानीय कामगारों—विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों—की प्रतिस्पर्धा और बढ़ जाती है। इसका सीधा प्रभाव भारतीय मुस्लिम समुदाय पर भी पड़ता है।

इसलिए, अवैध प्रवासन के खिलाफ कार्रवाई को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक आवश्यकता के रूप में देखना चाहिए। इस दिशा में प्रशासन के साथ सहयोग करना सामूहिक हित में है।

एकीकरण: पहचान को मिटाना नहीं, उसे सशक्त करना

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में एकता है। यहां एकीकरण का अर्थ किसी की पहचान को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे राष्ट्रीय ढांचे के साथ जोड़ना है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्हें किसी एक समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक महान भारतीय के रूप में सम्मान मिला। उनकी राष्ट्रनिष्ठा ने उन्हें सभी सीमाओं से ऊपर उठा दिया।

यह दिखाता है कि जब राष्ट्रीय पहचान प्राथमिक होती है, तो बाकी सभी पहचान अपने आप सम्मानजनक स्थान पा लेती हैं।

साझा भविष्य की दिशा

वर्तमान वैश्विक संघर्ष हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—कि स्थिरता, सम्मान और प्रगति का आधार केवल राष्ट्रहित में निहित है। भारत के संदर्भ में यह समय किसी एक समुदाय के लिए परीक्षा का नहीं, बल्कि अवसर का है- एक ऐसा अवसर, जिसमें सभी नागरिक मिलकर अपनी राष्ट्रीय पहचान को और मजबूत कर सकते हैं। भारतीय मुस्लिम समुदाय के लिए भी यह एक सकारात्मक अवसर है-अपने योगदान, अपनी भागीदारी और अपनी निष्ठा को और स्पष्ट रूप से स्थापित करने का। अंततः, राष्ट्रहित कोई विभाजनकारी विचार नहीं, बल्कि वह साझा मंच है, जिस पर खड़े होकर भारत अपनी विविधता के साथ आगे बढ़ सकता है।

 

Topics: भारत का विभाजन 1947कूटनीति और राष्ट्रहितसामाजिक समरसताईरान-इजराइल युद्धभारतीय राष्ट्रीय एकताराष्ट्रवाद और इस्लामअवैध प्रवासन की चुनौतीरोहिंग्या समस्याडॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्रेरणा
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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