धरहरा गांव : ‘बिरवा बिटिया का’
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धरहरा गांव : ‘बिरवा बिटिया का’

धरहरा गांव में बेटी के जन्म पर लगाए जाते हैं पेड़। इसके जरिए संदेश यह दिया जाता है कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और इतना सक्षम बनाओ कि उसे जिंदगी भर किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता न पड़े

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Mar 19, 2026, 12:07 pm IST
in भारत, विश्लेषण, बिहार

बिहार में भागलपुर जिले के गोपालपुर प्रखंड में गंगा नदी से उत्तर धरहरा नामक गांव है। जिला मुख्यालय से लगभग 33 किमी. और नवगछिया रेलवे स्टेशन से करीब 5 किमी. दूर स्थित इस गांव की चर्चा पूरी दुनिया में होती है। बता दें कि गांव के लोग बेटी के जन्म पर पेड़ लगाते हैं। जिसकी जितनी क्षमता वह उतना पेड़ लगाता है। जिस व्यक्ति के पास पेड़ लगाने के लिए अपनी जमीन नहीं है, वह गांव की ठाकुरबाड़ी की जमीन पर पेड़ लगाता है।

पुत्री और पर्यावरण बचाने के इस अद्भुत प्रयोग की जानकारी प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक पहुंची तो वे अपने को रोक नहीं सके। वे 2010 में विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के अवसर पर पहली बार धरहरा पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों के इस काम की सराहना की और 2013 तक हर वर्ष पर्यावरण दिवस इसी गांव में मनाया।

गांव का क्षेत्रफल लगभग 1,200 एकड़ है। इनमें से करीब 500 एकड़ पर पूरी तरह फलदार पेड़ लगे हैं। इनके अलावा पूरे गांव में कीमती लकड़ी वाले पेड़ इतने हैं कि बाहर से गांव का एक भी घर दिखाई नहीं देता, जबकि गांव में करीब 550 घर हैं। गांव के निवासी मुकेश कुमार सिंह कहते हैं, ”गांव में बेटी के जन्म पर पेड़ लगाने की प्रथा बहुत पुरानी है। इसकी शुरुआत हमारे बड़े-बुजुर्गों ने ही की थी। बेटी की पढ़ाई और विवाह के लिए फलदार पेड़ (आम, अमरूद, लीची, बेल आदि) और सागवान, शीशम जैसे महंगे पेड़ लगाए जाते हैं।” बता दें कि मुकेश ने 2010 में बेटी के जन्म पर 250 पेड़ लगाए थे।

एक अन्य ग्रामीण विजय सिंह ने बताया, ”बेटी के नाम पर लगाए गए फलदार पेड़ों से सालभर में जो आमदनी होती है उसे उसी के नाम से जमा रखा जाता है। वह राशि उसकी पढ़ाई और विवाह में खर्च की जाती है। सागवान और शीशम जैसे पेड़ बेटी के विवाह के समय बेचे जाते हैं और पुराने वृक्ष की जगह नए पेड़ अवश्य लगाए जाते हैं।” ग्रामीण सौरभ कुमार सिंह कहते हैं,”हमारे बुजुर्गों ने जो राह दिखाई है, उस पर हम सभी चल रहे हैं। यह राह है बेटी रूपी शक्ति का सम्मान करना, उसको सशक्त बनाना और उसके अंदर वह आत्मविश्वास भरना, जो उसके पूरे जीवन में काम आए।”

गांव की नीलम सिंह कहती हैं, ”धरहरा में प्रकृति और लड़की की प्रधानता है। गांववासी जितने प्रकृति-पूजक हैं, उतने ही लड़की-पूजक हैं। हम लोग प्रकृति की पूजा इसलिए करते हैं कि इसके बिना जीवन संभव नहीं और लड़की की पूजा इसलिए करते हैं कि यह शक्ति की प्रतीक है।”

धरहरा में केंचुआ खाद का भी चलन खूब है। ग्रामीण रासायनिक खाद की जगह केंचुआ खाद अधिक उपयोग कर रहे हैं। गांव में एक ठाकुरबाड़ी भी है, जिसके परिसर में भव्य शिवालय, पार्वती जी का मंदिर और ठाकुर जी का सुंदर दरबार है। ठाकुरबाड़ी के पास लगभग पांच एकड़ जमीन है। जिन ग्रामीणों के पास बेटी के जन्म पर पेड़ लगाने के लिए जमीन नहीं है, वे ठाकुरबाड़ी की जमीन पर पेड़ लगाते हैं। ऐसे ही पेड़ों की आय से ठाकुरबाड़ी का खर्च पूरा होता है।

Topics: सांस्कृतिक परंपराबेटी पढ़ाओधरहरा गांवठाकुरबाड़ीगंगा नदीकेंचुआ खादजैविक खेतीगोपालपुर प्रखंडमहिला सशक्तिकरणकन्या जन्मोत्सवपर्यावरण संरक्षणशक्ति का प्रतीकआत्मनिर्भरताप्रकृति-पूजकबेटी बचाओसामूहिक सहयोगपाञ्चजन्य विशेषगुरु हमारे गांव
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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