पिपलांत्री गांव : बगिया बिटिया सी
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पिपलांत्री गांव : बगिया बिटिया सी

पिपलांत्री का नाम आज देश-विदेश में उस गांव के रूप में लिया जाता है, जिसने 'बेटी बचाओ और वृक्ष लगाओ' के संदेश को एक सामाजिक आंदोलन बना दिया। कभी बंजर और पथरीले इलाके के रूप में पहचाने जाने वाला यह गांव आज हरियाली, सामाजिक जागरूकता और सामूहिक संकल्प की मिसाल बन चुका है

Written byडॉ. ईश्वर बैरागीडॉ. ईश्वर बैरागी
Mar 17, 2026, 01:23 pm IST
in भारत, विश्लेषण, पर्यावरण, राजस्थान
ग्रामीणों द्वारा लगाया गया जंगल

ग्रामीणों द्वारा लगाया गया जंगल

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित पिपलांत्री गांव संगमरमर खदानों वाले क्षेत्र में बसा है। खनन के कारण यहां लंबे समय तक पर्यावरण प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याएं बनी रहीं। करीब ढाई दशक पहले तक गांव की स्थिति देश के कई अन्य गांवों जैसी ही थी गरीबी, अशिक्षा, गंदगी, नशा, झगड़े-विवाद और पानी की कमी जैसी समस्याओं से लोग जूझ रहे थे। लगातार कम बारिश के कारण अकाल जैसे हालात भी बनते रहते थे। अब गांव की स्थिति बदल गई है। इसका श्रेय पूर्व सरपंच और पद्मश्री श्यामसुंदर पालीवाल को जाता है।

2004 में सरपंच बनने के बाद उन्होंने कुछ युवाओं को साथ लेकर पानी, सफाई और बिजली जैसे बुनियादी मुद्दों पर काम शुरू किया। स्वच्छता अभियान की शुरुआत उन्होंने खुद हाथ में झाड़ू लेकर की। यह देखकर ग्रामीणों में भी जिम्मेदारी की भावना जागी और लोग अपने घरों और गलियों की सफाई में जुट गए। गांव के चौराहों पर कचरा पात्र लगाए गए और स्वच्छता समितियों का गठन किया गया। धीरे-धीरे गांव में स्वच्छता और जागरूकता का माहौल बना। लोगों में प्रेरणा का भाव बना रहे, इसके लिए गांव में महाराणा कुंभा, पृथ्वीराज चौहान और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरुषों की प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं।

पिपलांत्री की सबसे बड़ी पहचान बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की परंपरा है। बेटी के जन्म को गांव में उत्सव की तरह मनाया जाता है और उसी खुशी में पूरे गांव की भागीदारी से 111 पौधे लगाए जाते हैं। इन पेड़ों की देखभाल भी बेटी की तरह ही की जाती है। इस पहल के दो बड़े परिणाम सामने आए। पहला, समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ। दूसरा, गांव और आसपास के क्षेत्र में हजारों पेड़ लगने से पर्यावरण में सुधार हुआ। बेटी के जन्म पर माता-पिता से एक शपथ पत्र भी भरवाया जाता है, जिसमें बेटी को शिक्षा दिलाने, उसकी शादी कानूनी उम्र में करने और लगाए गए पेड़ों की देखभाल करने का संकल्प शामिल होता है।

इस अनूठी पहल की शुरुआत एक व्यक्तिगत पीड़ा से हुई। श्यामसुंदर पालीवाल की छह वर्षीया बेटी का निधन हो गया था। इस दुखद घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने तय किया कि बेटियों के प्रति समाज की सोच बदलनी होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर नियम बनाया कि बेटी प्रकृति का वरदान है, इसलिए उसके जन्म पर 111 पेड़ लगाए जाएंगे। इस परंपरा ने देखते-ही-देखते गांव की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी।

गांव में दिवंगत लोगों की स्मृति में 11 पेड़ लगाने की भी परंपरा है। पिछले बीस वर्ष में ग्रामीणों ने लाखों पेड़ लगाए हैं। इनमें फलदार, छायादार और औषधीय पौधे शामिल हैं। इन पेड़ों के कारण गांव के आसपास की पहाड़ियां हरियाली से ढक गई हैं। रक्षा बंधन के अवसर पर ग्रामीण इन पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी सुरक्षा का संकल्प भी लेते हैं। पिपलांत्री में जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया। इससे भूजल स्तर में सुधार हुआ। जो जलस्तर पहले करीब 500 फीट नीचे चला गया था, वह घटकर लगभग 20 फीट तक आ गया। कुंओं में पानी आने लगा तो खेती भी बेहतर होने लगी और किसानों की आय बढ़ी। श्याम सुंदर पालीवाल कहते हैं, ”पृथ्वी पर जीने का अधिकार केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि सभी जीवों को है।

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