भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट जज खुद करेंगे परिसर का मुआयना, 2 अप्रैल से शुरू होगी सुनवाई
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भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट जज खुद करेंगे परिसर का मुआयना, 2 अप्रैल से शुरू होगी सुनवाई

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में बड़ा फैसला सुनाया। जज 2 अप्रैल 2026 से पहले स्थल का निरीक्षण करेंगे, कोई पक्ष मौजूद नहीं रहेगा। ASI रिपोर्ट और इतिहास की पूरी जानकारी।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Mar 17, 2026, 09:54 am IST
inमध्य प्रदेश
धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला

धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर चल रहे विवाद के बीच मध्य प्रदेश की इंदौर बेंच ने कहा है कि इस मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करने से पहले जज खुद ही इस परिसर का मुआयना करेंगे। जजों का कहना है कि मामले में इतने सारे विवाद और तकनीकी बातें हैं कि उन्हें बिना खुद देखे समझना मुश्किल है।

क्या है कोर्ट का फैसला

भोजशाला मामले को लेकर एक दिन पहले सुनवाई करते हुए इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनवाई की। जजों ने अपने फैसले को लेकर कहा कि 2 अप्रैल 2026 से पहले वो विवादित जगह पर जाएंगे और खुद देखेंगे कि वहां क्या-क्या है। इस दौरान दौरे के वक्त कोई भी पक्ष (हिंदू या मुस्लिम) मौके पर मौजूद नहीं रहेगा। कोर्ट ने साफ कहा, “हम सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका देंगे।”

ASI की टीम कर चुकी है सर्वे

गौरतलब है कि ये पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। ASI ने यहां पहले भी वैज्ञानिक सर्वे किया था, जो काफी लंबा चला। सर्वे के बाद पुरातत्व विभाग ने 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की गई थी। ASI की रिपोर्ट में कहा गया था कि परमार काल की एक बड़ी इमारत यहां पहले से मौजूद थी। मौजूदा ढांचे में प्राचीन मंदिरों के हिस्से दिखते हैं– जैसे सजाए हुए खंभे, स्तंभ, मूर्तियों के टुकड़े, शिलालेख और नागकर्णिका जैसे नक्काशीदार हिस्से। इससे ये स्पष्ट होता है कि भोजशाला असल में कमाल मौला मस्जिद नहीं, बल्कि सरस्वती मंदिर था।

इसे भी पढ़ें: बरेली में अफजार ने बच्चों के सामने बीवी को गोदा, फिर सास-साले को मार डाला – पंचायत बनी कत्लखाना

भोजशाला ही था सरस्वती मंदिर

भोजशाला ही ‘सरस्वती मंदिर’ था। इस बात का दावा पूर्व पुरातत्वविद के के मुहम्मद ने कुछ साल पहले ही किया था। उनका कहना था कि भोजशाला, जिसे मुस्लिम पक्ष ‘कमल मस्जिद’ असल में वो कोई मस्जिद नहीं, बल्कि सरस्वती मंदिर था। लेकिन बाद में इस्लामवादियों ने इस्लामी इबादतगाह में बदल दिया।

केके मुहम्मद पूजा स्थल अधिनियम 1991 का हवाला देते कहते हैं कि इस कानून के तहत किसी भी धार्मिक स्थल की स्थिति आधार वर्ष 1947 निर्धारित है। उस वर्ष में अगर ये एक मंदिर था तो ये मंदिर ही रहेगा और अगर ये मस्जिद था तो ये मस्जिद ही रहेगा।

क्या कहता है इतिहास

भारतीय इतिहास में परमारवंशीय राजा भोजदेव (संक्षिप्त नाम राजा भोज) का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। राजा भोज का शासनकाल 1000 से 1055 ई. तक रहा। वे मालवा स्थित उज्जयिनी (अब उज्जैन) के महान राजा विक्रमादित्य की वंश परंपरा के 11वें राजा थे। राजा भोज के शासनकाल के पूर्व यहां की राजधानी उज्जयिनी हुआ करती थी, जिसे राजा भोज ने अपने शासन काल के दौरान धार में स्थानांतरित कर दिया था।

राजा भोज चूंकि कला एवं शिक्षा के रक्षक थे, इसलिए उन्होंने अपने शासनकाल में कई जगहों पर ‘भोजशालाओं’ की स्थापना की। उनमें धार स्थित भोजशाला विश्वविख्यात है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि भोजशाला दो शब्दों से मिलकर बना है- भोज एवं शाला। अर्थात् राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। मगर यह केवल बच्चों की शाला नहीं थी, बल्कि एक असाधारण विश्वविद्यालय था, जहां अध्ययन के लिए देश-विदेश से भी छात्र आया करते थे।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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