‘सक्षम और समर्थ गांव भारत को बनाएंगे विश्व गुरु’ -डॉ. दिनेश
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‘सक्षम और समर्थ गांव भारत को बनाएंगे विश्व गुरु’ -डॉ. दिनेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित 'ग्राम विकास योजना' के माध्यम से स्वावलंबन, स्वदेशी, जैविक खेती, रोजगार, संस्कृति संरक्षण, जल संरक्षण, पर्यावरण की देखभाल आदि विषयों पर कार्य होते हैं। इस योजना के पालक अधिकारी हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 13, 2026, 10:52 pm IST
inभारत, साक्षात्कार
डॉ. दिनेश

डॉ. दिनेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित ‘ग्राम विकास योजना’ के माध्यम से स्वावलंबन, स्वदेशी, जैविक खेती, रोजगार, संस्कृति संरक्षण, जल संरक्षण, पर्यावरण की देखभाल आदि विषयों पर कार्य होते हैं। इस योजना के पालक अधिकारी हैं संघ के वरिष्ठ प्रचारक डाॅ. दिनेश। ये हैं तो आयुर्वेदाचार्य, लेकिन गांव और कस्बों में घूमकर उन समस्याओं की चिकित्सा कर रहे हैं, जिनकी वर्षों से अनदेखी की जा रही थी। पाञ्चजन्य के समाचार संपादक अरुण कुमार सिंह ने डॉ. दिनेश से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि में ग्राम विकास है क्या? इस काम की शुरुआत कब और कैसे हुई?
कहा जाता है कि भारत ग्रामों का देश है। अनेक श्रेष्ठ महापुरुषों ने गांवों के विकास के लिए कार्य किए हैं। महात्मा गांधी, नानाजी देशमुख, अण्णा हजारे जी जैसे महानुभावों ने गांव के विकास पर जोर दिया। ग्राम एक संस्कृति है, ग्राम एक भौगोलिक क्षेत्र भी है। ऐसी ग्राम संस्कृति के विषय को लेकर अनेक प्रकार से लोग काम कर रहे हैं। वर्षों से संघ के स्वयंसेवक भी यह काम कर रहे हैं, लेकिन संगठित और व्यवस्थित रूप से संघ के स्वयंसेवक वर्ष 2000 से ग्राम विकास के लिए निरंतर और प्रभावी कार्य कर रहे हैं।

आपकी दृष्टि में ग्राम विकास की परिकल्पना क्या है?
हमारे देश की भूमि को ‘सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम्’ कहा जाता है। मां रूपी इस भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़े, जल संपदा बचे, क्योंकि इसके सहारे ही हर कार्य हो सकता है। इसलिए भूजल स्तर को ऊपर उठाने का गंभीर प्रयास हो रहा है। तीसरा जीव-जंतुओं का संरक्षण है। वन-संपदा को भी संभालना है। इन्हीं बिदुओं पर केंद्रित है हमारी ग्राम विकास की कल्पना।

ग्राम विकास के कुछ ऐसे उदाहरण बताएं, जहां संघ की सोच साकार हो रही है!
महाराष्ट्र के धुले जिले में बारीपदा गांव है, जो जनजाति-बहुल है। यहां जल संरक्षण का अद्भुत कार्य हो रहा है। चेतराम पवार के नेतृत्व में वहां के लोगों ने जल संकट को दूर करने का बीड़ा उठाया। लोगों ने जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया, तालाबों को संरक्षण दिया। इसका सुपरिणाम यह हुआ है कि आज केवल बारीपदा ही नहीं, आसपास के पांच गांवों को वहां से जल मिल रहा है। पहले बारीपदा के लोग जल संकट से जूझते थे। दूसरा गांव है माखटी। यह देहरादून जिले में है। यह व्यसन-मुक्त गांव है। साथ ही यहां पारंपरिक वृक्षारोपण के जरिए जल स्रोतों को सहेजने का काम हुआ है। छत्तीसगढ़ के चांपा जिले में एक गांव है सोनडीह। यहां व्यसन-मुक्ति, छुआछूत, भेदभाव की समाप्ति के लिए कार्य हुए हैं। इसका प्रभाव आसपास के पांच गांवों में भी हुआ है। सोनडीह 50 परिवारों का गांव है। सोनडीह और उसके पास के गांव के लगभग तीस लोग सेना में हैं। तो वहां रोजगार भी है, जीवन दृष्टि भी है। ऐसे ही हरियाणा के सोनीपत जिले में मेहंदीपुर है। यह गांव व्यसन से मुक्त है, विवाद से मुक्त है। यहां रोजगार के भी कई प्रकार के काम चलते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काम हो रहा है। ऐसे गांवों में भूमि संरक्षण, जल संरक्षण, जीव-जंतु संरक्षण, वन संरक्षण, गोवंश की वृद्धि के कार्य स्पष्ट रूप से दिखते हैं।

जल संरक्षण के लिए राष्ट्रपति द्राैपदी मुर्मू से पद्मश्री सम्मान प्राप्त करते चेतराम पवार। कुछ वर्ष पहले इस कार्य के लिए पाञ्चजन्य ने भी श्री पवार को सम्मानित किया है

ग्राम विकास के कार्य में संघ के स्वयंसेवक लगे हैं या फिर गांव के सामान्य लोेग इस काम को करते हैं?
संघ का विचार है कि समाज की समस्याओं का समाधान स्वयं समाज करे। इसलिए सामान्यत: गांव के लोग ही इस प्रकार के कार्य कर रहे हैं। उनका मार्गदर्शन संघ करता है। जिस गांव में संघ की शाखा है, वहां स्वयंसेवक भी लगे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि लोग सरकार की सहायता पर निर्भर न रहकर अपने ग्राम का विकास कर रहे हैं। कई स्थानों पर ग्राम विकास समितियां हैं। यही समितियां कोष आदि का प्रबंध करती हैं। ये लोग कुछ सामाजिक संस्थाओं से मदद लेते हैं और अपने गांव का विकास करते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्राम विकास की कल्पना में गांव के लोगों के द्वारा ही गांव के विकास को प्राथमिकता पर रखा गया है।

अब तक कितने गांवों में इस तरह के कार्य हो रहे हैं?
ऐसे लगभग 8,000 गांव हैं। इन गांवों में हुए कार्यों को देखते हुए इन्हें कई श्रेणियों में बांटा गया है। जो गांव नशे से मुक्त हुए हैं, जहां छुआछूत नहीं है, जहां भेदभाव नहीं है, कोई विवाद नहीं है, ऐसे गांवों को ‘प्रभात गांव’ कहा जाता है। ऐसे गांवों की संख्या 370 है। इन गांवों का निकटवर्ती गांवों में भी प्रभाव है। दूसरी श्रेणी को ‘उदय गांव’ कहते हैं। उदय गांव उन गांवों को कहते हैं, जहां हमने सारे विषयों को जीवंत किया है। ऐसे गांवों की संख्या लगभग 2,000 है। और जहां ऐसे देखने लायक कार्य हुए हैं, उन्हें ‘किरण गांव’ कहते हैं। ऐसे लगभग सवा पांच हजार गांव हैं। कुल मिलाकर लगभग 8,000 गांव ऐसे हैं, जिन्हें संघ के स्वयंसेवकों द्वारा देखने लायक, काम को समझने लायक बनाया गया है।

हरियाणा में ग्रामोत्सव में शामिल लोग

देखने योग्य गांव मतलब?
देखने योग्य गांव यानी गांव जहां कुछ विशेष कार्य हुए हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में लखीमपुर जिले के रवींद्र नगर को ले सकते हैं। इस गांव में कहीं भी पानी के लिए ऊपर नाली नहीं है। सारा का सारा पानी नीचे जाता है, जमीन के अंदर। गांव की आबादी लगभग 5,000 है। गांव का पूरा पानी जमीन के नीचे जाने से उस गांव का भूजल स्तर आसपास के गांवों की तुलना में लगभग दस मीटर ऊपर है। बाकी गांवों में तीस मीटर पर पानी है, तो रवींद्र नगर में दस और बीस मीटर के बीच में पानी है। ऐसे भी गांव हैं, जहां आजादी के बाद से कोई चुनाव नहीं हुआ है। सब लोग मिलकर ही गांव के प्रतिनिधि का चयन कर लेते हैं। दूसरे देखने लायक गांव ऐसे हैं, जहां की समस्याओं का समाधान खुद ही गांव के लोग कर लेते हैं। ऐसे गांवों में एक है- अटल नगर चपरेड़ी। यह गुजरात के कच्छ में है।

संघ की दृष्टि से एक आदर्श गांव क्या हो सकता है?
महामना मालवीय जी कहते थे- ‘ग्रामे ग्रामे सभा कार्या, ग्रामे ग्रामे कथा शुभा। पाठशाला मल्लशाला, प्रति पर्व महोत्सव:।।’ यानी प्रत्येक गांव में सभा का आयोजन हो, प्रत्येक गांव में प्रेरणादायी कथा सुनाई जाए, प्रत्येक गांव में पाठशाला हो, प्रत्येक गांव में व्यायामशाला हो और हर गांव में पर्व-महोत्सव मनाया जाना चाहिए। आदर्श गांव की एक परिभाषा तो यह है। लेकिन जब संघ आदर्श गांव की बात करता है, तो उसमें आर्थिक स्वावलंबन के साथ-साथ यह भी सोच होती है कि-सर्वे भवन्तु सुखिनः। सभी का कल्याण हो, किसी के साथ भेदभाव न हो, छुआछूत न हो, व्यसन-मुक्त हो, विवाद मुक्त हो। कुल मिलाकर शिक्षा, संस्कार, समरसता, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण ऐसे ही विषयों पर जिस गांव में कार्य हो रहा हो, वह आदर्श गांव है।

ग्राम विकास योजना में क्या जैविक खेती भी शामिल है?
बिल्कुल। हम भारतीय कृषि पद्धति को लेकर आगे बढ़ रहे र्हैं। इसी को प्राकृतिक कृषि कहते हैं, जैविक खेती कहते हैं। शब्द अलग-अलग हैं, लेकिन अपनी भारत की पद्धति, जो भूमि की उर्वरा को बनाए रखती थी, ऐसी पद्धति पर भी काम हो रहा है। गो आधारित कृषि पर जोर है।

आपने कहा कि गो-आधारित कृषि पर जोर है, लेकिन लोग गोवंश का पालन करने से बच रहे हैं। चाहे बड़े किसान हों या छोटे किसान, सब खेत की जुताई के लिए ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में क्या गो-आधारित खेती संभव है?
गो-आधारित खेती समाप्तप्राय नहीं है। हां, इसमें थोड़ी कमी आई है। कई जगह गो-आधारित खेती हो रही है। कुरुक्षेत्र में आचार्य देवव्रत जी का गुरुकुल है। वहां कई सौ एकड़ भूमि है, जिस पर गो-आधारित प्राकृतिक कृषि होती है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से पहले जो भूमि बंजर हो गई थी, वह गो-अधारित खेती के जरिए फिर से उर्वर हो गई है। भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाना, भारतीय बीजों का उपयोग करना, खेती में मनुष्य और पशु चालित यंत्रों का उपयोग करना जैसे काम हो रहे हैं। ऊपर से देखने पर लगता है कि यह काम थोड़ा कठिन है, लेकिन कई जगहों पर यह हो रहा है और अच्छे से हो रहा है। जैविक उत्पादों का चलन भी बढ़ा है। चंडीगढ़, इंदौर जेसे शहरों में ऐसे उत्पादों के साप्ताहिक बाजार भी लगते हैं।

आपने प्राकृतिक या जैविक खेती की बात की, आचार्य देवव्रत के गुरुकुल का भी उल्लेख किया। यह काम किसी संगठन या संस्था के जरिए तो हो रहा है, लेकिन किसान के स्तर पर इसका अभाव दिखता है। इस पर क्या कहेंगे?
जैविक खेती पर चार प्रकार से काम हो रहा है। इस काम में कुछ संस्थाएं लगी हैं, जो बड़े पैमाने पर गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जैविक खेती कर रही हैं। इन संस्थाओं में कुछ ऐसी भी हैं, जो संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित हो रही हैं। ये संस्थाएं 5-7 गांवों से लेकर 20-25 गांवों के बीच काम करती हैं। ऐसे ही कुछ धार्मिक संगठन भी इस कार्य को कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कनेरी मठ को ले सकते हैं। यह कोल्हापुर, महाराष्ट्र में है। यह मठ बेलगाम और कोल्हापुर दो जिलों में प्राकृतिक उत्पादों का संरक्षण, संवर्धन, उनको मूल्य ठीक मिले, उनको बाजार मिले जैसे काम कर रहा है। मध्य प्रदेश के बनखेड़ी में कृषि विज्ञान केंद्र है। ऐसे ही तेलंगाना में भी कृषि विज्ञान केंद्र है। ये केंद्र जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

गांव की सबसे बड़ी समस्या है रोजगार। रोजगार नहीं होने के कारण ग्रामीण युवा शहरों की ओर भाग रहे हैं। गांव के लोग शहरों में रिक्शा चला रहे हैं, लेकिन खेती करने से बच रहे हैं! उन्हें लग रहा है कि खेती घाटे का सौदा हो गई है। इस पर आपका क्या कहना है?
ऐसा एक परिदृश्य ऊपर से तो दिखता है, लेकिन जब उसकी गहराई में जाकर देखते हैं, तो कुछ और ही वातावरण दिखता है। गांवों में भी रोजगार के साधन बढ़े हैं। मध्य प्रदेश के धार जिले में सुंदरेल नाम का एक गांव है। शैक्षणिक दृष्टि से वह गांव बहुत ऊंचाई पर है, लेकिन अपवाद के लिए भी गांव के युवा बाहर नहीं जाते। गांव में देसी बीज पर काम होता है, जैविक खेती होती है। गांव में पशुओं का एक साप्ताहिक बाजार है। गांव का एक बैंक है। इस तरह लगभग 500 लोगों को अपने आसपास ही रोजगार उपलब्ध हो रहा है। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद जिले में सिरसखेड़ा नाम का गांव है। यहां के लगभग 250 लोग पिछले चार-पांच साल से अपना ही काम कर रहे हैं। या फिर उन्हें इस ग्राम विकास योजना से इस प्रकार की योग्यता, क्षमता मिली कि वे नौकरी कर रहे हैं। ऐसे ही बिहार के वैशाली जिले में मनुआ नाम का गांव है। पिछले बीस साल से स्वयंसेवकों ने काम करके उस गांव को ऐसा सक्षम बना दिया है कि वहां के लगभग 100 से भी अधिक युवक रेलवे में, सेना में नौकरी कर रहे हैं। ऐसे ही कर्नाटक में गुडीबंडे तहसील है। इसमें लगभग 60 गांव हैं। इन सभी गांवों में स्वावलंबन, शिक्षा, रोजगार आदि के लिए कार्य हो रहे हैं। इस कारण इस तहसील में पलायन न के बराबर है।

हमारी संस्कृति एक तरह से गांव में फलती-फूलती है, लेकिन संस्कृति का क्षरण भी होता दिख रहा है। इसे रोकने के लिए भी कुछ कर रहे हैं?
संघ ने मूल आधार ही अपनी ग्रामीण संस्कृति को माना है। वहीं से काम प्रारंभ होता है। गांव का सामूहिक ग्रामोत्सव, गांव के पारंपरिक उत्सव, गांव की नृत्य शैली, भोजन शैली, उसकी परंपरा को बचाने के प्रयास हो रहे हैं। हमारी संस्कृति में हमारा विज्ञान भी है। उसमें विकास के बहुत सारे सूत्र भी छुपे रहते हैं। इसलिए इन्हें बचाने का पूरा रहता है। स्वदेशी वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के लिए काम हो रहा है। उसके परिणाम भी बहुत अच्छे दिखाई देते हैं। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में भेमई नाम का गांव है। उस गांव में अपनी पारंपरिक रीति-नीति से ही विवाह होते हैं। वाद्य यंत्र भी पारंपरिक बजते हैं। भोजन भी रसायन-मुक्त होता है। गांव के लोगों ने मिलकर गांव को इकाई माना है। इसलिए उन लोगों ने अपनी भूमि की चकबंदी अपने आप की है। इसके अंतर्गत गांव के लोगों को एक से अधिक स्थानों पर बिखरे हुए छोटे-छोटे खेतों (चकों) को आपस में बदलकर, एक या दो स्थानों पर एक ही जगह पर बड़ा भूखंड दिया गया है।

संस्कृत ग्रामों की बड़ी चर्चा है। ऐसे कितने गांव हैं भारत में?
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में झिरी नाम का गांव है। मोहद नाम का एक गांव नरसिंहपुर जिले में है। कर्नाटक में भी एक गांव मत्तूर है। ऐसे कई गांव हैं, जहां संस्कृत को केंद्र में रखकर ग्राम विकास के अच्छे कार्य हो रहे हैं। इन गांवों के लोग संस्कृत में ही वार्ता करते हैं, संस्कृत में ही संवाद करते हैं। इस बहाने इन गांवों का वातावरण पूरी तरह बदल गया है। लोग स्वच्छता पर ध्यान देते हैं, जैविक खेती करते हैं, नशा नहीं करते हैं, विवाद नहीं होते हैं…। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि हमारे गांव सक्षम और समर्थ हो रहे हैं। इन्हीं के आधार भारत फिर से विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है।

Topics: समरसताआदर्श गांवRSSपाञ्चजन्य विशेषआर्थिक स्वावलंबनप्रभात गांवभारतीय कृषि पद्धतिगुरु हमारे गांवजल संरक्षणपर्यावरण संरक्षणशिक्षाग्राम विकास
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