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हिंदू मेधा और ज्ञान-परंपरा का वैश्विक प्रमाण

पश्चिमी उपनिवेशवाद ने हिंदुओं को पिछड़ा बताने का प्रयास किया, जबकि इतिहास और शोध इसके विपरीत हैं। प्‍यू रिसर्च सेंटर के हाल के अध्ययन में अमेरिका में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित पाए गए। यह हिंदू संस्कृति की प्राचीन ज्ञान-परंपरा और शिक्षा के प्रति गहरे सम्मान का प्रमाण है

Written byइन्दुशेखर तत्पुरुषइन्दुशेखर तत्पुरुष
Mar 11, 2026, 09:00 am IST
in विश्लेषण, धर्म-संस्कृति
दिल्ली के महौली में स्थित लाैह स्तंभ

दिल्ली के महौली में स्थित लाैह स्तंभ

नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग की एक प्रसिद्ध कविता है– ‘The White Man’s Burden.’ 1899 में लिखी इस कविता में किपलिंग अंग्रेजों द्वारा गुलाम बनाए गए देशों के लोगों को ‘हाफ-डेविल एंड हाफ-चाइल्ड’ कहता हुआ उनको ‘शिक्षित’ और ‘नियंत्रित’ करने का बोझ गोरे लोगों पर मानता हैं। स्वयं को ‘सफेदपोश देवता’ समझने वाले गोरों का प्रतिनिधि यह कवि यूरोपीय उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद को एक नैतिक कर्तव्य सिद्ध करने का दंभ भरते हुए लिखता है–
Take up the White Man’s burden-
Send forth the best ye breed-
Go bind your sons to exile
To serve your captives’ need;
To wait in heavy harness
On fluttered folk and wild-
Your new-caught, sullen peoples,
Half devil and half child.
यह कविता का प्रथम चरण है। पूरी कविता नस्लवादी दृष्टि को प्रकट करती है। श्रेष्ठता बोध के मारे इन गोरों ने शेष संसार के साथ-साथ भारतवासियों को भी कभी ‘अस्थिर और जंगली’, तो कभी ‘आधे शैतान, आधे बच्चे’ घोषित किया। कभी अशिक्षित और जड़ लोगों का समाज बताया, तो कभी सपेरों, बाबाओं और अंधविश्वासियों से भरा हुआ देश। इस प्रकार, अंग्रेजों के मिथ्या लांछनों और हेय दृष्टि द्वारा भारतीय मेधा को कुचलने का कुचक्र रचा गया, जबकि वास्तविकता इससे विपरीत थी।

प्राचीनकाल से अग्रणी भारतीय मेधा

प्राचीन काल से भारतीय मेधा और प्रतिभा विश्वभर में सदैव अग्रणी रही। यह प्राचीनतम सभ्यता, जो संसारभर में हिंदू संस्कृति के नाम से जानी-पहचानी गई, ज्ञान-विज्ञान और शोध-शिक्षण के क्षेत्र में संसार की अग्रसर रही है। इसका अकाट्य साक्ष्य प्रख्यात गांधीवादी चिंतक धरमपाल जी की पुस्तक ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ प्रस्तुत करती है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

पिछले दिनों ऐसा ही एक महत्वपूर्ण प्रसंग उद्घाटित हुआ, जो हिंदू मस्तिष्क और हिंदू मेधा का डंका पूरे संसार में बजने का प्रमाण देता है। अलग बात है कि अभी भी पश्चिम की दास-मानसिकता से ग्रस्त भारत के तथाकथित बुद्धिजीवियों और मीडिया ने इस पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया। इसे उत्साहपूर्वक ग्रहण करना तो दूर, कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इसका उल्लेख तक नहीं किया।

अमेरिका के प्रख्यात शोध संस्थान प्यू रिसर्च सेंटर के नए अध्ययन में पिछले महीने कुछ चौंकाने वाले तथ्य मिले हैं। वैश्विक मीडिया और शोध संस्थानों ने हिंदुओं की जो विकृत छवि और पश्चिम को बौद्धिकता की खान बनाकर प्रस्तुत किया, उसे देखते हुए ये आंकड़े विस्मित करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न पांथिक समुदायों में शिक्षा और अध्ययन की प्रवृत्ति को लेकर हुए इस शोध-अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में हिंदू समुदाय के लोग सर्वाधिक शिक्षित पाए गए। प्यू रिसर्च सेंटर का यह निष्कर्ष 2023-24 की ‘रिलिजियस लैंडस्केप स्टडी’ पर आधारित है।

इस सर्वेक्षण में जुलाई 2023 से मार्च 2024 के बीच अमेरिका के सभी 50 राज्यों के 36,908 वयस्कों को शामिल किया गया। इसमें पाया गया कि अमेरिका में लगभग 70 प्रतिशत हिंदू के पास स्नातक या उससे ऊपर की डिग्री है। दूसरे स्थान पर यहूदी समुदाय है, जिनका आंकड़ा लगभग 65 प्रतिशत है। आश्चर्य की बात है कि अमेरिकी वयस्कों का अनुपात लगभग 35 प्रतिशत ही है। अन्य मत-पंथों, संप्रदायों, यथा-मुस्लिमों में यह दर 44 प्रतिशत, बौद्धों में 41 प्रतिशत और ईसाइयों में 32 प्रतिशत पाई गई। ईसाइयों के विभिन्न पंथों में यह संख्या अलग-अलग रही। जैसे-ऑर्थोडॉक्स में 45 प्रतिशत, प्रोटेस्टेंट में 40 प्रतिशत, कैथोलिक में 35 प्रतिशत और इवैंजेलिकल प्रोटेस्टेंट में 29 प्रतिशत।

अमेरिका में रहने वाले सभी प्रमुख धर्म, रिलीजन, मजहब, पंथों से जुड़े हुए युवकों के शैक्षिक स्तर का यह अनुपात हिंदुओं की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा का स्मरण कराता है। यह हिंदुओं के डीएनए के उस वैशिष्ट्य और विलक्षणता की ओर संकेत करता है, जिसके कारण किसी समय राजर्षि मनु ने घोषणा की थी, ‘‘भारत में जन्मे हुए विद्वानों से, जो कि संसारभर के अग्रज हैं, धरती के सभी मनुष्यों को अपना-अपना आचरण सीखना चाहिए।’’

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।।
यह कोई गर्वोक्ति मात्र न होकर हजारों वर्षों की ज्ञान-परंपरा से प्राप्त सामर्थ्य था, जिसे हिंदुओं ने कठिन साधना और तप के बल पर अर्जित किया था और सारे संसार में भौतिक व अध्यात्म का पाठ पढ़ाया था। मनुस्मृति का यह कथन ‘कृणवन्तो विश्वमार्यम्’ की वैदिक संकल्पना का ही विस्तार है।

शोधकर्ताओं के तर्क

हालांकि, अध्ययन के शोधकर्ताओं ने हिंदुओं और अमेरिकावासियों के शैक्षिक स्तर के इस अंतर पर तर्क दिया है कि पांथिक समुदायों के बीच शिक्षा का यह अंतर मुख्यतः आप्रवासन और जनसांख्यिकीय पैटर्न से जुड़ा हुआ है। हिंदू एवं अन्य रिलीजन तथा समुदायों के अधिकतर लोग अमेरिका में उच्च शिक्षा या उच्च स्तरीय सेवाओं के लिए आते हैं। इसलिए इन समुदायों में पहले से ही उच्च शिक्षित लोगों का अनुपात अधिक रहता है। निष्कर्ष यह है कि अमेरिका में हिंदू समुदाय का अत्यधिक शिक्षित पाया जाना धर्म से सीधे नहीं जुड़ा हुआ है, अपितु वह उच्चस्तरीय अध्ययन, उच्च पदस्थापन एवं उच्चस्तरीय व्यापार के लिए आने वाले हिंदुओं की स्थिति से जुड़ा है। चयनित स्तर के हिंदू ही अमेरिका में बसते हैं। अत्यंत निर्धन और अशिक्षित हिंदू के लिए अमेरिका में रहने के अवसर सामान्यतया दुर्लभ ही हैं। यह भी सत्य है कि अमेरिका में रहने वाले हिंदू वैश्विक हिंदू जनता का प्रतिनिधि नमूना नहीं हैं। वह अपेक्षाकृत उच्च-शिक्षित प्रवासी समूह हैं।

शोधकर्ताओं के इस तर्क से कोई असहमति नहीं है, किंतु यह बात एक सीमा तक ही सत्य है। इस आधार पर इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिंदुओं की विशिष्ट संस्कृति, विशिष्ट परंपरा और धार्मिक पृष्ठभूमि उन्हें अन्यों की तुलना में अधिक मेधावी और अधिक शिक्षित बनाते हैं। सूक्ष्मता से अवलोकन करने पर उक्त शोध-रिपोर्ट भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। मान लिया कि विभिन्न समुदायों के बीच शिक्षा के स्तर का अंतर पांथिक आधार पर न होकर आप्रवासन और जनसांख्यिकीय पैटर्न से ही जुड़ा हुआ है तो क्या कारण है कि भारत के अतिरिक्त अन्य देशों, यथा-चीन, जापान, पाकिस्तान, फिलीपींस आदि देशों से अमेरिका में बसने वाले समुदायों (मुसलमानों, बौद्धों और ईसाइयों) का अनुपात हिंदुओं से इतना कम क्यों है? वे भी तो उच्चस्तरीय अध्ययन या उच्च स्तरीय व्यापार के लिए ही जाते हैं।
इसका स्पष्ट उत्तर है कि भारत के हिंदू अपने जीवन मूल्यों में शिक्षा और ज्ञानार्जन को सर्वाधिक महत्व देते रहे हैं। ‘ऋ ते ज्ञानान्न मुक्तिः’ वाली परंपरा प्राचीन काल ही नहीं, अपितु पिछली शताब्दी तक निर्बाध रूप से चलती रही। मुगलों की पराधीनता भी जिसे नष्ट नहीं कर पाई, जब तक कि अंग्रेजों ने इसे नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर दिया।

व्यापक, विकेंद्रीकृत और समावेशी शिक्षा

इसका ठोस प्रमाण देते हैं ‘ब्यूटीफुल ट्री’ के लेखक धरमपाल जी, जिन्होंने गहन एवं प्रामाणिक रीति से शोध कर प्रकाशित किया था कि भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी राष्ट्रों की तुलना में अत्यधिक व्यापक, विकेंद्रीकृत और समावेशी थी। यह दो शताब्दी पूर्व भारत में अंग्रेजी राजकाज प्रारंभ होने के पूर्व तक बनी रही। बाद में अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को बिल्कुल तहस-नहस कर दिया। धरमपाल जी सप्रमाण बताते हैं कि मद्रास प्रेसिडेंसी के गवर्नर थॉमस मुनरो ने 1822 में सभी जिला कलेक्टरों को प्रत्येक गांव का सर्वेक्षण कर शिक्षण व्यवस्था की जानकारी एकत्र करने के निर्देश दिए।

इससे पता चला कि मद्रास प्रेसिडेंसी अर्थात् दक्षिण भारत में लगभग हर गांव में एक विद्यालय था। कुल 11,758 विद्यालयों और 740 उच्च शिक्षा केंद्रों में विद्यार्थियों की संख्या डेढ़ लाख से अधिक थी। इनके अतिरिक्त, घर पर पढ़ने वाले छात्र भी कम नहीं थे। अकेले मद्रास शहर में 26,963 छात्र घर पर पढ़ रहे थे। इससे भी बड़ी बात यह थी कि तमिल क्षेत्रों में 70 से 84 प्रतिशत छात्र निम्न कही जाने वाली जातियों से थे। ब्राह्मण-कायस्थ छात्रों की संख्या 15 से 40 प्रतिशत थी। लगभग यही स्थिति बंगाल-बिहार प्रेसिडेंसी में थी, जहां लगभग 1,00,000 विद्यालय थे, जिनमें अनुसूचित जाति और जनजाति समूह के छात्र बड़ी भारी संख्या में पढ़ते थे। संपूर्ण भारत वर्ष में शिक्षा का यही स्तर था।

धरमपाल जी का निष्कर्ष था कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था अत्यंत समृद्ध एवं सर्वसमावेशी थी। 19वीं सदी में ब्रिटिश नीतियों, विशेषतः मैकाले पद्धति ने इसे नष्ट कर दिया। इसके कारण शिक्षा का स्तर एवं साक्षरता दर तेजी से घट गई। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अंग्रेजी राज से पहले यह ‘सुंदर वृक्ष’ फल-फूल रहा था, किंतु अंग्रेजों ने इसे उखाड़ फेंका। इसीलिए धरमपाल जी ने अपनी पुस्तक को ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ नाम दिया।

वास्तविकता यह है भारत को शिक्षित और सभ्य बनाने के नाम पर अपनी कुनीतियां थोपने वाले अंग्रेज हिंदुओं की मेधा और बौद्धिकता के मुकाबले बहुत पिछड़े और असभ्य थे, किंतु अंग्रेजों और उनके गुलाम-भक्तों ने षड्यंत्रपूर्वक इसे दबा दिया। अतः यदि आज भी हिंदू अपने सनातन संस्कारों और सत्यान्वेषी प्रकृति के कारण शैक्षिक स्तर पर अन्य मत पंथावलंबियों से बहुत आगे दिखलाई पड़ते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा!

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के तीन-चार दशकों में भारत की आर्थिक गति बहुत सुस्त और पिछड़ी हुई रही। कुछ अर्थशास्त्रियों ने व्यंग्य और उपहास करते हुए इसे ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ नाम दिया था। यह गुलामी की मानसिकता और हिंदू विरोधी सोच का ही परिणाम था कि जिस समस्या का मूल कारण नेहरू की दोषपूर्ण नीतियां रहीं, उसे ‘नेहरू ग्रोथ रेट’ न कहकर ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ कहा गया। आज उन तथाकथित बुद्धिजीवियों से प्रश्न है कि प्यू रिसर्च सेंटर की इस रिलीजियस लैंडस्केप स्टडी से प्राप्त हिंदुओं को सर्वाधिक शिक्षित और मेधावी सिद्ध करते इन आंकड़ों को ‘हिंदू मेधा दर’ कहा जाएगा?

Topics: अमेरिकी  हिंदूभारतीय संस्कृतिलौह स्तंभज्ञान परंपराउपनिवेशवादपाञ्चजन्य विशेषप्यू रिसर्च सेंटरहिंदू मेधागांधीवादी विचारकद ब्यूटीफुल ट्रीरुडयार्ड किपलिंगमैकाले पद्धति
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