होली पर्व को लेकर अल जज़ीरा ने फिर उगला जहर : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदुओं के अस्तित्व से घृणा कब तक?
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होली पर्व को लेकर अल जज़ीरा ने फिर उगला जहर : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदुओं के अस्तित्व से घृणा कब तक?

अल जज़ीरा की पत्रकार विद्या कृष्णन ने “The Dark Side of Holi” लेख में होली को महिला विरोधी बताकर विवाद खड़ा किया। जानिए कैसे अधूरे तथ्यों और प्रोपेगेंडा के जरिए हिंदू पर्वों को बदनाम करने की कोशिश की जाती है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Mar 9, 2026, 06:00 pm IST
in मत अभिमत

भारत के या फिर कहें हिंदुओं के पर्वों को लेकर पश्चिमी और इस्लामी मीडिया का रुख एक प्रकार से स्पष्ट ही रहता है। हाँ यह बात दूसरी है कि हिन्दू पर्वों के विरुद्ध लिखने वाले अधिकांश लोग नामधारी हिन्दू ही होते हैं। हिन्दू पर्वों के प्रति घृणा कथित प्रगतिशील पत्रकार फैलाते हैं। हिन्दू पर्वों की कथाओं में वामपंथी एजेंडे के अनुसार अंतर्कथाएं न केवल बनाते हैं, बल्कि वे उसी के अनुसार लेखों के माध्यम से उसी घृणा को परोसते भी हैं।

अल जज़ीरा की पत्रकार विद्या कृष्णन और विवाद

ऐसी ही एक पत्रकार है अल जज़ीरा की विद्या कृष्णन! जिनके पूर्व में भी हिन्दू पर्वों को लेकर घृणात्मक पोस्ट्स सोशल मीडिया पर वायरल होते रहे हैं। विद्या की हिन्दू पुरुषों को लेकर घृणा भी सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से व्यक्त होती रही है। वर्ष 2022 में एक ट्वीट में विद्या ने हिन्दू पुरुषों को टाक्सिक अर्थात जहरीला बताया था।

2⃣In a 2022 tweet, Krishnan labeled “Hindu men” as “toxic.” Accusations of rape culture and genocidal bloodlust, are tossed around like confetti, tarring ng an entire community with broad strokes.

Talk about stereotyping? Would she make similar assertions against other… pic.twitter.com/OZXznwhf30

— CoHNA (Coalition of Hindus of North America) (@CoHNAOfficial) March 6, 2026

होली पर लिखे गए लेख “The Dark Side of Holi” का संदर्भ

इसी विद्या कृष्णन ने एक बार फिर से होली के पर्व को लेकर अल जज़ीरा में जहर उगला है और होली को लेकर लेख लिखा है, जिसका शीर्षक है “The dark side of Holi”। इसमें शुरुआत में हिरण्यकश्यप की कहानी है और यह बताया है कि कैसे हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को मिले हुए वरदान का प्रयोग अपने शत्रु अपने ही पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए किया। इसमें लिखा है कि होलिका को उसके भाई ने एक जादूई और अदृश्य कंबल में लपेट दिया और जब प्रह्लाद अपनी बुआ की गोद में बैठा तो आग लगा दी। राजकुमार ने भगवान विष्णु की आराधना की, जिन्होनें दुष्टता को जला दिया और छोटे भक्त प्रह्लाद को बचा लिया।

होलिका की कथा को पितृसत्ता से जोड़ने का आरोप

विद्या इस लेख में लिखती हैं कि होलिका की कहानी इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण है कि कैसे हिन्दू महिलाओं को पितृसत्ता को लागू करने वालों के रूप में देखा जाता है और दंड दिया जाता है। विद्या ने लिखा कि होलिका के भाई ने उसे चिता पर बैठाया और हम हर साल उसे प्रतीकात्मक रूप से जलाकर उसका जश्न मनाते हैं। फिर वह और रोचक लिखती हैं कि “होलिका को आग की खलनायिका के तौर पर दिखाना आसान है, लेकिन वह बच्चों को जलाने वाली राक्षसी के बजाय मॉडर्न फेमिनिस्ट हीरो के ज़्यादा करीब है, खासकर मोदी के भारत में।”

होलिका दहन और धार्मिक आस्था का वास्तविक अर्थ

यहाँ यह अत्यंत हास्यास्पद है कि होलिका दहन में मोदी का भारत कहाँ से आ गया? होलिका दहन के समय होलिका मैया की जय बोली जाती है और उसकी बुराई के जलने की कामना की जाती है और यह प्रार्थना आम हिन्दू करता है कि हमारे हृदयों में से हर बुराई का नाश हो और मात्र भक्ति ही रह जाए। और होलिका माता से आशीर्वाद भी मांगा जाता है।

हिरण्यकश्यप और नृसिंह अवतार का प्रसंग

और रही बात हिरण्यकश्यप की तो उसने तो अपना जीवन भी श्रीहरि विष्णु के प्रति घृणा के चलते समाप्त कर दिया था, स्वयं प्रभु ने नृसिंह अवतार लेकर उसका विनाश करने के लिए आए थे। क्या यह भी पितृसत्ता है?

भारतीय पर्वों का संदेश: बुराई पर अच्छाई की विजय

भारत में होली, दशहरा, दीपावली, नरक चौदस आदि तमाम पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक हैं। होलिका का पर्व तो इसलिए और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें यह महत्वपूर्ण सबक है कि यदि स्त्री को कोई वरदान प्राप्त होता है तो उसका दुरुपयोग करना कितना खतरनाक हो सकता है और यदि वरदान का दुरुपयोग किया जाए तो उसका दंड अवश्य मिलेगा।

होलिका का स्थान और धार्मिक परंपरा

हाँ, उस दंड को भी लोकहित में प्रयोग किया जाता है और भक्त प्रह्लाद को मारने का प्रयास करने वाली होलिका को भी होलिका माता का स्थान प्राप्त है। इसके बाद होलिका का उल्लेख किया गया है कि वह एक सैनिक थी और उसे राजा ने नियुक्त कर रखा था, परंतु फिर भी उसके जीवन में अपने पुरुषों के इशारों पर नाचने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था।

होली को बदनाम करने के आरोप

और उसके बाद विद्या ने होली को और बदनाम करने के लिए भारत में हो रहे सामूहिक बलात्कार के विषय में लिखा और यह भी लिखा कि इस पर्व में महिलाओं को निशाना बनाया जाता है और लड़कियां इस पर्व से लगातार डरती रहती हैं। विद्या ने उस झूठ को भी लिखा, जिसे पूरी तरह से नकारा जा चुका है कि होली पर “सीमन” से भरे हुए गुब्बारे फेंके गए थे। और उन्होनें यह भी लिखा कि लड़कियों को इस दिन छेड़ा जाता है और होली की पार्टीज़ में लड़कियों के साथ बलात्कार किया जाता है। अल जज़ीरा पर प्रकाशित यह लेख इस बात का प्रमाण है कि कैसे आधे आधूरे तथ्यों के आधार पर हिंदुओं के हर पर्व को बदनाम करने का लगातार प्रयास किया जाता है और अभी भी किया जा रहा है।

महिलाओं के अन्य मामलों पर चुप्पी का आरोप

विद्या भारत में लड़कियों के साथ बढ़ रहे अपराधों के आधार पर होली को निशाना बनाती हैं, मगर विद्या ने शायद ही कभी उन लड़कियों की पीड़ा लिखी हो, जिन्हें धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया जाता है। श्रद्धा वौकर से लेकर तारा शाहदेव तक तमाम मामले ऐसे हैं, जिन पर विद्या की कलम चलनी चाहिए, मगर वह नहीं चलती।

मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दों पर प्रश्न

इज्जत के नाम पर हर साल मुस्लिम लड़कियां अपने ही परिजनों द्वारा मार दी जाती हैं, मगर कभी भी विद्या ने ईद को बदनाम नहीं किया होगा। अहमदाबाद में एक युवा मुस्लिम लड़की ने जहेज और शौहर की बेवफाई के चलते लाइव आत्महत्या कर ली थी, मगर फिर भी शायद ही कभी विद्या ने यह कहा हो कि मुस्लिम समाज में जहेज (दहेज) एक समस्या है।

कश्मीर की महिलाओं और कलाकारों की पीड़ा

कश्मीर में असंख्य मुस्लिम युवतियाँ कट्टरपंथ का शिकार हो गईं। भारत के कश्मीर में लड़कियों के तमाम बैंडस हुआ करते थे, मगर जिहादी तत्वों के कारण इन लड़कियों के सुर शांत हो गए और उनके सपने मर गए, मगर अल जज़ीरा ने इन लड़कियों की पीड़ा को कभी स्थान दिया हो, ऐसा नहीं दिखता है।

सोशल मीडिया कलाकार अमरीन बट्ट की हत्या

हाल ही में कश्मीर में सोशल मीडिया कलाकार अमरीन बट्ट की नृशंस हत्या केवल इस कारण कर दी गई थी क्योंकि वह सोशल मीडिया पर कंटेन्ट बनाती थी और जिहादी तत्वों को उसका यह करना पसंद नहीं था और घर पर आकर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

मीडिया के दोहरे मापदंड

मगर तमाम मुस्लिम महिलाओं की ऐसी हत्याएं कहीं गहरे तहखाने में दब गई हैं, क्योंकि उनका कोई नहीं है, कोई अल जज़ीरा उनकी पीड़ाओं पर आवाज नहीं उठाता। होली के अवसर पर यह लिखने का दुस्साहस अल जज़ीरा कर सकता है कि होली एक महिला विरोधी पर्व है, मगर असली महिला विरोधी तत्वों के खिलाफ वह कभी भी कुछ नहीं लिख सकता है|!

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या हिंदुओं के प्रति घृणा

चूंकि हिन्दू धर्म को सहिष्णु धर्म कहा जाता है तो उसके पर्वों की आलोचना भी कर दी जाए तो उसे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही ठहराया जाता है, परंतु होली के विरुद्ध यह विष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, अपितु हिंदुओं के अस्तित्व के प्रति घृणा है और कुछ नहीं!

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