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दस दांव दबे पांव

युद्ध कई परतों में चलता है। कभी दिखता है तो कभी अदृश्य रहता है। इसे समझने के लिए हमें केवल बम और मिसाइल नहीं, बल्कि उन विचारों को भी समझना होगा जिनके आधार पर यह युद्ध लड़ा जा रहा है। यही कारण है कि इस पूरे संघर्ष को अलग-अलग आयामों में पढ़ना, सैन्य रणनीतियों की भाषा में समझना अधिक उपयोगी है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 8, 2026, 11:18 am IST
in विश्व, विश्लेषण

तेल अवीव की रात अचानक बिखर जाती है। सायरन की आवाज नींदों को चीर देती है। लोग बालकनी से भीतर भागते हैं, मोबाइल फोन पर संदेश चमकते हैं, और आसमान में दूर कहीं चमकती रोशनी दिखाई देती है। उसी समय तेहरान में एक और दृश्य है। एक कमरे में बड़ी स्क्रीन पर नक्शे खुले हैं। अधिकारी झुककर बिंदुओं को देखते हैं जो कभी हरे से लाल हो जाते हैं। हजारों किलोमीटर दूर वाशिंगटन में एक और कमरा पूरी तरह जाग रहा है। वहां लोग धीमी आवाज में बात कर रहे हैं, पर हर शब्द के पीछे दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति की गणना छिपी है।

फरवरी 2026 में जब इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमलों ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया, तो यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी। यह वह क्षण था जब तीनों राजधानियों में सोचने का तरीका बदल गया। अब हर निर्णय में यह सवाल छिपा था कि अगला कदम क्या होगा और उसका जवाब किस दिशा से आएगा? यह कोई सीधा युद्ध नहीं है जिसमें दो सेनाएं एक मैदान में आमने सामने खड़ी हों। यह एक ऐसा संघर्ष है जो कई परतों में चलता है, कभी दिखता है तो कभी अदृश्य रहता है। इसे समझने के लिए हमें केवल बम और मिसाइल नहीं, बल्कि उन विचारों को भी समझना होगा जिनके आधार पर यह युद्ध लड़ा जा रहा है। यही कारण है कि इस पूरे संघर्ष को अलग अलग आयामों में पढ़ना, सैन्य रणनीतियों की भाषा में समझना अधिक उपयोगी है।●●●●●●

बर्र का छत्ता
(Mosaic Doctrine)

कल्पना कीजिए कि आपने बर्र के छत्ते पर पत्थर फेंका। आपको लगता है कि एक ही जगह चोट लगी है, लेकिन अगले ही क्षण चारों दिशाओं से बर्र उड़ते दिखाई देते हैं। आधुनिक युद्ध की एक रणनीति इसी विचार पर आधारित है। ईरान की सैन्य संरचना को समझाने के लिए कई विशेषज्ञ इसी उदाहरण का सहारा लेते हैं।

फरवरी, 2026 के हमलों में जब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के वरिष्ठ कमांडर मोहम्मद पाकपुर मारे गए, तो कई लोगों को लगा कि अब प्रतिक्रिया कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन कुछ ही समय बाद अलग अलग इलाकों से मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें आने लगीं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह ढांचा केवल ऊपर बैठे कुछ नेताओं पर निर्भर नहीं है। देश के अलग अलग हिस्सों में मौजूद इकाइयों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर सकें।

जब मिसाइल और ड्रोन एक साथ बड़ी संख्या में छोड़े जाते हैं तो उसे सैल्वो कहा जाता है। इसका उद्देश्य विरोधी की रक्षा प्रणाली को इतना व्यस्त कर देना होता है कि वह समझ ही न पाए कि किस दिशा से आए खतरे को पहले रोका जाए। उस क्षण युद्ध किसी सीधी रेखा में नहीं चलता, बल्कि बर्र के छत्ते की तरह हर दिशा में फैल जाता है।

इतिहास में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। 2006 के लेबनान युद्ध में हिजबुल्लाह के कई नेताओं को निशाना बनाया गया था, लेकिन उसके नेटवर्क की गतिविधि पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इससे एक बात साफ होती है। जब किसी संघर्ष की संरचना नेटवर्क की तरह होती है तो एक निर्णायक हमला युद्ध को खत्म नहीं करता। वह अक्सर उसे और अधिक फैलने का रास्ता दे देता है।●●●●●●

कुहासे का मैदान
(Grey Zone Warfare)

एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक ने कभी कहा था कि ग्रे जोन वह जगह है जहां राज्य जानबूझकर अस्पष्टता को हथियार बना लेते हैं। वे चोट भी पहुंचाते हैं और औपचारिक युद्ध की घोषणा से भी बच जाते हैं। आधुनिक संघर्षों में यही धुंधला इलाका सबसे अधिक सक्रिय दिखाई देता है। यह वह जगह है, जहां युद्ध और शांति की रेखा साफ नहीं दिखती। 28 फरवरी के बाद ईरान और उसके सहयोगी नेटवर्क की गतिविधियों में यही पैटर्न देखने को मिला। कहीं बैंकिंग नेटवर्क पर अचानक साइबर हमले हुए, कहीं ऊर्जा और बुनियादी ढांचे से जुड़ी प्रणालियां कुछ समय के लिए ठप हो गईं। समुद्र में हूती समूह के ड्रोन जहाजों के आसपास मंडराने लगे।

इंटरनेट की दुनिया में NoName057 नाम से सक्रिय हैक्टिविस्ट समूह ने इजरायल से जुड़ी डिजिटल प्रणालियों को निशाना बनाया। इन घटनाओं में एक समानता थी। कहीं औपचारिक घोषणा नहीं थी, कोई सीधी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की गई, और फिर भी संदेश साफ पहुंच रहा था। यही इस रणनीति का मूल है। इसमें लक्ष्य विरोधी को लगातार दबाव में रखना होता है, लेकिन उस सीमा को पार नहीं करना होता जिससे पूर्ण युद्ध शुरू हो जाए। इस तरह हर कार्रवाई एक संकेत बन जाती है। सामने वाले को यह समझ आ जाता है कि जवाब दिया जा रहा है, लेकिन यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इसे किस स्तर का युद्ध माना जाए।

इतिहास में भी ऐसी रणनीतियों के उदाहरण मिलते हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा समुद्री मिलिशिया का उपयोग इसी तरह की धुंधली रणनीति का हिस्सा माना जाता है। वहां भी सैनिक जहाजों की जगह मछली पकड़ने वाले जहाजों जैसे दिखने वाले समूह सक्रिय रहते हैं, जो दबाव बनाते हैं पर औपचारिक युद्ध की स्थिति नहीं बनने देते। इस तरह का युद्ध अक्सर बंदूक की आवाज से नहीं बल्कि धीरे धीरे फैलती बेचैनी से पहचाना जाता है। इसमें गोली कम चलती है, पर तनाव लगातार बढ़ता रहता है।●●●●●●

दूर से लड़ी जाने वाली लड़ाई
(Proxy Warfare)

एक क्षेत्रीय संघर्ष विशेषज्ञ ने कहा था कि परोक्ष युद्ध शक्ति को दूरी देता है। कोई राज्य प्रभाव भी डालता है और प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से कुछ दूरी भी बनाए रखता है। आधुनिक मध्य पूर्व को समझने के लिए यह विचार बहुत महत्वपूर्ण है। यहां कई संघर्ष सीधे दो देशों के बीच नहीं लड़े जाते, बल्कि उनके सहयोगी और समर्थक समूहों के माध्यम से सामने आते हैं।

ईरान के प्रभाव वाले कई समूह लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह को अक्सर उत्तरी मोर्चे की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, जिसके पास अनुमानतः लाखों रॉकेट और मिसाइलें बताई जाती हैं। यमन में हूती समूह लाल सागर के आसपास ड्रोन और मिसाइल गतिविधियों के कारण चर्चा में रहता है। इराक में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स जैसे समूह भी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का हिस्सा बन चुके हैं। फरवरी के हमलों के बाद इन नेटवर्कों की गतिविधियां फिर से तेज होती दिखाई दीं। कहीं रॉकेट परीक्षण की खबर आई, कहीं समुद्र में ड्रोन दिखाई दिए, और कहीं सैन्य ठिकानों के आसपास तनाव बढ़ गया।

इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य केवल हमला करना नहीं होता, बल्कि रणनीतिक दबाव बनाना होता है। जब कोई राज्य अपने सहयोगी समूहों के माध्यम से प्रतिक्रिया देता है तो राजनीतिक जोखिम कुछ हद तक कम हो जाता है। यदि प्रतिक्रिया तीखी हो जाए तो भी सीधा युद्ध घोषित करने की स्थिति तुरंत नहीं बनती। साथ ही नियंत्रण की एक परत भी बनी रहती है, क्योंकि इन समूहों के माध्यम से दबाव को बढ़ाया या घटाया जा सकता है।

इतिहास में इसके उदाहरण पहले भी देखे गए हैं। 2019 में सऊदी अरब के अबकैक तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमले को कई विश्लेषकों ने इसी प्रकार की परोक्ष रणनीति का उदाहरण माना था। ऐसे युद्धों में गोलियां और मिसाइलें सामने दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे खड़ी शक्ति अक्सर परदे के पीछे रहती है। यही कारण है कि परोक्ष युद्ध आधुनिक भू राजनीति में प्रभाव का एक लंबा और जटिल खेल बन चुका है।●●●●●●

प्रतिरोध की पैठ
(Deterrence)

अमेरिकी रणनीतिक विचारक थॉमस शेलिंग ने लिखा था कि प्रतिरोध का असली सार यह है कि आप विरोधी को यह विश्वास दिला दें कि उसकी अगली चाल की कीमत इतनी भारी होगी कि वह उसे उठाना ही न चाहे। आधुनिक युद्धनीति में इसे डिटरेंस कहा जाता है। इसका उद्देश्य हर हमला रोकना नहीं होता, बल्कि सामने वाले को यह समझा देना होता है कि एक तय सीमा के आगे बढ़ना खतरनाक और महंगा साबित होगा।

पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव में भी यही रणनीति कई स्तरों पर दिखाई देती है। इजरायल का आयरन डोम रक्षा तंत्र केवल मिसाइल रोकने की तकनीक नहीं है, वह एक संदेश भी है कि हमला करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। इसी तरह अमेरिका का समुद्र में नौसैनिक जमावड़ा, विमान वाहक पोतों की मौजूदगी और लंबी दूरी की मिसाइलों का प्रदर्शन केवल सैन्य तैयारी नहीं बल्कि संकेत हैं। इन सबका मूल संदेश एक ही है कि एक सीमा है जिसे पार करना दोनों पक्षों के लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। इस रणनीति की ताकत केवल हथियारों में नहीं बल्कि उस विश्वास में होती है जो विरोधी के मन में बैठता है। जब सामने वाला यह मान ले कि अगला कदम उसे अस्वीकार्य नुकसान पहुंचा सकता है, तब कई बार वह कदम उठाया ही नहीं जाता। यही कारण है कि डिटरेंस को अक्सर युद्ध रोकने की रणनीति भी कहा जाता है।

इतिहास में इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण शीत युद्ध के समय दिखाई देता है। उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों के पास इतनी परमाणु शक्ति थी कि यदि युद्ध होता तो दोनों का विनाश लगभग तय था। इसे पारस्परिक सुनिश्चित विनाश की स्थिति कहा गया। इस भय ने ही कई दशकों तक प्रत्यक्ष टकराव को रोके रखा। यही सिद्धांत आज भी अलग रूपों में काम करता है। कभी मिसाइल रक्षा प्रणाली के रूप में, कभी समुद्री शक्ति के प्रदर्शन के रूप में, और कभी एक सख्त संदेश के रूप में जो कहता है कि यहां तक आ सकते हो, लेकिन इसके आगे बढ़ना बहुत भारी पड़ेगा।●●●●●●

एक धक्का और…!
(Compellence)

थॉमस शेलिंग ने रणनीति की दुनिया में एक सरल पर गहरी बात कही थी। उनके अनुसार प्रतिरोध किसी को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करता है, जबकि बाध्यकरण उसे दिशा बदलने के लिए धक्का देता है। फर्क यही है कि एक स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखना चाहता है और दूसरा उसे बदलने की कोशिश करता है।

पश्चिम एशिया के हाल के घटनाक्रम को देखें तो यह विचार साफ दिखाई देता है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों का उद्देश्य केवल किसी तत्काल खतरे को रोकना नहीं था। उनके पीछे यह दबाव भी छिपा था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन और मिसाइल गतिविधियों की दिशा बदले। साथ ही क्षेत्र में सक्रिय सहयोगी समूहों की गतिविधियों को सीमित करने का संदेश भी इसमें शामिल था। दूसरे शब्दों में यह केवल चेतावनी नहीं थी, बल्कि एक प्रकार का धक्का था कि नीतियां बदली जाएं।

लेकिन बाध्यकरण की रणनीति हमेशा सरल नहीं होती। जब किसी देश पर दबाव डाला जाता है कि वह अपनी नीति बदले, तब प्रतिक्रिया भी तेज हो सकती है। सामने वाला इसे अपनी संप्रभुता या प्रतिष्ठा की चुनौती के रूप में देख सकता है। इसी कारण कई बार ऐसी कार्रवाइयों से तनाव घटने के बजाय अस्थिरता और बढ़ जाती है।

इतिहास में इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण 1962 का क्यूबा मिसाइल संकट माना जाता है। उस समय अमेरिका ने सोवियत संघ पर दबाव डाला कि वह क्यूबा से अपने परमाणु मिसाइल हटाए। समुद्री नाकेबंदी और कठोर चेतावनियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि स्थिति को बदलना ही होगा। अंततः सोवियत संघ ने मिसाइल हटाने का निर्णय लिया, लेकिन दुनिया उस समय परमाणु टकराव के बेहद करीब पहुंच गई थी। यही बाध्यकरण की रणनीति की वास्तविकता है। यह बदलाव लाने की कोशिश करती है, पर उसके रास्ते में जोखिम और तनाव भी साथ चलते हैं।●●●●●●

आगे बढ़े, पारा चढ़े
(Escalation Ladder)

रणनीति के विद्वान लॉरेंस फ्रीडमैन ने लिखा है कि अधिकांश संघर्ष अचानक पूर्ण युद्ध में नहीं बदलते। वे धीरे धीरे सीढ़ी के पायदानों की तरह ऊपर बढ़ते हैं। हर नया कदम पिछले से थोड़ा अधिक तीखा होता है, और हर पायदान पर यह सवाल खड़ा रहता है कि अगला कदम कितना दूर और किन परिणामों के साथ जाएगा।

पश्चिम एशिया के हाल के घटनाक्रम में यह सीढ़ी साफ दिखाई देती है। शुरुआत अक्सर तीखी बयानबाजी से हुई है। कड़े शब्द, चेतावनियां और राजनीतिक आरोप माहौल को गर्म करते रहे हैं। इसके बाद सीमित कार्रवाई सामने आती है, जैसे साइबर हमले, गुप्त अभियानों या छोटे पैमाने की सैन्य गतिविधियां। फिर स्थिति एक और पायदान ऊपर जाती है जब मिसाइल या ड्रोन हमलों की खबरें आने लगती हैं। 28 फरवरी के बाद क्षेत्र में इसी तरह की बढ़त दिखाई दी। बयानबाजी के बाद साइबर गतिविधियां तेज हुईं और फिर कई दिशाओं से मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं।

इस सीढ़ी का हर पायदान अपने साथ एक जोखिम भी लाता है। यदि कोई पक्ष अगले पायदान पर चढ़ता है तो दूसरे पर भी दबाव बनता है कि वह पीछे न हटे। यही वह क्षण होता है जब तनाव संघर्ष में परिवर्तित होता है और धीरे धीरे फैलने लगता है। कभी यह सीमित रहता है, और कभी अचानक बहुत तेज मोड़ ले लेता है।

इतिहास बताता है कि ऐसी सीढ़ियों के कई रंग और स्तर होते हैं। क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान भी तनाव धीरे धीरे बढ़ता गया था। हर कदम के बाद नेताओं को यह तय करना पड़ता था कि आगे बढ़ना है या रुकना है। यही कारण है कि रणनीति की दुनिया में इस विचार को समझना बहुत जरूरी माना जाता है। क्योंकि युद्ध अक्सर एक ही झटके में नहीं भड़कता, वह कई छोटे कदमों के बाद उस बिंदु तक पहुंचता है जहां लौटना कठिन हो जाता है। ●●●●●●

दांव बदल देने की चाल
(Asymmetric Warfare)

एक रक्षा अध्ययन शोधकर्ता ने कहा था कि जब ताकत बराबर न हो तो युद्ध के नियम भी बदल जाते हैं। कमजोर पक्ष अक्सर सीधी टक्कर नहीं लेता, वह खेल की शर्तें ही बदल देता है। यही असीमित युद्ध का मूल विचार है। इसमें उद्देश्य यह नहीं होता कि हर मोर्चे पर बराबरी की जाए, बल्कि यह होता है कि विरोधी की ताकत को ऐसे स्थानों पर चुनौती दी जाए जहां वह असहज हो जाए।

पश्चिम एशिया में फैलते हाल के तनाव में यह रणनीति साफ दिखाई देती है। ईरान ने लंबे समय से ड्रोन, साइबर हमलों और समुद्री दबाव जैसे साधनों को विकसित किया है। ड्रोन के झुंड कम लागत में तैयार हो जाते हैं, लेकिन यदि वे एक साथ छोड़े जाएं तो विरोधी की रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव डाल सकते हैं। साइबर हमले भी इसी श्रेणी में आते हैं। इनमें किसी बड़े सैन्य टकराव के बिना बैंकिंग, ऊर्जा या संचार नेटवर्क को अस्थायी रूप से बाधित किया जा सकता है।

समुद्र में छोटे ड्रोन या तेज नौकाओं के माध्यम से जहाजों के आसपास तनाव पैदा करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। इस प्रकार के युद्ध में तकनीकी श्रेष्ठता हमेशा निर्णायक नहीं रहती। किसी देश के पास अत्याधुनिक हथियार हो सकते हैं, लेकिन यदि सामने वाला पक्ष अलग तरीके से लड़ने लगे तो संतुलन बदल सकता है। कम लागत वाले साधनों से भी बड़ा प्रभाव पैदा किया जा सकता है।

इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। अफगानिस्तान में सड़कों के किनारे लगाए गए विस्फोटक उपकरणों ने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं को भी लंबे समय तक चुनौती दी थी। इससे यह समझ आता है कि युद्ध केवल हथियारों की ताकत से तय नहीं होता। कई बार वह इस बात से तय होता है कि कौन अपने विरोधी को ऐसे मैदान में ले आता है जहां उसकी ताकत कम और कमजोरी अधिक दिखाई देने लगती है।●●●●●●

मैदान चार, हर ओर से वार
(Hybrid Warfare)

आज सुरक्षा विश्लेषक यह मानने लगे हैं कि आज के संघर्ष में गोली और हैशटैग एक ही अभियान का हिस्सा हो सकते हैं। यही संकर युद्ध की असली पहचान है। इसमें लड़ाई केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहती। वह इंटरनेट, सूचना, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों में एक साथ फैल जाती है।

पश्चिम एशिश के हाल के तनाव में इस प्रकार की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। एक ओर प्रत्यक्ष सैन्य प्रहार होते हैं, दूसरी ओर साइबर गतिविधियां तेज हो जाती हैं। कुछ हमलों में डिजिटल नेटवर्क को निशाना बनाया गया, जिनमें Gonjeshke Darande जैसे नाम भी सामने आए। इसी के साथ सूचना के क्षेत्र में भी अलग तरह की लड़ाई चलती है। सोशल मीडिया और समाचार मंचों पर अलग अलग कथाएं फैलती हैं, जिनका उद्देश्य जनता की धारणा को प्रभावित करना होता है। कभी किसी हमले को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है, तो कभी किसी नुकसान को कम करके प्रस्तुत किया जाता है।

ऊर्जा बाजार भी इस संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं। जब तेल और गैस की आपूर्ति या कीमतों पर असर पड़ता है तो उसका प्रभाव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तक फैल जाता है। इस तरह एक सैन्य घटना धीरे धीरे आर्थिक और राजनीतिक दबाव का साधन बन जाती है।

संकर युद्ध की खास बात यही है कि इसमें कई क्षेत्र एक साथ सक्रिय रहते हैं। सैन्य कार्रवाई, साइबर हमला, सूचना का प्रवाह और आर्थिक दबाव सब एक ही रणनीति के हिस्से बन जाते हैं। इतिहास में इसका एक प्रमुख उदाहरण 2014 का क्रीमिया संकट माना जाता है, जहां सैन्य गतिविधियों के साथ सूचना और साइबर क्षेत्र भी महत्वपूर्ण भूमिका में थे। इससे यह समझ आता है कि आधुनिक संघर्ष अब केवल बंदूक और मिसाइल से नहीं लड़े जाते, बल्कि कई अदृश्य मैदानों में भी समानांतर रूप से चलते रहते हैं।●●●●●●

घर से दूर बनाई गई ढाल
(Strategic Depth)

किसी देश की सुरक्षा केवल उसकी सीमा पर नहीं बनती। कई बार वह अपने भूगोल से बाहर बनाए गए प्रभाव के दायरे से तैयार होती है। यही रणनीतिक गहराई का विचार है। इसका मतलब यह है कि खतरे को अपने शहरों और सीमाओं से जितना दूर रखा जा सके, उतना ही सुरक्षित महसूस किया जाता है।

खाड़ी देशों की राजनीति में यह सोच लंबे समय से दिखाई देती है। ईरान ने वर्षों में ऐसे नेटवर्क विकसित किए हैं जिनका विस्तार लेबनान से लेकर यमन तक फैला हुआ बताया जाता है। लेबनान में हिजबुल्लाह, इराक में सहयोगी समूह, और यमन में हूती जैसे संगठन अक्सर इसी व्यापक प्रभाव क्षेत्र के हिस्से के रूप में देखे जाते हैं। इन नेटवर्कों का एक उद्देश्य यह भी माना जाता है कि यदि क्षेत्र में तनाव बढ़े तो संघर्ष ईरान की सीमाओं से दूर रहे और प्रतिक्रिया कई दिशाओं से आ सके।

रणनीतिक गहराई केवल एक देश की नीति नहीं है। क्षेत्र के कई अन्य पक्ष भी इसी तरह अपने प्रभाव क्षेत्र बनाने की कोशिश करते हैं। जब कई देश एक साथ इस प्रकार की रणनीति अपनाते हैं तो संघर्ष का दायरा भी फैलने लगता है। लड़ाई केवल एक सीमित स्थान तक नहीं रहती, बल्कि कई देशों और क्षेत्रों में एक साथ दिखाई देने लगती है।

इतिहास में भी ऐसी सोच के उदाहरण मिलते हैं। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों की चर्चा में अक्सर रणनीतिक गहराई का विचार सामने आता रहा है। इससे यह समझ आता है कि आधुनिक भू राजनीति में सुरक्षा केवल सीमा की रक्षा से नहीं बनती। कई बार वह दूर के क्षेत्रों में बने संबंधों, सहयोग और प्रभाव के जाल से तैयार होती है, जो किसी भी संकट के समय एक अतिरिक्त परत की तरह काम करते हैं।●●●●●●

व्यवस्थाओं का जाल, दबाव की चाल (Weaponized Interdependence)

वैश्वीकरण ने दुनिया को नेटवर्कों से जोड़ दिया, लेकिन राजनीति ने उन्हीं नेटवर्कों को कई बार हथियार में बदल दिया। इसका अर्थ यह है कि जब देश व्यापार, बैंकिंग, ऊर्जा और तकनीक के जाल से जुड़े हों, तो वही जुड़ाव दबाव बनाने का साधन भी बन सकता है। पश्चिम एशिया के हाल के तनाव में यह रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। सैन्य कार्रवाई के साथ साथ आर्थिक दबाव भी बढ़ता है। प्रतिबंधों के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली को निशाना बनाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क पर रोक लगाई जाती है, और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े रास्तों पर निगाह रखी जाती है। कभी किसी बैंक या वित्तीय संस्था पर कार्रवाई होती है, तो कभी तेल और गैस से जुड़े व्यापारिक चैनलों को सीमित करने की कोशिश की जाती है। ऐसे कदमों का उद्देश्य केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाना नहीं होता, बल्कि विरोधी की रणनीतिक क्षमता को कमजोर करना भी होता है। यह युद्ध का वह रूप है जो रणभूमि से दूर चलता है। यहां टैंक और मिसाइल नहीं दिखाई देते, लेकिन निर्णय उतने ही गंभीर होते हैं। एक बैंकिंग निर्णय किसी देश की मुद्रा पर दबाव डाल सकता है, ऊर्जा आपूर्ति में बाधा वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकती है, और वित्तीय प्रतिबंध किसी सरकार की नीतिगत क्षमता को सीमित कर सकते हैं।

जब इन सारे बिंदुओं को एक साथ रखकर देखा जाता है तो पूरी तस्वीर कुछ अधिक स्पष्ट हो जाती है। 28 फरवरी की सीमित स्ट्राइक ने जैसे एक सिलसिला शुरू कर दिया। उसके बाद प्रतिरोध की रणनीति सक्रिय हुई, दबाव की नीति सामने आई, और अलग अलग दिशाओं से सहयोगी समूहों की प्रतिक्रियाएं दिखने लगीं। युद्ध और शांति के बीच जो धुंधला क्षेत्र होता है वह और घना हो गया। तनाव की सीढ़ी का एक और पायदान ऊपर चढ़ गया, लेकिन अभी भी कोई पक्ष उस आखिरी कदम तक नहीं जाना चाहता जहां स्थिति पूरी तरह खुला युद्ध बन जाए। ऊपर से देखने पर लगता है कि एक तरफ प्रहार हो रहे हैं, दूसरी तरफ जवाब आ रहे हैं, फिर भी पूरा ढांचा टूट नहीं रहा। विकेंद्रित नेटवर्क सक्रिय हैं, संघर्ष कई मैदानों में एक साथ चल रहा है, प्रभाव का दायरा सीमाओं से दूर तक फैल रहा है और आर्थिक रिश्ते भी इस टकराव का हिस्सा बन चुके हैं।

इसलिए यह युद्ध पुराने अर्थों में टैंकों और मोर्चों की लड़ाई नहीं है। यह उन व्यवस्थाओं की टक्कर है जो अलग अलग स्तरों पर काम करती हैं। यहां जमीन पर कब्जा करने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कौन किस पर कितना दबाव बना सकता है और उसकी कीमत क्या होगी। हर पक्ष अपनी बढ़त चाहता है, लेकिन कोई भी उस आग को पूरी तरह भड़काना नहीं चाहता जिसे बाद में बुझाना मुश्किल हो जाए।

एक अनुभवी कूटनीतिज्ञ ने कभी कहा था कि आज का युद्ध अक्सर ऐसा होता है जिसमें सभी किसी न किसी तरह से शामिल होते हैं, लेकिन कोई भी खुलकर यह स्वीकार नहीं करता कि हम पूर्ण युद्ध में हैं। यही इस पूरे संघर्ष की असली कहानी है। यह सीमित भी है और फैलता हुआ भी। यह नियंत्रित भी है और अनिश्चित भी। कई परतों में चलने वाला यह टकराव बताता है कि आधुनिक युद्ध केवल मैदान में नहीं लड़े जाते, वे रणनीतियों, नेटवर्कों और दबाव के कई रास्तों से एक साथ आगे बढ़ते हैं। ●●●●●●

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