गुजराती व्यवसाइयों में कुटुंब की उपस्थिति GEN-Z को सिखाती है बहुत कुछ
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गुजराती व्यवसाइयों में कुटुंब की उपस्थिति GEN-Z को सिखाती है बहुत कुछ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन के तहत कुटुंब प्रबोधन पर जोर। संयुक्त परिवार लुप्त हो रहे हैं, तो GEN-Z कैसे मित्रों-समाज के साथ नए 'कुटुंब' बनाकर उद्यमिता में सफल हो?

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी — edited by कुलदीप सिंह
Mar 2, 2026, 11:11 am IST
in भारत, पंच परिवर्तन, मत अभिमत
Gujarat Zen z

प्रतीकात्मक तस्वीर

सर्वविदित है कि भारत और भारतीय परंपरा से ही समाज, सामुदायिक, कुटुंब वाले रहे हैं। व्यक्ति के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक के प्रत्येक घटनाक्रम में समाज और कुटुंब उसके साथ खड़ा दिखाई देता है। भारतीय जीवन के ऐसे बहुतेरे समृद्ध पक्ष हैं जो विदेशों के जीवन में नहीं होते हैं। हमारा समाज और हमारा कुटुंब जीवन की इन घटनाओं को उत्सव के रूप में लेता है और हमारे साथ खड़ा दिखता है। सुख-दुख दोनों ही अवसरों पर भारतीयता का यह पक्ष अन्य समुदायों की अपेक्षा अधिक उभरकर सामने आता है। छोटी-छोटी दुकानें, हाट-बाजारों की गतिविधियां, सेवागत व्यवसाय, अन्य व्यवसाय, उद्योग, परंपरा में भी परस्पर सामाजिक व कौटुम्बिक निर्भरता का इतिहास रहा है हमारा।

स्मरण करें तो मानस में आता है कि पहले के समय में कपड़ा दुकान के कोने में अपने किसी भी मित्र, रिश्तेदार, समाजबंधु को टेलर के रूप में बैठा देते थे। इसी प्रकार दवा दुकानों में वैद्य, डॉक्टर के यहाँ कौटुम्बिक दवा वाले, किरानों में हलवाई, नाई में पत्तल दोने आदि का समन्वय हुआ करता था। यहाँ सामाजिकता या कुटुंब परिवार को बढ़ावा देने का भाव होता था, कमीशन का खेल नहीं था। इसी प्रकार बड़े व्यवसाय, उद्योगों में भी लोग सहायक गतिविधियों (एलाइड सर्विसेज) के लिए अपने कुटुंब, समाज, रिश्तेदार, मित्र आदि को अवसर दिया करते थे या हैं।

इसे भी पढ़ें: खौफ का सफर खत्म: Ex मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला करने वाला मोहम्मद जीशान था कौन? गुलफाम को क्यों तलाश रही पुलिस

संघ कुटुंब परंपरा के लिए कर रहा कार्य

यह प्रवृत्ति अब कम हो रही है। अब काम-धंधों में, व्यवसाय में, वृत्ति में इस प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना आवश्यक हो चला है। भारतीय संदर्भों में इसे विकसित करना सरल भी है, क्योंकि यह हमारा आनुवांशिक स्वभाव रहा है। इसके पूर्व कि हम इन संदर्भों को बीता हुआ इतिहास मानें, समय रहते इनके लिए प्रोत्साहन नीति लाई जानी चाहिए। संघ परिवार कुटुंब परम्परा में विस्तार हेतु तमाम प्रयास कर रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में संघ परिवार की सरकारों द्वारा भी भारत की कुटुंब परंपरा को विस्तार देने हेतु विभिन्न वाणिज्यिक, व्यावसायिक, औद्योगिक आदि गतिविधियों में पुराने प्रचलनों का नव प्रवर्तन करा चाहिए।

गुजराती समुदाय पेश कर रहा उदाहरण

इस विषय में गुजराती समाज को आदर्श उदाहरण के रूप में अध्ययन हेतु देखा जा सकता है। समूचे देश में गुजराती व्यवसायी जहाँ भी जाते हैं, कुछ वर्षों में वे अपने और लोगों को वहाँ व्यवसाय हेतु बुला लेते हैं और फिर सामूहिकता के साथ खड़े रहते हैं। यह सामूहिकता परस्पर समझदारी की होती है, साझेदारी की होती है, पूरक व्यवसाय के रूप में होती है, औद्योगिक सह गतिविधि के रूप में होती है, समान व्यवसाय होने पर मिलकर मोल-भाव करने (बारगेनिंग) करने की भी होती है। इस सामूहिकता के और भी कई सारे स्वरूप होते हैं जो बड़े ही लाभकारी होते हैं।

RSS और पंच परिवर्तन

पहले व्यवसाय बड़े और संयुक्त परिवारों में केंद्रित हुआ करते थे। अब बड़े और संयुक्त परिवार लुप्त होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौवें वर्ष में ‘पंच परिवर्त्तन’ में कुटुंब परंपरा के निर्वहन का आग्रह बड़े स्तर पर योजनापूर्वक राष्ट्र के समक्ष रख ही रहा है। बड़ा परिवार एक-दो दिन में, महीने-साल में या एक दशक में नहीं होने वाला है। दो दशक में इसके परिणाम देखने को मिलेंगे। तब तक हमारा यह GEN-Z का युवा कुटुंब या संयुक्त परिवार से मिलने वाले लाभों को कैसे प्राप्त करे? यह एक बड़ा प्रश्न है। क्योंकि उद्यमिता कुटुंब माँगती है, अर्थात् सामूहिक/संयुक्त प्रयास माँगती है। जब कुछ जोड़ हाथ (दो-चार-छः लोगों के हाथ) किसी उद्यम में लगते हैं तब उद्यम की सफलता की गारंटी एकाएक बूस्ट अप हो जाती है।

भारत की कुटुंब परंपरा से वंचित यह GEN Z तब तक क्या करे? तब तक यह मित्र बनाए, पार्टनर बनाए। अपने काका के, बाबा के, मामा के, बिखरे हुए कुटुंब के, कजिंस के साथ काम करे। इनसे भी न जमे तो पड़ोसी, समाज, सहपाठी में से किसी का भी हाथ थामें और पार्टनरशिप एंटरप्रेन्योर बने। अर्थात् एक नए प्रकार का कुटुंब बनाए। हमारे उद्योग-व्यापार-वाणिज्य सिस्टम को, टैक्स सिस्टम को, वित्तीय संस्थानों को, सगे भाइयों के या कुटुंब आधारित या मित्रता आधारित ZEN-Z के उद्यमियों को, इस नाम पर, कुछ अलग इंसेंटिव व सब्सिडी आदि देनी चाहिए।

GEN-Z क्या करें

नवाचारी GEN-Z को मुख्यधारा में सम्मिलित करने का यह राष्ट्रीय क्रम GEN-Z की वर्तमान आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक (निवास) की स्थितियों के साथ युक्तियुक्तकरण से परिपूर्ण हो। इन नवाचारों के छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे, परिणाम का आकार, परिणाम का प्रकार आदि-आदि का आकलन उस नवाचारी GEN-Z के वर्तमान जीवन स्तर/शैली, भौगोलिक निवास आदि के आधार पर हो। जब भारतीय व्यक्ति समाज एवं कुटुंब परंपरा का आदि है ही तो भारतीय समाज के इस गुण को शासन ने भी प्रोत्साहित करना चाहिए व राष्ट्र विकास में इस स्वभावगत गुण का लाभ उठाना चाहिए। यहाँ हमें कुटुंब की परिभाषा विस्तारित करनी पड़ेगी, जो कि देश के जेंजी के अनुरूप होगी। क्लासमेट रहे हुए जेंजी युवा बहुत से स्टार्टअप में आ रहे हैं और अच्छा प्रदर्शन भी कर रहे हैं। हमें इस बात को बढ़ावा देना चाहिए। शासन को भी कुटुंब, कजिंस, समाज, मित्र, सहपाठी वाले उद्यमियों को, संयुक्त स्टार्ट अप को, कंपनी को या व्यवसाय को लांच करने वालों को प्रोत्साहन देना चाहिए। इन्हें कुछ अतिरिक्त वित्तीय सुविधा, प्रक्रियागत सुविधा और छूट-लाभ आदि मिलने चाहिए।

हमारी औद्योगिक, व्यावसायिक, बैंकिंग नीति में इन कुटुंब तत्त्वों की स्थापना से, इस प्रकार के उद्यमियों को बड़ी आर्थिक सहायता देने से दशक-दो-दशक में कौटुम्बिक व मित्रों के स्टार्ट अप्स की बाढ़ सी दिखने लग सकती है। इससे भारत के उद्योग व व्यवसाय जगत में कुटुंब परंपरा का या संयुक्त उद्यम परंपरा का विकास होगा। आज देश की शासकीय प्रक्रियाओं में कुटुंब परंपरा जैसी, कुछ सामाजिक परंपराओं की स्थापना से हमें सुखद, समृद्ध परिणाम मिलेंगे। शासन के कार्य का एक अंश समाज संपन्न करेगा। समाज के कार्य में शासन प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सम्मिलित रहेगा। राष्ट्र एक नए संविलयन का, नए गठजोड़ का लाभ उठायेगा। उद्यम में एक-दूसरे से जुड़े हुए GEN Z परस्पर एक-दूसरे पर नैतिक निगरानी भी रख पायेंगे। परिवार, कुटुंब, कजिंस, मित्र आदि की निगरानी से व्यवसाय में, वर्तमान समय में तेजी से व्याप्त हो रहा ‘सट्टा’, ‘शीघ्र लाभ कमाने भूत’ भी नहीं चढ़ सकेगा। इस ‘शीघ्र लाभ कमाने के भूत’ से मुक्ति, वर्तमान उद्यमियों को व्यापार सट्टा आदि जैसे कई प्रकार के अनैतिक माध्यमों को अपनाने से भी रोकेगी। वर्तमान ZEN-Z का भटकाव समाप्ति की ओर बढ़ेगा।

Topics: RSS Panch ParivartanGroup EntrepreneurshipRSS पंच परिवर्तनFamily Based Businessसंघ परिवार परंपराGEN-Z EntrepreneurshipGEN-Z स्टार्टअपIndian Startupसंयुक्त उद्यमसामूहिक उद्यमितापरिवार आधारित बिजनेसकुटुंब प्रबोधनGEN-Z एंटरप्रेन्योरशिपभारतीय स्टार्टअपSangh Parivar traditionKutumb PrabodhanGEN-Z StartupJoint Venture
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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