नई दिल्ली : मध्य पूर्व एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गया है। मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर देने वाली स्थिति पैदा कर दी है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला किया है। यह वही समुद्री रास्ता है जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा कहा जाता है। हर दिन विश्व के कुल तेल व्यापार का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।
ऐसे में ईरान द्वारा इस मार्ग की नाकाबंदी वैश्विक आर्थिक संकट का संकेत बन सकती है। यदि यह नाकाबंदी लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका असर तेल की कीमतों से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, महंगाई और वैश्विक राजनीति तक हर स्तर पर दिखाई दे सकता है।
दरअसल अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान से जुड़े ठिकानों पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों के बाद ईरान ने अपनी ये प्रतिक्रिया दी है, ईरान द्वारा अब रणनीतिक रूप से बेहद अहम हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने को लेकर इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों को रेडियो संदेश भेजकर रुकने की चेतावनी दी जा रही है।
उल्लेखनीय है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और हिंद महासागर को जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री मार्ग है। इसकी चौड़ाई कई स्थानों पर केवल लगभग 50 किलोमीटर तक रह जाती है, जिससे इसे नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। यही कारण है कि यह रास्ता हमेशा से वैश्विक रणनीतिक और आर्थिक महत्व का केंद्र रहा है।
दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात से निकलने वाला कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल कच्चा तेल इस मार्ग से गुजरता है, जोकि दुनिया की कुल खपत का लगभग 20 प्रतिशत है। इसके साथ ही वैश्विक लिक्विड नेचुरल गैस यानी एलएनजी की लगभग 20 प्रतिशत आपूर्ति भी इसी समुद्री मार्ग से होती है। इस लिहाज से देखा जाए तो यह केवल एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की धुरी है।
ईरान द्वारा इस मार्ग की नाकाबंदी की खबर सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल तेज हो गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है। तेल की कीमतों में तेज उछाल आना लगभग तय माना जा रहा है। तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है, क्योंकि ऊर्जा लागत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव उन देशों पर पड़ सकता है जो तेल के बड़े आयातक हैं। एशिया और यूरोप के कई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में तेल की आपूर्ति बाधित होने से इन देशों की आर्थिक गतिविधियों पर सीधा असर पड़ सकता है। महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों के लिए आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक स्थिति भी इसे बेहद संवेदनशील बनाती है। यह समुद्री मार्ग उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित है। इसकी कुल लंबाई लगभग 161 किलोमीटर है और कई स्थानों पर यह इतना संकरा हो जाता है कि जहाजों के लिए सुरक्षित नेविगेशन की चौड़ाई केवल दो मील तक ही रह जाती है। उथले पानी और संकरे रास्ते के कारण यहां नौसैनिक माइंस, तटीय मिसाइलों और छोटे युद्धपोतों से हमले का खतरा भी हमेशा बना रहता है।
ईरान लंबे समय से इस समुद्री मार्ग को अपने रणनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की चेतावनी देता रहा है। जब भी उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव या प्रतिबंध बढ़ते हैं, तब वह हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की संभावना का संकेत देता रहा है। लेकिन इस बार स्थिति पहले से कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है क्योंकि यह कदम सीधे सैन्य टकराव की प्रतिक्रिया के रूप में उठाया गया है।
अमेरिका ने भी क्षेत्र में बढ़ते तनाव को देखते हुए अपने व्यापारिक जहाजों को इस इलाके से दूर रहने की सलाह दी है। इससे यह संकेत मिलता है कि समुद्री मार्ग की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है। यदि इस क्षेत्र में किसी प्रकार का सैन्य टकराव बढ़ता है तो वैश्विक समुद्री व्यापार को भी बड़ा झटका लग सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश तेल निर्यात के लिए वैकल्पिक पाइपलाइन मार्गों का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। वे पूरी तरह से हॉर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प नहीं बन सकते। इसका मतलब है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी अस्थिरता आ सकती है।
तेल की कीमतों में संभावित उछाल का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। ऊर्जा की लागत बढ़ने से परिवहन महंगा होगा, उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक दिखाई देगा। यानी यह संकट सीधे तौर पर आम लोगों की जेब पर भी असर डाल सकता है। इसके साथ ही यह घटना वैश्विक राजनीति में भी नए समीकरण पैदा कर सकती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देश इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर सकते हैं। वहीं चीन और रूस जैसे देश भी इस संकट को अपने भू-राजनीतिक हितों के नजरिए से देख सकते हैं।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान की यह नाकाबंदी कितने समय तक जारी रहती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट का समाधान किस तरह निकालता है। क्योंकि यदि यह समुद्री मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो इसका प्रभाव फिर मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहते हुए पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोरता हुआ दिखाई देगा।

















