रमजान के महीने में जर्मनी में मैकडॉनल्ड्स के विज्ञापनों में खाली रैपर: ये कैसा इस्लामिक तुष्टिकरण
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रमजान के महीने में जर्मनी में मैकडॉनल्ड्स के विज्ञापनों में खाली रैपर: ये कैसा इस्लामिक तुष्टिकरण

जर्मनी में मैकडॉनल्ड्स के रमजान विज्ञापन में दिन भर खाना गायब, रात में दिखता है। टॉमी रॉबिन्सन ने इसे तुष्टिकरण बताया। क्या ब्रांड्स इस्लामी सोच के आगे झुक रहे हैं?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Feb 26, 2026, 09:18 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Germany Mcdonalds Islamic thaught

मुस्लिमों का रमजान का महीना चल रहा है और इन दिनों वे दिन में कुछ खाते नहीं हैं और अधिकतर इस्लामिक मुल्कों में खाने-पीने की चीजों के विज्ञापन को लेकर तमाम तरह के अघोषित नियम लागू होते हैं। परंतु क्या कुछ अघोषित नियम यूरोप के देशों में भी लागू हैं या फिर कंपनी खुद ही ऐसा करती हैं? यह प्रश्न इन दिनों जर्मनी में मैकडॉनल्ड्स के विज्ञापन को लेकर उभरा है।

दरअसल सोशल मीडिया पर इस्लामिक कट्टरता का सामना करने वाले तमाम यूजर्स ने कुछ तस्वीरें साझा कीं। ये तस्वीरें जर्मनी के मैकडॉनल्ड्स की थीं। रमजान के दौरान दिन के समय मैकडॉनल्ड्स के विज्ञापनों में से खाद्य सामग्री गायब थी। और रात के विज्ञापनों में वह थी। टॉमी रॉबिन्सन ने एक पोस्ट में तमाम तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि मैकडॉनल्ड्स ने जर्मनी में रमजान के दौरान दिन के समय विज्ञापनों से खाने पीने की सामग्री की तस्वीरें हटा दी हैं। वर्तमान में जर्मनी की जनसंख्या में 6.5% मुस्लिम हैं। और देश हमलावरों के लिए बदल रहा है।

McDonald's in Germany has removed images of food from advertisements during daylight hours during Ramadan.

The Muslim population of Germany is currently estimated at 6.5%.

And the country is already changing for the invader forever than vice versa. pic.twitter.com/BSaYuteAt1

— Tommy Robinson 🇬🇧 (@TRobinsonNewEra) February 25, 2026

क्या इस्लामी सोच के आगे नतमस्तक हो गया है जर्मनी

इस विज्ञापन को लेकर अब सोशल मीडिया पर शोर हो रहा है। लोग कह रहे हैं कि जर्मनी ने इस्लामिक सोच के आगे आत्म समर्पण कर दिया है। या कहें ब्रांडस ने ऐसा कर दिया है। लोग प्रश्न कर रहे हैं कि आखिर ऐसा ये कंपनी क्यों कर रही हैं? लोग कह रहे हैं कि पश्चिम सांस्कृतिक आदर को सांस्कृतिक आत्मसमर्पण के साथ भ्रमित कर रहा है। लोगों का कहना है कि दूसरों की रीति रिवाजों का आदर करना ठीक बात हैं, परंतु अपने खुद के आदर को समाप्त करना, यह तो गलत है। सह अस्तित्व के लिए संतुलन चाहिए। और एक आत्मविश्वास से पूर्ण समाज बिना नकल के और बिना स्वयं के अस्तित्व को समाप्त किये सह अस्तित्व को बनाए रख सकती है।

सोशल मीडिया पर इस कदम के कारण हंगामा मचा हुआ है, क्योंकि लोग यह प्रश्न कर रहे हैं कि रमजान तो कुछ ही लोग मनाते हैं, जबकि अधिकांश लोग ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर मैकडॉनल्ड्स ऐसा क्यों कर रहा है?

जबकि newsweek के अनुसार मैकडॉनल्ड्स के लिए इस विज्ञापन अभियान को जर्मन एजेंसी स्कोल्ज़ एंड फ्रेंड्स ने बनाया है, जिसका कॉन्सेप्ट मैकडॉनल्ड्स के सबसे पहचाने जाने वाले विज़ुअल एलिमेंट – उसके खाने – को हटाने पर है, जो रमज़ान मनाने वालों के प्रति आदर का प्रदर्शन है। अर्थात मैकडॉनल्ड्स यह सब कुछ रमजान मनाने वालों के प्रति आदर दिखाते हुए कर रहा है। इसमें जो डिजिटल बोर्डस हैं, वे दिन भर अर्थात सूरज के उगने से लेकर सूरज के डूबने तक खाली दिखते हैं और जैसे ही इफ्तारी का समय होता है, वे अपने आप भरे हुए दिखाई देने लगते हैं।

तुष्टिकरण क्यों?

जहां एक ओर इस विज्ञापन को लेकर कुछ लोगों का गुस्सा चरम पर है तो वहीं कुछ लोगों का कहना यह है कि ऐसे अभियान समावेशीकरण के लिए आवश्यक हैं। और ब्रांड्स दूसरे समुदायों में अपनी पैठ बनाने के लिए ऐसे कदम उठाते रहते हैं। परंतु लोगों का कहना है कि आखिर एक समावेशीकरण वाले समाज में कुछ लोगों को विशेष अधिकार क्यों दिए जा रहे हैं? लोगों का कहना है कि धीरे-धीरे जर्मनी ही नहीं, बल्कि फ्रांसीसी और अंग्रेज भी अपने ही देशों में अल्पसंख्यक हो जाएंगे और मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे।

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ मुस्लिमों का यह भी कहना है कि उन्हें इस बात से कोई आपत्ति नहीं होती है कि उनके साथ काम करने वाले लोग उनके रोज़ों के दौरान उनके सामने खाते पीते रहते हैं। उनका कहना है कि ऐसे विज्ञापन मुस्लिमों के प्रति नफरत पैदा करते हैं, क्योंकि इन विज्ञापनों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मुस्लिमों ने अनुरोध करके दूसरे समुदायों के प्रति असहिष्णु विज्ञापन बनवाए हैं, परंतु ऐसा ब्रांडस अपने आप करते हैं। मुस्लिम समुदाय ने ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया होता है।

टोनी रॉबिन्सन की पोस्ट पर एक यूजर ने टिप्पणी की कि अमेरिका के कुछ स्कूल्स में हलाल इफ्तार भोजन उन मुस्लिम विद्यार्थियों के साथ भेजा जा रहा है, जो स्कूल के समय में रोज़े रखे हुए हैं।

American schools across the country are sending halal iftar meals home with Muslim students who are fasting during school hours. At taxpayer expense, no less. They're less than 2% here. Enough is enough. pic.twitter.com/9xYro63oAA

— Anna D. West 🇺🇸 (@SlimWiggy) February 25, 2026

ऐसा नहीं है कि यह जर्मनी में या अमेरिका मे हो रहा है। डेविड अथेरटॉन नामक यूजर ने यूके की लेबर के नेतृत्व वाली camdem council का एक वीडियो साझा किया। इसमें इस काउंसिल के उस प्रस्ताव के विषय में बताया जा रहा है कि पार्क में कुत्तों को प्रतिबंधित किया जा सकता है। और इस प्रस्ताव को कई भाषाओं में भेजा गया था। अंतिम अनुवाद अंग्रेजी का था। इसमें यह भी कहा गया है कि गैर मुस्लिम रमजान के दौरान मुस्लिमों के पास बैठकर खाना न खाएं।

यूरोप से लेकर अमेरिका तक ऐसे तमाम कदम सरकारी स्तर पर और बाजार के स्तर पर उठाए जा रहे हैं, जिन्हें लेकर एक बहुत बड़े वर्ग में आक्रोश है, परंतु क्या यह आक्रोश सफल होगा या फिर विज्ञापन अभियान और सरकारी अभियान एकतरफा चलाए जाते रहेंगे और मल्टीकल्चरिज्म के नाम पर केवल तुष्टीकरण चलता रहेगा? यह प्रश्न जितना ज्वलनशील है, उतना ही अनुत्तरित भी है!

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