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टीपू बहाना, वोट बढ़ाना

टीपू के महिमामंडन की शुरुआत कांग्रेस ने 1930 में मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए की थी। उस समय ‘यंग इंडिया’ में एक लेख प्रकाशित कर टीपू को ‘स्वातंत्र्य योद्धा’ और ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक’ बताया। बाद में कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने 2015 से ‘टीपू जयंती’ समारोह मनाना शुरू किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 23, 2026, 08:19 am IST
in भारत, विश्लेषण
मालेगांव नगर निगम की उपमहापौर के कार्यालय में टीपू की फोटो

मालेगांव नगर निगम की उपमहापौर के कार्यालय में टीपू की फोटो

कांग्रेस का टीपू प्रेम शुरू से जगजाहिर है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने छत्रपति शिवाजी महाराज के संघर्ष की तुलना टीपू सुल्तान से की है। भाजपा नेता धीरज घाटे की शिकायत पर पुणे में सपकाल के विरुद्ध बीएनएस की धारा 192, 196(1)(2), 352, 356(2) के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सपकाल के बयान को शर्मनाक बताया है। लेकिन सपकाल का कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है। उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

दरअसल, इस विवाद की शुरुआत मालेगांव से हुई। 12 फरवरी, 2026 को मालेगांव नगर निगम की उपमहापौर शान-ए-हिंद अहमद ने अपने कार्यालय में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाई। इस पर शिवसेना (शिंदे गुट), भाजपा और हिंदू संगठनों ने विरोध शुरू किया। शिवसेना नेता निलेश ओलोहर ने अहमद को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया। इसके बाद उपमहापौर ने तस्वीर हटा दी। लेकिन विवाद तब बढ़ा, जब महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने टीपू की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज से कर दी। बाद में असदुद्दीन ओवैसी भी इसमें कूद पड़े। ओवैसी ने कहा, ‘टीपू सुल्तान अंग्रेजों से लड़ते हुए ‘शहीद’ हुए थे।’

महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे ने टीपू सुल्तान की तस्वीर को लेकर कांग्रेस और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि पर टीपू की तस्वीर बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, सपकाल द्वारा माफी मांगने के बावजूद यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। राणे ने कहा कि उपमहापौर यह भूल गए हैं कि वे हिंदू राष्ट्र में हैं। टीपू ने हजारों हिंदुओं का कत्लेआम किया और ऐसी पृष्ठभूमि में उसकी तस्वीर लगाना समझ से परे है। टीपू ने अपनी तलवार के बारे में कहा था कि उसे इसने हिंदुओं का कत्ल करने के लिए बनवाया था।

ऐसे हुई विवाद की शुरुआत

यह विवाद भारत की राजनीति का आईना है, जहां मजहब के नाम पर खलनायक को नायक बना दिया जाता है। औरंगजेब की कब्र पर फूल, जिन्ना की तस्वीरों की आड़ में कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण चरम पर है। सपकाल का बयान उसी कड़ी का हिस्सा है।
टीपू पर पहला विवाद 1930 में हुआ, जब सत्य तथा अहिंसा का समर्थन करते हुए कांग्रेस ने उसे ‘स्वातंत्र्य योद्धा’ बताया। 23 जनवरी, 1930 को ‘यंग इंडिया’ के पृष्ठ 30 पर प्रकाशित इस लेख में कहा गया कि ‘‘टीपू सुल्तान एक महान योद्धा थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध वीरतापूर्वक संघर्ष किया। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे।’’ लेख स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में आया था, जब कांग्रेस मुस्लिम समुदाय को एकजुट करने हेतु ऐतिहासिक आंकड़ों का उपयोग कर रही थी। तब इस पर कलकत्ता के मॉडर्न रिव्यू प्रतिक्रिया दी थी। मॉडर्न रिव्यू ने लिखा कि यंग इंडिया में टीपू का मतांध और हिंदुओं का जबरन कन्वर्जन कराने वाला मत भी देना चाहिए था। इसके बावजूद कांग्रेस ने टीपू-महिमामंडन जारी रखा।

1973 में इंदिरा गांधी ने टीपू की 146वीं जयंती पर श्रीरंगपट्टनम में उसकी कब्र पर मखमल की चादर चढ़ाई थी। यह मुस्लिम वोट साधने की रणनीति थी। टीपू के प्रति कांग्रेस का प्रेम 2015 में सामने आया, जब तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार ने 10 नवंबर को टीपू जयंती मनाने की घोषणा की। इसके बाद यह मुद्दा कर्नाटक की पहचान-राजनीति का स्थायी विषय बन गया। भाजपा और हिंदू संगठनों ने इसका जबरदस्त विरोध किया। कुछ स्थानों पर विरोध प्रदर्शन और हिंसक घटनाएं भी हुई थीं। राज्य सरकार के इस फैसले को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।

स्वतंत्रता सेनानी नहीं था टीपू

2016 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस पर रोक तो नहीं लगाई, लेकिन इसे राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ दिया। साथ ही, स्पष्ट किया कि टीपू सुल्तान स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि एक शासक था, जिसने अपने राज्य के हितों की रक्षा के लिए युद्ध किया। साथ ही, राज्य सरकार को फटकार भी लगाई थी। मुख्य न्यायाधीश एस.के. मुखर्जी ने खंडपीठ की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि टीपू जयंती समारोह आयोजित करने को लेकर सरकार इतनी उत्साहित क्यों है? टीपू जयंती मनाने की क्या आवश्यकता है? लेकिन 2018 तक सिद्धारमैया सरकार टीपू जयंती मनाती रही। 2019 में सरकार बदली और भाजपा सत्ता में आई तो टीपू जयंती समारोह बंद कर दिए गए। बाद में कांग्रेस के सत्ता में आने पर 2023 में सिद्धारमैया ने फिर से यह प्रथा शुरू की। सिद्धारमैया टीपू पर हिंदुओं को मारने और मंदिरों को नष्ट करने के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए इसे टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली के खिलाफ राजनीतिक आरोप करार दिया था। कांग्रेस टीपू को पंथनिरपेक्ष बताती है।

प्रश्न है कि टीपू, जो एक जिहादी था, रातोंरात ‘स्वतंत्र्य योद्धा’ और महान कैसे बन गया? दरअसल, कांग्रेस, वामपंथी लेखों और छद्म सेकुलरों में इसकी भूमिका स्पष्ट देखी जा सकती है।

पहले कांग्रेस की ही बात करते हैं। कांग्रेस की भूमिका प्रारंभ से मुसलमानों को बहकाने, फुसलाने तथा लुभाने की रही है। गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे कांग्रेसी नेताओं ने इसे स्वीकार किया है। इतिहासकारों ने लंबे समय तक टीपू को स्वतंत्रता सेनानी बताकर पाठ्यक्रमों में पढ़ाया, किंतु सही इतिहास सामने आया तो उसकी पोल खुल गई। कांग्रेस सरकार जिसकी जयंती मनाती है, वह टीपू हिंदुओं का हत्यारा एवं मंदिर-भंजक है। अब मैसूर सुल्तान के स्याह पक्ष को उजागर करने वाली फिल्म भी आ रही है, जिसे इरोस इंटरनेशनल बना रहा है। ‘हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान’ में मोहीब्बुल हसन लिखते हैं, ‘‘यह कहना कि टीपू ने भारतीयों की स्वतंत्रता के लिए विदेशियों से लोहा लिया, सर्वथा अन्याय है। वास्तव में वह केवल अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ा।’’

टीपू सुल्तान विवाद केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन नहीं, बल्कि कांग्रेस के दीर्घकालिक वोटबैंक तुष्टीकरण का आईना भी है। कांग्रेस उसे ‘अंग्रेज-विरोधी नायक’ बनाती है, जबकि इतिहासकार कूर्ग-मालाबार में उसके धार्मिक दमन को रेखांकित करते हैं। दरअसल, कांग्रेस की निगाह पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों के मुस्लिम वोट बैंक पर है, जहां इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

Topics: पहचान की राजनीतिऐतिहासिक मिथ्याकरणवैचारिक ध्रुवीकरणपंथनिरपेक्षता का मुखौटाकट्टरपंथी शासकसांस्कृतिक गौरव बनाम मजहबी कट्टरताशिवाजी महाराजस्वराज्य और टीपूसेकुलरमजहबी शासनवोट बैंक की राजनीतिन्यायिक हस्तक्षेप‘मुस्लिम तुष्टीकरणपाञ्चजन्य विशेष
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