कब वापस लिया जाएगा पीओजेके? 1994 के राष्ट्रीय संकल्प का क्या हुआ? पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर हमारा
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कब वापस लिया जाएगा पीओजेके? 1994 के राष्ट्रीय संकल्प का क्या हुआ? पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर हमारा

नब्बे के दशक के आरंभ में पीओजेके को लेकर संसद का सर्वसम्मत रुख दर्ज है। इसे लेकर भारत का बड़ा हिस्सा अनभिज्ञ है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य — edited by Lalit Fulara
Feb 22, 2026, 05:54 pm IST
inभारत, मत अभिमत

नब्बे के दशक के आरंभ में पीओजेके को लेकर संसद का सर्वसम्मत रुख दर्ज है। इसे लेकर भारत का बड़ा हिस्सा अनभिज्ञ है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) को लेकर 22 फरवरी का दिन एक अर्सें से संकल्प दिवस के रुप में मनाया जा रहा है। इस बार भी देशभर में संगोष्ठियों, व्याख्यानों, प्रदर्शनियां और जनजागरण कार्यक्रम हुए।

मूल प्रश्न यह है कि क्या इस विषय पर आयोजन केवल प्रतीकात्मक औपचारिकता और रस्म अदायगी बन कर चलते रहेंगे या वास्तव में राष्ट्रीय विमर्श को ठोस दिशा में लेकर जा रहे हैं? 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर स्पष्ट कहा था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेना राष्ट्रीय संकल्प है।

क्यों तीन दशक बाद भी ये प्रस्ताव जनचेतना के केंद्र में स्थापित नहीं हो पाया
तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह प्रस्ताव जनचेतना के केंद्र में कभी स्थायी रूप से स्थापित नहीं हो पाया। विडंबना है कि जिस विषय पर संसद का सर्वसम्मत रुख दर्ज है, उसकी जानकारी आज भी देश के बड़े हिस्से तक व्यवस्थित रूप से नहीं पहुंची। दरअसल, पीओजेके का मुद्दा केवल राजनीतिक नारे या भावनात्मक विमर्श का विषय नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य, भू-राजनीतिक वास्तविकता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

1947 से पूर्व जम्मू-कश्मीर रियासत का कुल क्षेत्रफल लगभग 2.22 लाख वर्ग किलोमीटर था। इसका बड़ा हिस्सा आज पाकिस्तान और चीन के नियंत्रण में है। मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान और अक्साईचिन जैसे क्षेत्रों का उल्लेख केवल नक्शे की रेखाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व की तथ्यपरक समझ विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। सबसे बड़ी कमी यह रही है कि पीओजेके से जुड़े विस्थापित समुदायों, उनके अनुभवों और मानवाधिकार से जुड़े प्रश्नों पर राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित गंभीर चर्चा नहीं हो सकी। परिणाम सबके सामने है।

पीओजेके के प्रश्न को केवल सीमा विवाद के दृष्टिकोण से न देखा जाए
यह विषय अकादमिक विमर्श और सीमित मंचों तक सिमटा है, जबकि व्यापक समाज तक इसकी तथ्यात्मक प्रस्तुति का अभाव बना रहा। अब संकल्प दिवस को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक आन पड़ी है, ताकि यह आयोजन केवल श्रद्धांजली सभाओं और औपचारिक कार्यक्रमों तक न सिमटे, बल्कि शोध-आधारित संवाद, दस्तावेजीकरण और शैक्षणिक संस्थानों में गंभीर चर्चा का हिस्सा बने।

खास बात यह है कि पीओजेके के प्रश्न को केवल सीमा विवाद के दृष्टिकोण से न देखा जाए। यह विषय राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक दायित्व और विस्थापित समुदायों की पीड़ा से जुड़ा है। यदि इस पर विमर्श तथ्यों, शोध और जिम्मेदार प्रस्तुति के आधार पर आगे बढ़ता है, तो ही यह भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है।

1994 का प्रस्ताव केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज बनकर न रह जाए
सच यह है कि संकल्प तभी फलीभूत होगा,जब वह राष्ट्रीय चेतना और नीति-स्तर की प्राथमिकताओं में पर खरा हो। 1994 का प्रस्ताव केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज बनकर न रह जाए, इसके लिए आवश्यक है कि समाज, शिक्षण संस्थान और नीति-निर्माता समान रूप से इस विषय पर ठोस, तथ्याधारित और दीर्घकालिक विमर्श को आगे बढ़ाएं। अन्यथा संकल्प दिवस हर वर्ष मनाया जाएगा, चर्चा होगी, कार्यक्रम होंगे, परंतु मूल प्रश्न वहीं का वहीं खड़ा रहेगा कि राष्ट्रीय संकल्प को व्यवहारिक राष्ट्रीय विमर्श में कितना बदला गया। अगर कोई प्रस्ताव तीन दशक तक नीति-निर्माण, कूटनीति, पाठ्यपुस्तकों और जनजागरण में केंद्रीय मुद्दा नहीं बन पाता, तो स्वाभाविक है कि जनता का बड़ा हिस्सा अनभिज्ञ रहेगा और यह अनभिज्ञता राजनीतिक और संस्थागत प्राथमिकताओं का परिणाम है।

(राजेश शांडिल्य/संपादक विश्व संवाद केंद्र)

 

Topics: parliamentIndian ArmyPakistan occupied Jammu and KashmirNational ResolutionWhen will PoJK be taken back
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
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