यरूशलम से सिंध तक : पहले इतिहास, 3000 वर्ष मिटाए नहीं जा सकते, समझिए इज़राइल-फिलिस्तीन की कहानी
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यरूशलम से सिंध तक : पहले इतिहास, 3000 वर्ष मिटाए नहीं जा सकते, समझिए इज़राइल-फिलिस्तीन की कहानी

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद को समझने के लिए तीन हजार वर्ष पुराने यहूदी संबंधों, अरब-इस्लामी इतिहास, 1948 में इज़राइल की स्थापना और आधुनिक राजनीतिक घटनाओं को साथ देखना जरूरी है। जानिए कैसे ऐतिहासिक जटिलता को नजरअंदाज करना संघर्ष को बढ़ाता है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Feb 20, 2026, 08:56 pm IST
inविश्व

इज़राइल-फिलिस्तीन और मध्य-पूर्व से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बहस अक्सर लंबे और जटिल इतिहास को एक ही कहानी में सीमित कर देती है। अक्सर यह कहा जाता है कि यहूदी लोग केवल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस क्षेत्र में आए और इसलिए उनका इस भूमि से कोई ऐतिहासिक संबंध नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य कहीं अधिक बहुस्तरीय और जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

प्राचीन काल से यहूदी समुदाय की उपस्थिति

ऐतिहासिक रूप से इज़राइल या फिलिस्तीन कहे जाने वाले क्षेत्र में यहूदी समुदाय लगभग तीन हजार वर्षों से मौजूद रहा है। यरूशलम प्राचीन काल से यहूदी धर्म का केंद्रीय धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है। रोमन, बीजान्टिन, अरब, ओटोमन — अनेक साम्राज्यों के शासन और निर्वासन के बावजूद यरूशलम, हेब्रोन, सफ़ेद और तिबेरियास जैसे शहरों में यहूदी समुदाय निरंतर मौजूद रहा।

7वीं शताब्दी के बाद अरब समुदायों की जड़ें

साथ ही, 7वीं शताब्दी में इस्लाम के उदय और विस्तार के बाद अरब मुस्लिम और ईसाई समुदायों ने भी इस क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाईं। समय के साथ यह भूमि अनेक धर्मों और संस्कृतियों का साझा निवास स्थान बन गई। यरूशलम यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों — तीनों के लिए पवित्र है।

द्वितीय विश्व युद्ध, होलोकॉस्ट और 1948 में इज़राइल की स्थापना

द्वितीय विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद बड़ी संख्या में यहूदी शरणार्थी इस क्षेत्र में आए और 1948 में आधुनिक इज़राइल राज्य की स्थापना हुई। इस प्रक्रिया ने जनसांख्यिकीय और राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से प्रभावित किया और फिलिस्तीनी अरब समुदाय के विस्थापन और पीड़ा का कारण भी बनी। इसलिए वर्तमान संघर्ष प्राचीन ऐतिहासिक संबंधों और आधुनिक राजनीतिक घटनाओं दोनों का परिणाम है।

दोनों समुदायों के ऐतिहासिक संबंधों को स्वीकार करने की आवश्यकता

यह कहना कि यहूदियों का इस भूमि से कोई संबंध नहीं है, इतिहास को नकारना है। उसी प्रकार फिलिस्तीनी समुदाय के ऐतिहासिक और भावनात्मक संबंधों को नकारना भी वास्तविकता का सरलीकरण है। स्थायी शांति किसी एक समुदाय के अस्तित्व को अस्वीकार करने से नहीं आ सकती।

भारतीय संदर्भ में इतिहास की कालक्रमिक समझ

भारतीय संदर्भ में भी इतिहास की कालक्रमिक समझ आवश्यक है। भारतीय उपमहाद्वीप पर पहला प्रमुख इस्लामी सैन्य आक्रमण 711–712 ईस्वी में हुआ, जब मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर आक्रमण किया और स्थानीय शासक राजा दाहिर को पराजित किया। यह घटना उस समय हुई जब भारतीय उपमहाद्वीप में सनातन परंपराएँ, वैदिक दर्शन, बौद्ध और जैन विचारधाराएँ, समृद्ध व्यापारिक नेटवर्क और विकसित सांस्कृतिक संरचनाएँ पहले से विद्यमान थीं।

भारत का परतदार और बहुआयामी इतिहास

भारत का इतिहास भी परतदार है — प्राचीन सभ्यताओं से लेकर मध्यकालीन राजवंशों और औपनिवेशिक शासन तक। किसी भी कालखंड को पूर्णतः मूल और किसी अन्य को पूर्णतः बाहरी बताना ऐतिहासिक जटिलता को नज़रअंदाज़ करना है।

राजनीतिक व्याख्याओं से परे इतिहास की स्वीकार्यता

चाहे पश्चिम एशिया हो या दक्षिण एशिया — इतिहास को राजनीतिक नारे या विस्तारवादी व्याख्याओं के माध्यम से पुनर्परिभाषित करने का प्रयास अक्सर संघर्ष को गहरा करता है। स्थायी समाधान तभी संभव है जब यह स्वीकार किया जाए कि समाज सदियों से बहुस्तरीय, विविध और परस्पर जुड़े रहे हैं।

शांति और स्थिरता के लिए तथ्य आधारित संवाद

अंततः स्थिरता और शांति उसी समाज में संभव है जो अपने इतिहास की जटिलता को स्वीकार करे, सभी समुदायों की गरिमा और अधिकारों का सम्मान करे, और भावनात्मक सरलीकरण के बजाय तथ्यों पर आधारित संवाद को प्राथमिकता दे।

Topics: पश्चिम एशिया इतिहासभारतीय इतिहास परिप्रेक्ष्यधार्मिक इतिहासभू-राजनीति विश्लेषणisraelPalestinejerusalemholocaustArab conquest of Sindhमध्य-पूर्व राजनीतिइज़राइल फिलिस्तीन संघर्ष
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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