ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका ईरान को सैन्य तैनाती के जरिए लगातार घेर रहा है। इसके साथ ही उस पर डील करने का दबाव बना रहा है। इसी क्रम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ न्यूक्लियर डील होने या न होने का फैसला अगले करीब 10 दिनों में साफ हो जाएगा। “बोर्ड ऑफ पीस” की पहली मीटिंग में ट्रंप ने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दिए जाएंगे, और अगर वो इलाके में अस्थिरता फैलाने की धमकी देते रहे तो “बुरा होगा”।
ट्रंप ने मंगलवार को जेनेवा में हुई बातचीत का जिक्र किया, जहां अमेरिकी प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर ने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। ईरान ने वादा किया है कि वो दो हफ्ते में अमेरिका की मांगों पर जवाब देगा – मतलब यूरेनियम संवर्धन छोड़ने के बदले प्रतिबंध हटवाने की डील।
अरब सागर में तेजी से हो रही तैनाती
अभी USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर और उसका स्ट्राइक ग्रुप अरब सागर में करीब एक महीने से तैनात है, ईरान के तट से लगभग 700 किलोमीटर दूर। इसमें 9 स्क्वाड्रन के एयरक्राफ्ट हैं– F-35 लाइटनिंग II और F/A-18 सुपर हॉर्नेट्स जैसे फाइटर जेट्स। अब दूसरा कैरियर स्ट्राइक ग्रुप आ रहा है, जिसकी लीडरशिप USS जेराल्ड आर फोर्ड कर रहा है। ये अभी अटलांटिक में मोरक्को के पश्चिम में था और जल्द ही स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर से गुजरकर पूर्वी भूमध्य सागर की तरफ आएगा। फोर्ड हाल ही में कैरिबियन से आया है, जहां जनवरी में उसने वेनेजुएला के निकोलस मदुरो को एक रात के रेड में पकड़ने में रोल प्ले किया था।
दोनों कैरियर ग्रुप्स मिलकर रोजाना सैकड़ों स्ट्राइक मिशन कर सकते हैं – कुछ हफ्तों तक। रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के मैथ्यू सैविल के मुताबिक, ये 12-दिन के पिछले युद्ध से ज्यादा तीव्रता वाला होगा। सिर्फ लिंकन से भी रोज 125 से ज्यादा बॉम्बिंग मिशन हो सकते हैं। इसके अलावा, कई मिलिट्री प्लेन मध्य पूर्व पहुंचे हैं। सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर 6 E-3 सेंट्री AWACS (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) तैनात किए गए हैं, जो अमेरिका और जापान से आए हैं। ये रीयल-टाइम कमांड और कंट्रोल के लिए बहुत जरूरी हैं।
इसे भी पढ़ें: एआई क्षेत्र में 1.6 अरब यूरो का निवेश! : AI शिखर सम्मेलन में ब्रिटेन का बड़ा ऐलान
ईरान की स्थिति
पिछले साल जून में 12-दिन के युद्ध में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु साइट्स पर बमबारी की थी, जिसमें फोर्डो फैसिलिटी भी शामिल थी। B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स इस्तेमाल हुए थे। इस हमले से ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम काफी पीछे धकेल दिया गया, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान अब बड़े पैमाने पर यूरेनियम संवर्धन या सेंट्रीफ्यूज बनाने में सक्षम नहीं दिखता। लेकिन 440 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम का ठिकाना अभी अनिश्चित है – अगर इसे 90% तक ले जाया जाए तो करीब 10 न्यूक्लियर हथियार बन सकते हैं।
इजरायल अब ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर फोकस चाहता है। ईरान के पास करीब 2,000 मिसाइलें हैं और 25 लॉन्च बेस, जिनमें से 6 पर पिछले हमले में नहीं पहुंचा गया। ईरान की एयर डिफेंस कमजोर है – पिछले युद्ध में इजरायल ने इसे आसानी से दबा दिया था। ईरान अब काउंटर-अटैक पर निर्भर है।
क्या कहता है ईरान
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने मंगलवार को अमेरिकी युद्धपोतों को “समुद्र में डुबोने” की धमकी दी। ईरान की UN मिशन ने गुरुवार को सेक्रेटरी जनरल को चिट्ठी लिखी कि अगर आक्रामकता हुई तो इलाके में “हॉस्टाइल फोर्स” के बेस और एसेट्स को वैध टारगेट माना जाएगा।
ब्रिटेन बोला-अपने बेस का इस्तेमाल नहीं होने देंगे
अमेरिका ने इलाके में एयर डिफेंस बढ़ाई है। कतर के अल-उदीद एयरबेस पर पैट्रियट सिस्टम तैनात है। साइप्रस के पास अमेरिकी डिस्ट्रॉयर्स बैलिस्टिक मिसाइल्स को इंटरसेप्ट कर सकते हैं। ब्रिटेन ने कहा है कि वो अपने बेस को B-2 बॉम्बर्स के लिए इस्तेमाल नहीं करने देगा, लेकिन अगर सहयोगी पर हमला हुआ तो डिफेंड कर सकता है। पिछले महीने RAF की 12 स्क्वाड्रन टाइफून जेट्स कतर पहुंची हैं।

















