भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और उनके साथ 25 सांसदों ने भी मंत्री पद की शपथ ली है। इस बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार में अल्पसंख्यक समुदायों से दो मंत्री बनने से उस देश में आज बची कुल 8 प्रतिशत हिन्दू आबादी में कुछ हद तक राहत महसूस की जा रही होगी।
हालांकि जब 20 साल पहले बीएनपी की सरकार थी और तारिक रहमान की मां खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं तब वहां हिन्दुओं की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं थी। लेकिन गत 18 महीने से वहां मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में रही अंतरिम सरकार में जमाते इस्लामी और अन्य मजहबी कट्टर तत्वों ने खुलकर हिन्दू विरोधी हिंसा मचाई हुई थी। अब भले दीपू चंद्र दास के घर वालों को 25 लाख बांग्लादेशी टका की राहत राशि दी गई है, लेकिन क्या इतना भर दीपू की उस दर्दनाक हत्या की भरपाई के लिए काफी है। आज बांग्लादेश के फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने की महती जिम्मेदारी के साथ ही, तारिक के सामने सबसे बड़ी चुनौती वहां के हिन्दुओं के मन में सुरक्षा का भाव जगाना है।
तारिक सरकार में दो सांसदों, निताई रॉय चौधरी और दीपेन दीवान को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई है। ये दोनों असल में वहां के हिन्दू और बौद्ध समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि तारिक का यह कदम अंतरिम सरकार के राज में अल्पसंख्यकों पर हुई हिंसा के उत्तर में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, लेकिन इतना भर पर्याप्त नहीं रहने वाला है।

1949 में जन्मे निताई रॉय चौधरी पेशे से वकील और अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। वे मगुरा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए हैं और बीएनपी के शीर्ष रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। पार्टी नेतृत्व के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के प्रत्याशी को हराया है। बता दें कि चौधरी पहले भी संसद सदस्य और मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने हुसैन मुहम्मद इरशाद की सरकार में युवा एवं खेल मंत्री का पद संभाला था। वर्तमान में वे बीएनपी की सेंट्रल कमेटी के उपाध्यक्ष हैं। उनके समधी गोयेश्वर चंद्र रॉय भी प्रमुख हिन्दू नेता हैं, सांसद बने हैं, लेकिन इस बार चौधरी को मंत्री नहीं बनाया गया है। खालिदा जिया के कार्यकालों में भी सरकार में हिन्दू मंत्रियों की मौजूदगी रही थी।
दीपेन दीवान बौद्ध समुदाय से आते हैं और चकमा बौद्धों के नेता के रूप में जाने जाते हैं। वे अल्पसंख्यक समुदाय के दूसरे प्रतिनिधि के रूप में कैबिनेट में शामिल हुए हैं। दीवान का चयन पर्वतीय क्षेत्रों के अल्पसंख्यकों की आवाज के प्रतिनिधि के तौर पर किया गया है। वे मंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं और सरकार में स्थिरता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
क्या होगी भूमिका?
लेकिन इन दोनों मंत्रियों की भूमिका में अंतरिम सरकार के शासनकाल में बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुई व्यापक हिंसा के विरुद्ध कार्रवाई करना भी होगा? नवंबर 2025 से फरवरी 2026 तक हिन्दुओं की हत्याएं, मॉब लिंचिंग और संपत्ति को जलाने जैसी घटनाएं निरंतर होती रही हैं। इन हमलों ने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां तो बटोरीं लेकिन तत्कालीन यूनुस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की, सिवाय बयान देकर घड़ियाली आंसू टपकाने के।
बीएनपी को 13वें संसदीय चुनाव में 209 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कट्टर इस्लाम का राज चाहने वाली जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें ही मिलीं। जमाते इस्लामी को पाकिस्तान की कठपुतली भी कहा जाता है।
कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दो अल्पसंख्यक मंत्रियों को सरकार में शामिल करना तारिक का सकारात्मक कदम तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक तृतीयोमात्राडॉटकॉम के अनुसार, निताई रॉय चौधरी जैसे नेताओं का चयन बीएनपी की रणनीति को मजबूत करता है, पर जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव कुछ हिस्सों में हिंसा को जारी रख सकता है।

इसमें संदेह नहीं है कि कट्टर तत्वों पर लगाम लगाने के लिए सख्त कानून जरूरी हैं। जबकि फिलहाल बीएनपी की चुनावी जीत के बावजूद जमाते इस्लामी के उग्र तेवरों के चलते अस्थिरता बनी हुई है। हिन्दू हिंसा पर लगाम लगाने के लिए ठोस नीतियां अपेक्षित हैं। अन्यथा जमात के 68 सांसद हिंसा भड़काए रख सकते हैं।
चाहिए सुरक्षा कानून
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार अल्पसंख्यक सुरक्षा कानून लागू करे और जमात पर नियंत्रण रखे, तो दमन रुक सकता है। अन्यथा, कट्टर तत्व मनमानी करते रहेंगे। दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का इस दृष्टि से प्रभावी हस्तक्षेप भी स्थितियों को सुधार सकता है। विश्व हिंदू परिषद ने बांग्लादेश की नई सरकार से सुरक्षा की उम्मीद जताई है, लेकिन संगठन ने गत दिसंबर से चली आ रहीं मजहबी उन्मादियों की हिंसात्मक गतिविधियों पर बारीक नजर रखने की बात भी कही है।
बीएनपी की जमाते इस्लामी से कमोबेश दूरी ही रही है। तारिक रहमान ने भी गत दिनों भारत के साथ संबंध सुधारने की बात की है। इसलिए किसी वहां किसी तरह का अल्पसंख्यक सुरक्षा कानून बनने की जरूरत महसूस की जा रही है। भारत को की कूटनीतिक प्रयास बढ़ाने होंगे।

















