बांग्लादेश में 13वीं संसदीय चुनाव की तैयारी जोरों पर है, जो 12 फरवरी 2026 को होने वाले हैं। इन चुनावों में एक तरफ बड़ा मुद्दा बन गया है दो इस्लामी संगठनों के बीच का टकराव। हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश ने जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ खुलकर बयान दिया है और कहा है कि जमात को वोट देना मुसलमानों के लिए हराम है।
हिफाजत-ए-इस्लाम का ऐलान
हिफाजत-ए-इस्लाम के अमीर अल्लामा शाह मुहिब्बुल्लाह बाबूनगरी ने 5 फरवरी 2026 को चटगांव के फटिकछड़ी में एक मदरसे के कार्यक्रम में ये बात कही। उन्होंने कहा, “मेरे लिए ये चुनाव नहीं है, ये जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ जिहाद है।” उन्होंने साफ तौर पर फतवा दिया कि “जमात को वोट देना सभी मुसलमानों के लिए हराम है और किसी भी हाल में जायज नहीं।”
बाबूनगरी ने आगे कहा, “हमारे और जमात-ए-इस्लामी के बीच बुनियादी और सैद्धान्तिक मतभेद हैं। वे धर्म की सही व्याख्या नहीं करते। इसलिए हमें एकजुट होकर इस झूठी ताकत को बढ़ने से रोकना होगा।”
मतभेद की वजह
ये दोनों संगठन इस्लाम की अलग-अलग समझ रखते हैं। हिफाजत-ए-इस्लाम मदीना के इस्लाम की बात करता है, जो नैतिक सुधार, समुदाय की सहमति, बहुलवाद और पैगंबर की परंपरा पर आधारित है। वहीं जमात-ए-इस्लामी अपने संस्थापक अबुल आला मौदूदी की विचारधारा पर चलती है, जिसमें इस्लाम को एक पूरा राजनीतिक सिस्टम माना जाता है, जहां संप्रभुता सिर्फ अल्लाह की होती है और धर्म व राजनीति अलग नहीं हो सकते। हिफाजत इसे गलत मानती है और कहती है कि जमात की व्याख्या में गड़बड़ी है।
अगस्त 2025 में भी बाबूनगरी ने जमात को “पाखंडी इस्लामी पार्टी” कहा था, जो मौदूदी का इस्लाम फॉलो करती है, जबकि हिफाजत मदीना का इस्लाम मानती है।
बीएनपी को समर्थन
हिफाजत ने चटगांव में एक बीएनपी उम्मीदवार को खुला समर्थन दिया है। ये फैसला चुनाव से ठीक पहले आया है। पहले हिफाजत जमात के साथ गठबंधन में रही है, लेकिन अब जमात के खिलाफ हो गई है। बीएनपी ने सितंबर 2025 से ही हिफाजत से संपर्क बढ़ाया था।
जमात-ए-इस्लामी का पक्ष
जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान हैं। पार्टी लंबे समय बाद मुख्यधारा में लौटी है। सर्वे बताते हैं कि फरवरी 2026 के चुनाव में जमात काफी मजबूत दिख रही है और बीएनपी के काफी करीब पहुंच सकती है।
हिफाजत-ए-इस्लाम की पृष्ठभूमि
हिफाजत-ए-इस्लाम 2010 में बना एक सुन्नी-देवबंदी संगठन है, जो क़ौमी मदरसों पर आधारित है। इसका मुख्यालय चटगांव में है। ये खुद को गैर-राजनीतिक कहता है, लेकिन इस्लाम के मुद्दों पर बड़े आंदोलन चलाता है और सरकार पर दबाव बनाता है। इसके 13 सूत्री चार्टर में बांग्लादेश को इस्लामी ढांचे में ढालने की बात है। ये चुनाव मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के तहत हो रहे हैं, जिसमें जुलाई चार्टर को भी वोट से मंजूरी मांगी जा रही है। हिफाजत और जमात के बीच ये टकराव चुनावी माहौल को और गर्म कर रहा है।

















