तारिक रहमान के बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है, लेकिन उनके शपथ लेने के दौरान और उसके बाद से ही वहां की कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी सड़कों पर उतरी हुई है। मतदान में धांधली के आरोप लगाते हुए जमात ने फिर से चुनाव कराने की मांग की है। बीएनपी को मिले भारी बहुमत और जमात को करीब 60 सिमटी देखकर बांग्लादेश की कट्टर मजहबी दल बौखलाए हुए हैं। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी राजधानी ढाका की सड़कों पर विरोध जुलूस निकाले गए तो आज भी वहां अनेक स्थानों पर प्रदर्शन किए जा रहे हैं। लेकिन इस उथलपुथल के बीच भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी के जमात-ए-इस्लामी प्रमुख शफीकुर रहमान से मुलाकात की खबरों को उतनी सुर्खियां नहीं मिलीं।
हालांकि यह मुलाकात बहुत महत्वपूर्ण रही है और भारत की हर पक्ष को विश्वास में लेकर चलने की कूटनीति की खास झलक देती है। कट्टरपंथी और भारत-विरोधी मानी जाने वाली जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख के साथ हुई इस ‘सौहार्द’ भेंट पर बांग्लादेश स्थित भारतीय उच्चायोग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। दरअसल भारत ने बांग्लादेश के विकास में लंबे समय से योगदान दिया है, जो अब नए राजनीतिक परिदृश्य में और प्रासंगिक हो गया है।

कल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस समारोह में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के साथ विदेश सचिव विक्रम मिसरी मौजूद थे। शपथग्रहण के ठीक बाद मिस्री ने जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान से शिष्टाचार भेंट की, इसमें अन्य विषयों के अलावा द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा हुई। मिसरी ने बांग्लादेश को भारत के स्थायी समर्थन का आश्वासन दिया, जो दोनों देशों के लोगों पर केंद्रित संबंधों पर जोर देता है।
व्यावहारिक कदम
जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने दोनों देशों के सभ्यतागत बंधनों का उल्लेख किया। जैसा पहले बताया, यह मुलाकात शेख हसीना के दौर की ‘एक सरकार-केंद्रित’ नीति से हटकर भारत की नई रणनीति को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें व्यावहारिकता को खास तरजीह दी जा रही है।
इसमें संदेह नहीं है कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी राजनीतिक पार्टी है, जिसकी कट्टरपंथी विचारधारा और भारत-विरोधी रुख कभी छिना नहीं रहा है। खासकर सीमा सुरक्षा और हिंदुओं के मुद्दों पर संदेह की सुई इसी पार्टी पर जाती रही है। इसके बावजूद, भारत ने इस पार्टी की उपेक्षा न करते हुए संवाद का रास्ता चुना है। यह मोदी सरकार की कूटनीति की विशेषता ही कही जाएगी।
ভারতের বিদেশসচিব শ্রী বিক্রম মিস্রি বাংলাদেশের নতুন সরকারের শপথ গ্রহণ অনুষ্ঠানের অবকাশে বাংলাদেশের বিরোধীদলীয় নেতা ও বাংলাদেশ জামায়াতে ইসলামী-র আমির ডা. শফিকুর রহমানের সাথে সৌজন্য সাক্ষাৎ করেন।
বিদেশসচিব এই দুই দেশের সম্পর্কের জনগণ-কেন্দ্রিক প্রকৃতির ওপর গুরুত্ব আরোপ করে ডা.… pic.twitter.com/UqU8n5P942
— India in Bangladesh (@ihcdhaka) February 17, 2026
नए प्रधानमंत्री बने तारिक भी भारत से संबंधों को पूर्ववत बहाल करने का बयान दे चुके हैं। भारत की ओर से उठाया गया सकारात्मक कदम बीएनपी सरकार के साथ संबंध मजबूत करने के साथ-साथ विपक्ष से भी जुड़ाव को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत बांग्लादेश के बीच पैदा की गई खाई पाटी जा सकती है।
विकास में सहयोग
भारत ने बांग्लादेश के विकास में अरबों डॉलर का निवेश किया है, जिसमें करीब 8 अरब डॉलर (70,000 करोड़ रुपये) की क्रेडिट लाइन भी शामिल है। वर्तमान में वहां 93 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें 77 पूरी हो चुकी हैं और 16 पर काम चल रहा है। साल 2025 में बांग्लादेश ने इसमें से 15,500 करोड़ रुपये का उपयोग किया है, हालांकि पूर्व की हसीना सरकार गिरने के बाद क्रेडिट लाइन कम हुई।
भारत द्वारा बांग्लादेश में वित्त पोषित प्रमुख परियोजनाओं में 12.24 किलोमीटर लंबी अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक शामिल है, यह 392.52 करोड़ रुपये के अनुदान से बनी है। यह रेललाइन त्रिपुरा को बांग्लादेश से जोड़ती है, व्यापार बढ़ाने में सहयोग करती है। इसी तरह, खुलना-मोंगला पोर्ट रेल लाइन (65 किमी) 388.92 मिलियन डॉलर के ऋण से बनी है, जो मोंगला बंदरगाह को रेल नेटवर्क से जोड़ती है।
इसके अलावा, मैत्री सुपर थर्मल पावर प्लांट (1320 मेगावाट) रामपाल में 1.6 अरब डॉलर के ऋण से बना है, जो बांग्लादेश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करता है। 2023 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इसका उद्घाटन किया था। अन्य क्षेत्रों में भारत ने रेल, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता दी है।
कूटनीतिक निहितार्थ मिसरी—शफीकुर रहमान के बीच हुई यह मुलाकात भारत की ‘पड़ोस पहले’ नीति का विस्तार ही है, जो सत्ता परिवर्तन के बावजूद सहयोग जारी रखने की वकालत करती है। जमात जैसे समूहों से बातचीत का सेतु बनाए रखकर भारत एक प्रकार से क्षेत्रीय स्थिरता ही सुनिश्चित करता है। पारस्परिक विकास परियोजनाएं दोनों देशों के व्यापार को 10 गुना बढ़ा सकती हैं। भविष्य में यह संबंध और मजबूत हो सकते हैं, बशर्ते दोनों देशों के बीच लंबे समय चले आ रहे सीमा विवाद सुलझ जाएं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन चुनावों में जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है। इसने भारतीय सीमा के निकट वाले इलाकों में बड़ी जीत हासिल की है। बांग्लादेश को लेकर भारत की विदेश नीति से एक शिकायत जैसी रही थी कि भारत सत्तारूढ़ के अलावा किसी अन्य राजनीतिक समूह से बातचीत नहीं करता। लेकिन भारत द्वारा कूटनीति में नया आयाम जोड़ते हुए बांग्लादेश के विपक्ष से मुलाकात पर विशेषज्ञों की पैनी नजर गई है।
















