संसद में आज विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार दोस्त’ कह कर संबोधित किया। बिट्टू कांग्रेस से भाजपा में आए हैं और राहुल गांधी का अभिप्राय चाहे इसी संदर्भ में बिट्टू को गद्दार कहने का रहा होगा परंतु इतने कटु शब्दों का प्रयोग करने से मामला भडक़ गया है। राजनीति में दलों का बदलना सामान्य बात है और इस आधार पर किसी को इतना कटु वचन नहीं कहा जाना चाहिए और ऐसे परिवार के सदस्य के बारे तो यह शब्द बिल्कुल नहीं कहा जा सकता जिसके एक वरिष्ठ सदस्य ने देश की एकता अखण्डता के लिए अपने प्राणों की आहूति दी हो और जिसने अपने कुशल राजनीतिक नेतृत्व से पंजाब जैसे सीमांत राज्य में आतंकवाद और अलगाववाद की ज्वाला को शांत कर प्रदेश को पुन: मुख्यधारा में जोडऩे का साहसिक व सराहनीय कार्य किया हो।
बलिदानी सरदार बेअंत सिंह का योगदान
जी हां, हम बात कर रहे हैं केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के दादा अमर बलिदानी सरदार बेअंत सिंह की जिन्होंने आतंकवाद की आग में झुलस रहे पंजाब को कुशल नेतृत्व देते हुए राज्य में आतंकवाद का फन कुचला।
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेताओं में से एक बेअंत सिंह पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे। वह 25 फऱवरी, 1992 से 31 अगस्त, 1995 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे। खालिस्तानी अलगाववादियों ने कार को बम से उड़ा कर उनकी हत्या कर दी थी। भारत के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के शब्दों में- ‘पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में सरदार बेअंत सिंह ने राज्य में सामान्य स्थिति बहाली के लिए कड़े संघर्ष किए।’ 18 दिसम्बर, 2013 को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार दौरान डाक विभाग ने सरदार बेअंत सिंह के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।
सरदार बेअंत सिंह का जीवन परिचय
बेअंत सिंह का जन्म 19 फऱवरी, 1922 को पटियाला, पंजाब में हुआ और इसके बाद में वे लुधियाना के दोराहा तहसील के बिलासपुर गाँव में चले गए। इसके बाद में वे उसी जिले के ग्राम कोटली में स्थानांतरित हो गये। उनके बेटे तेज प्रकाश सिंह पंजाब सरकार में मंत्री थे, जिनका नेतृत्व हरचरण सिंह बराड़ ने किया था। उनकी बेटी गुरकंवल कौर, अमरिंदर सिंह सरकार में समाज कल्याण राज्य मंत्री और संसदीय सचिव रहीं। उनका पोता रवनीत सिंह बिट्टू (वर्तमान केंद्रीय राज्य मंत्री) लुधियाना से राजनीतिज्ञ है। एक अन्य पोता गुरकीरत सिंह कोटली खन्ना से राजनीति में सक्रिय रहे हैं।
शिक्षा, सेना और राजनीतिक यात्रा
सरदार बेअंत सिंह ने लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की। 23 साल की उम्र में बेअंत सिंह सेना में शामिल हो गये, लेकिन दो साल की सेवा के बाद राजनीति और सामाजिक कार्यों में बदलाव करने का फैसला किया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर रहकर समाज की सेवा की। 1992 में वह पंजाब के मुख्यमंत्री बनें। अपने जीवन काल में वे पाँच बार पंजाब विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने 1986 से 1995 तक काम किया।
विभाजन के बाद राजनीति में प्रवेश
सन 1947 के विभाजन के बाद बेअंत सिंह ने पंजाब की राजनीति में प्रवेश किया। 1960 में वे लुधियाना जिले में दोराहा के ब्लॉक समिति के अध्यक्ष चुने गए। लुधियाना में केंद्रीय सहकारी बैंक के निदेशक के रूप में कुछ समय तक काम करने के बाद बेअंत सिंह ने 1969 में एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पंजाब विधानसभा में प्रवेश किया।
आतंकवाद के दौर में पंजाब और नेतृत्व
उन्होंने जब मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली तो पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। हालात यह थे कि सांय पांच बजे राज्य की गलियां सूनी हो जाया करती थीं और कई क्षेत्रों में तो पुलिस वाले थाने तक बंद कर दिया करते थे। आतंकवादी जब चाहे और जहां चाहे किसी की हत्या कर देते। केवल इतना ही नहीं लूटपाट, फिरौतियों व बलात्कार की घटनाएं आतंकवादियों का नित्य का कार्य बन चुकी थीं। सीमा पार बैठा पाकिस्तान दुश्मन पंजाब को भारत से अलग कर बंगलादेश के रूप में हुए अपने विभाजन का बदला लेना चाहता था और इसी उद्देश्य से खालिस्तानी आतंकवादियों और अलगाववादियों को अपना विषाक्त स्तनपान करवा रहा था।
आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई
पुलिस के हौंसले पस्त और देशविरोधियों के इरादे खतरनाक थे, इन परिस्थितियों में बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बने। उन्होंने पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ मिल कर खालिस्तानी आतंकवाद का फन कुचला और हिंदू-सिख समाज में आई दरार को पाटने का काम किया। पंजाब धीरे-धीरे पटरी पर आया और मुख्यधारा में शामिल हो गया। स. बेअंत सिंह को इन उपलब्धियों का खामियाजा अपनी जान दे कर चुकाना पड़ा।
31 अगस्त 1995 का आतंकी हमला
31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ के सचिव परिसर में एक बम विस्फोट में बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई। इस विस्फोट में 3 भारतीय कमांडो सहित 17 अन्य लोगों की भी जान गई थी। बेअंत सिंह हत्या के दिन अपने करीबी दोस्त रणजोध सिंह मान के साथ थे। बब्बर खालसा इंटरनेशनल के दिलावर सिंह बब्बर ने आत्मघाती हमलावर के रूप में काम किया। बाद में बैकअप बमवर्षक बलवंत सिंह राजोआना को भी हत्या का दोषी ठहराया गया।
हत्या मामले में न्यायिक कार्रवाई
2012 में चंडीगढ़ की एक अदालत ने राजोआना को मौत की सजा सुनाई। 7 जनवरी, 2015 को जगतार सिंह उर्फ तारा, जो बेअंत सिंह की हत्या का मास्टरमाइंड था, को भारतीय जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो के अनुरोध के बाद थाईलैंड पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
कांग्रेस और बलिदानी परिवार पर सवाल
बेअंत सिंह व उनके परिवजनों ने न केवल पंजाब और देश की सेवा की बल्कि अपना सारा जीवन कांग्रेस पार्टी को ऊंचा उठाने में लगा दिया। आज उस परिवार के किसी सदस्य को केवल इसलिए गद्दार कहना कहां तक उचित है जिसका अपराध केवल इतना है कि उसने कांगे्रस को छोड़ दिया?

















