'रोमियो-जूलियट के मामलों पर ध्यान देने की जरूरत' : पॉक्सो पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा सवाल!
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‘रोमियो-जूलियट के मामलों पर ध्यान देने की जरूरत’ : पॉक्सो पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा सवाल!

राजस्थान हाईकोर्ट ने ‘रोमियो-जूलियट’ मामलों में पॉक्सो कानून के अंधे प्रयोग पर चिंता जताई, कहा— सहमति वाले किशोर रिश्तों और बलात्कार में फर्क जरूरी।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Feb 4, 2026, 06:03 pm IST
in भारत, राजस्थान
Rajasthan High Court Order Remove Illegal Religious Structures Indo Pak Border Justice Sameer Jain

चित्र - राजस्थान हाईकोर्ट

जयपुर (हि.स.) । राजस्थान उच्च न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार की घटनाओं को लेकर कहा कि “रोमियो और जूलियट” के बढ़ते मामलों पर ध्यान देने की जरूरत है। चिंता इस बात की है कि वर्तमान कानून बलात्कार और किशोर अवस्था में सहमति से बने संबंधों के बीच अंतर करने में विफल है।

कानून में सहमति और आयु को लेकर चिंता

इसमें सहमति के मामले में अठारह वर्ष की आयु पर जोर दिया है, इससे निकट के मामलों को लेकर कोई प्रावधान नहीं रखा है। एक मामला तो ऐसा भी आ चुका, जिसमें आयुसीमा एक घंटा ही कम थी। कानून अनजाने में “पीड़ितों” की एक श्रेणी तैयार करता है, जो भागकर शादी करने के कारण स्वयं को पीड़ित नहीं मानते।

न्याय प्रणाली और माता-पिता की अस्वीकृति

न्याय प्रणाली बाल संरक्षण की वास्तविकता के बजाय माता-पिता की अस्वीकृति से संचालित होती है और विवेकाधिकार नहीं होने के न्यायपालिका युवा वयस्कों को अपराधी मानने के लिए मजबूर है।

19 वर्षीय युवक को हाईकोर्ट से राहत

न्यायाधीश अनिल उपमन ने 19 साल के युवक की याचिका मंजूर कर उसे राहत दी। कोर्ट ने कहा कि देशभर में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) के तहत दर्ज मामलों में एक बड़ा हिस्सा रोमियो-जूलियट प्रकृति का है, जहां दो किशोरों या एक किशोर-एक युवा के आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं।

पोक्सो कानून और सहमति वाले संबंध

ऐसे जोड़े भी शामिल हैं जो शादी करने का इरादा रखते हैं या पहले से रिश्ते में होते हैं। 2012 से पहले ऐसे मामले अपराध की श्रेणी में नहीं थे, लेकिन अब लड़की की सहमति के बावजूद अपराध है और उसमें न्यूनतम 10 वर्ष की सजा है।

कानून के मशीनी प्रयोग पर सवाल

कानून का मशीनी अंदाज में प्रयोग बच्चों को यौन दुर्व्यवहार से बचाने के बजाय युवाओं के अनावश्यक जेल और दोनों पक्षों के लिए सामाजिक कलंक का कारण बनता है। कानून बनाने वालों का इरादा सख्त कानून बनाकर उन युवा वयस्कों को परेशान करना नहीं रहा होगा, जो सामाजिक स्वीकार्यता के विपरीत सहमति से रिश्ते बना रहे हैं।

न्यायिक विवेकाधिकार की कमी

इसने न्यायिक विवेकाधिकार सीमित कर दिया, जिससे हिंसक इरादा नहीं होने के बावजूद कोर्ट के पास न्याय देने बहुत कम गुंजाइश बची है। इससे कानून अनजाने में किशोरों की स्वायत्तता को अपराध बनाकर युवाओं को जघन्य अपराधियों जैसी सजा दिला रहा है, यह स्पष्ट अन्याय है।

एफआईआर और ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई रद्द

कोर्ट ने एफआईआऱ और ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई रद्द करते हुए कहा कि ऐसे मामले में आंख नहीं मूंदी जा सकती। जब पीड़िता आरोपित को बेगुनाह बताती है और मेडिकल रिपोर्ट भी पक्ष में होती है तो सामाजिक मर्यादा के हथियार के रूप में उपयोग कैसे किया जा सकता है।

राज्यहित और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संतुलन

बच्चों की सुरक्षा में राज्यहित और निजता व व्यक्तिगत पसंद के संवैधानिक अधिकारों में संतुलन होना चाहिए। इसके बिना कानूनी व्यवस्था किशोर प्रेम को अपराधीकरण करने के दुष्चक्र में फंसी रहती है।

युवा जीवन पर कानून का असर

उल्लेखनीय है कि महज उन्नीस वर्ष के याचिकाकर्ता युवक पर यौन उत्पीड़न का आरोप है, जिसमें कोई साक्ष्य नहीं होने के बावजूद कम से कम बीस वर्ष की सजा है। कठोर और निर्मम वैधानिक व्याख्या के नाम पर पूरा भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है।

भारतीय न्यायशास्त्र पर प्रभाव

ऐसा दृष्टिकोण भारतीय न्यायशास्त्र के सुधारवादी नजरिए को कमजोर करता है। कानून को इतना अंधा नहीं होना चाहिए कि वह युवाओं के विनाश का साधन बन जाए।

पुलिस और ट्रायल कोर्ट की भूमिका

19 साल के युवा के खिलाफ 17 साल की किशोरी का अपहरण कर पॉक्सो का मामला दर्ज हुआ, जिसमें पुलिस और ट्रायल कोर्ट ने मशीन की तरह काम किया, जबकि युवती ने मर्जी से घर से जाने और कोई जबरदस्ती नहीं होने, सहमति से संबंध बनाने की बात कही।

विधायिका से संतुलित प्रावधान की अपेक्षा

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में ऐसा प्रावधान हो जो न्यायपालिका को तथ्यों व परिस्थितियों के हिसाब से न्याय करने का अवसर दे। इसके अलावा युवाओं के अनावश्यक अपराधीकरण को रोका जा सकेगा।

न्यायिक समय और युवा भविष्य का प्रश्न

जब तक विधायिका ऐसा संतुलित तंत्र प्रदान नहीं करती, तब तक कानून की भावना के विपरीत न्याय करने के लिए न्यायालयों पर ऐसे मामलों का बोझ बना रहेगा। यह न्यायिक समय की बर्बादी और युवा जीवन का विनाश होगा।

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