“वसुधैव कुटुम्बकम्: शिक्षा और वैश्विक परिवर्तन का सूत्र”
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“वसुधैव कुटुम्बकम्: शिक्षा और वैश्विक परिवर्तन का सूत्र”

जब हम “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करते हैं, तो इसका सबसे गहरा संबंध शिक्षा से जुड़ता है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति का निर्माण करना है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Jan 30, 2026, 03:06 pm IST
inभारत
पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में कुलपति संस्कृत विश्वविद्यालय प्रो. श्रीनिवास वरखेडी

पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में कुलपति संस्कृत विश्वविद्यालय प्रो. श्रीनिवास वरखेडी

पाञ्चजन्य के 79वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित “बात भारत की” में पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में कुलपति संस्कृत विश्वविद्यालय प्रो. श्रीनिवास वरखेडी जी ने अपनी बात रखी।

हमारे संवाद का मुख्य सूत्र है- “वसुधैव कुटुम्बकम्”। यह केवल एक संस्कृत वाक्य नहीं, बल्कि भारत द्वारा विश्व को दिया गया एक महान विचार है। इस सूत्र ने वैश्विक स्तर पर अनेक सकारात्मक परिवर्तन किए हैं। जब हम “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करते हैं, तो इसका सबसे गहरा संबंध शिक्षा से जुड़ता है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति का निर्माण करना है। व्यक्ति समाज की आधारशिला है, समाज व्यक्ति से बनता है,  शिक्षा व्यक्ति को संस्कारवान और जिम्मेदार बनाती है। भारत ने संसार को यह दृष्टि दी कि परिवार केवल घर तक सीमित नहीं है, न ही केवल गाँव या राष्ट्र तक। वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ है- पूरी पृथ्वी को एक परिवार के रूप में देखना।

शिक्षा का लक्ष्य भी यही होना चाहिए कि वह मनुष्य में ऐसी चेतना विकसित करे, जिससे वह संपूर्ण विश्व को अपना कुटुम्ब माने। मनुष्य अपने शरीर, जाति या सीमित संबंधों से परिवार बना सकता है, परंतु वह अपने भाव, भाषा और विचारों से एक वैश्विक परिवार भी निर्मित कर सकता है। इसलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की क्षमता केवल मानव के भीतर ही है। आज भारत ने इस विचार को नई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय नीति के रूप में प्रस्तुत किया है, और विश्व ने भी इसे स्वीकार किया है।

परिवर्तन की आवश्यकता

अब प्रश्न उठता है कि इस अवधारणा के साथ जो परिवर्तन हो रहे हैं, उन्हें हम कैसे देखें?

परिवर्तन की शुरुआत हमेशा व्यक्ति से होती है। हम अक्सर सोचते हैं कि परिवर्तन दूसरों में होना चाहिए, लेकिन वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब हम स्वयं से शुरुआत करते हैं। समाज का जीवन परिवर्तन पर ही आधारित है। यदि परिवर्तन नहीं होगा, तो जीवन स्थिर और निष्क्रिय हो जाएगा। प्रकृति भी यही सिखाती है। जंगल का पेड़ भी स्वयं को समय के अनुसार बदलता है, ताकि वह अन्य वृक्षों के साथ सामंजस्य बना सके। इसलिए परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है- काल के अनुसार, देश के अनुसार, परिस्थितियों के अनुसार, परिवर्तन आवश्यक है और यह स्वयं से प्रारंभ होना चाहिए।

पंच परिवर्तन का विचार

मैं यहाँ “पंच परिवर्तन” की अवधारणा प्रस्तुत करना चाहूँगा। परिवर्तन का क्रम इस प्रकार है- स्व, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व। परिवर्तन का मूल आधार है- स्व-बोध। स्व-बोध का अर्थ है- मैं कौन हूँ? मेरा उद्देश्य क्या है? मेरा दायित्व क्या है? जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं पहचानता, तब तक परिवर्तन संभव नहीं है। स्व से परिवार जुड़ता है, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और अंततः राष्ट्र से संपूर्ण विश्व। परिवर्तन केवल ज्ञान से नहीं आता, बल्कि दायित्व-बोध से आता है।

हमें यह समझना होगा कि समाज के प्रति मेरा क्या कर्तव्य है? राष्ट्र के प्रति मेरा क्या दायित्व है? प्रकृति के प्रति मेरी जिम्मेदारी क्या है? जब हम हर विषय को दायित्व के साथ जोड़ते हैं, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। हमारे शास्त्रों में एक अत्यंत प्रसिद्ध वाक्य है- “माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्याः।”

इसके दो भाग हैं- माता भूमि पृथ्वी हमारी माता है।

पुत्रो अहं पृथिव्याः- मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। अक्सर हम केवल पहला भाग याद रखते हैं कि पृथ्वी हमारी माता है। लेकिन केवल माता कह देना पर्याप्त नहीं है। यदि माता है, तो पुत्र का कर्तव्य भी है। पुत्र होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम पृथ्वी की रक्षा करें, उसका सम्मान करें और उसे सुरक्षित रखें। जब तक पुत्र के रूप में हमारा कर्तव्य जागृत नहीं होगा, तब तक पृथ्वी को माता मानने का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाएगा।

 

Topics: वसुधैव कुटुम्बकम्पंच परिवर्तनPanchjanya Eventशिक्षा का उद्देश्यPanchjanya interviewवैश्विक चेतनास्व-बोधPanchajanyaराष्ट्र के प्रति दायित्वभारतीय दर्शनप्रो. श्रीनिवास वरखेडीIndian PhilosophyAim of Educationबात भारत की
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2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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