सदियों पुराना नाता : सुवर्णभूमि से 'एक्ट ईस्ट' तक भारत दक्षिण पूर्व एशिया के संबंध
July 19, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

सदियों पुराना नाता : सुवर्णभूमि से ‘एक्ट ईस्ट’ तक भारत दक्षिण पूर्व एशिया के संबंध

यह उस समय की बात है जब भारत के नागरिक बंगाल की खाड़ी को पार कर इन भूमियों तक पहुंचे जिसे वे अपनेपन से स्वर्ण भूमि या स्वर्णद्वीप कहा करते थे।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Jun 28, 2026, 07:00 pm IST
in भारत
बात भारत की

बात भारत की

कुछ सभ्यताएं अपनी सीमाओं से पहचानी जाती है, कुछ अपने साम्राज्य से। भारत उन विरल सभ्यताओं में से जिनकी पहचान सांस्कृतिक विस्तार से होती है। उसकी सबसे बड़ी विजय भू-भाग नहीं, वे ह्रदय होते हैं जिन्हें भारत की संस्कृति ने स्पर्श किया है। जब हम भारत के और दक्षिण पूर्व एशिया के संबंधों की बात करते हैं, जिनके बीच लगभग 2000 वर्षों तक निरंतर संवाद चला रहा। कभी व्यापार के माध्यम से, कभी धर्म के माध्यम से, कभी साहित्य कला स्थापत्य के माध्यम से और आज कूटनीति अर्थव्यवस्था और सामरिक सहयोग के माध्यम से जारी है। आज भारत की एक्ट ईस्ट नीति को अक्सर आर्थिक एवं रणनीतिक रूप में देखा जाता है, लेकिन इसकी जड़े कहीं अधिक गहरी हैं। यह उस समय की बात है जब भारत के नागरिक बंगाल की खाड़ी को पार कर इन भूमियों तक पहुंचे जिसे वे अपनेपन से स्वर्ण भूमि या स्वर्णद्वीप कहा करते थे।

सुवर्णभूमि का उल्लेख जातक कथाओं , कथासरित्सागर, अर्थशास्त्र, अग्नि पुराण और अन्य ग्रंथो में मिलता है। दक्षिण पूर्व एशिया मसाले, सोना, टिन , सुगंधित लकड़ी, कपूर, हाथी-दांत और समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। भारत के पूर्वी तट पर ताम्रलिप्ति , कवेरीपट्टनम , नागपट्टनम आदि बंदरगाह दक्षिण पूर्व एशिया से संपर्क के प्रमुख केंद्र थे, स्थल मार्ग से बंगाल असम मणिपुर वर्मा और थाईलैंड से होते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया तक की यात्रा की जाती थी।

अशोक भारत के सांस्कृतिक दूत

कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने धम्म विजय को सैन्य विजय से अधिक महत्वपूर्ण माना। उन्होंने बौद्ध मत के प्रचार हेतु अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। श्रीलंका से आगे बौद्ध मत दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न भागों में पहुंचा तथा अशोक की परंपरा को म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम की संस्कृति ने गहराई से प्रभावित किया।

गुप्त काल में बृहत्तर भारत का निर्माण

सम्राट अशोक ने जो बोया था, गुप्तों ने उसे विशाल वृक्ष में बदल दिया। समुद्रगुप्त का समकालीन श्रीलंका का शासक मेघवर्ण था। इस काल में संस्कृत साहित्य, कालिदास की रचनाएं एवं आर्यभट्ट आदि का ज्ञान विज्ञान,मूर्ति कला और स्थापत्य की छाप हमें कंबोडिया,चंपा की कला में दिखाई देती है। इसी काल में एक वृहत्तर भारत का निर्माण हुआ और अब वास्तव में दक्षिण पूर्व एशिया भारत की संस्कृति में रंग गया।

कंबुज (कंबोडिया)- हिंदू सभ्यता का गौरवशाली केंद्र

दक्षिण-पूर्व एशिया का सर्वाधिक प्राचीन और शक्तिशाली हिंदू राज्य कंबुज (कंबोडिया) था, जिसे चीनी साहित्य में फूनान कहा गया है। इसकी स्थापना प्रथम शताब्दी ईस्वी में भारतीय ब्राह्मण कौण्डिन्य द्वारा की गई थी। उन्होंने यहाँ भारतीय सभ्यता, प्रशासन और धर्म का प्रचार किया। छठी और सातवीं शताब्दी में जयवर्मन, रुद्रवर्मन, महेंद्रवर्मन और ईशानवर्मन जैसे शक्तिशाली शासकों ने राज्य का विस्तार किया। बाद में जयवर्मन द्वितीय ने अंगकोर क्षेत्र में राजधानी स्थापित की । 877 ईस्वी में इन्द्रवर्मन ने कंबुज में एक अन्य राजवंश की स्थापना की । 11 वी शती में सूर्यवर्मन प्रथम में कंबुज में एक नवीन वंश की स्थापना की , इसी वंश में कंबोडिया का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक सूर्यवर्मन द्वितीय था (1113–1150 ई.), जिसने विश्वविख्यात अंगकोरवाट मंदिर का निर्माण कराया। यह विष्णु को समर्पित विश्व का सबसे विशाल हिंदू मंदिर है। इसकी दीवारों पर रामायण और महाभारत के दृश्य अंकित हैं।

चंपा : वियतनाम का हिंदू राज्य

चंपा राज्य की स्थापना दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी में हुई। इसके प्रारंभिक शासकों में भद्रवर्मन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चंपा का प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र माईसन था, जहाँ अनेक शिव मंदिर निर्मित किए गए। भद्रवर्मन के उत्तराधिकारी गंगाराज के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों में सिंहासन त्यागकर भारत आकर गंगा तट पर तपस्या की थी।

बर्मा (म्यांमार) और थाईलैंड

बर्मा में भारतीय प्रभाव अत्यंत गहरा था। वर्मा तथा स्याम (थाईलैंड ) में भारतीय संस्कृति का प्रवेश प्राचीन काल से हो चुका था। सातवीं शताब्दी में द्वारावती यहाँ का राज्य था यहाँ के प्रसिद्ध शासक अनिरुद्ध (Anawrahta) थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। उनकी राजधानी पेगान (Pagan) थी। उनके उत्तराधिकारी क्यानजितथ ने अरिमर्दनपुर मे प्रसिद्ध आनंद मंदिर का निर्माण करवाया था।

श्रीविजय और सुमात्रा

सुमात्रा में स्थापित श्रीविजय हिन्दू राज्य सातवीं से तेरहवीं शताब्दी तक दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रमुख बौद्ध केंद्र रहा। चीनी यात्री इत्सिंग ने अपने विवरणों में श्रीविजय को बौद्ध शिक्षा का महान केंद्र बताया है। यहाँ से अनेक भिक्षु नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन हेतु आते थे।

जावा और शैलेंद्र वंश

जावा को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में यवद्वीप कहा गया है। यहाँ शैलेंद्र वंश ने एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया। इसी वंश के शासकों ने विश्वविख्यात बोरोबुदुर स्तूप का निर्माण कराया। जावा के शैलेन्द्र वंशी शासक वालदेवपुत्र के अनुरोध पर पाल शासक देवपाल ने नालंदा में एक बौद्ध विहार बनवाने के लिए 5 ग्राम दान में दिए थे ।

बाली और बोर्नियो

बाली आज भी हिंदू संस्कृति का जीवंत केंद्र है। यहाँ की सामाजिक और धार्मिक परंपराएँ भारतीय प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। बोर्नियो से प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में मूलवर्मन नामक हिंदू राजा का उल्लेख मिलता है। चीनी स्रोतों के अनुसार बाली के शासक कौण्डिन्य वंश से संबंधित माने जाते थे। आज भी बाली में रामायण, महाभारत और हिंदू धार्मिक परंपराओं का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।

पल्लव – चोल साम्राज्य और राजेन्द्र चोल प्रथम का समुद्री अभियान

पल्लव काल में नरसिहवर्मन ने श्रीलंका के राजकुमार मानवर्मा को सत्ता प्रदान करने के लिए सैन्य सहायता प्रदान की थी । राजराज चोल प्रथम और उनके पुत्र राजेन्द्र चोल प्रथम ने हिंद महासागर में भारतीय समुद्री शक्ति को नई ऊँचाई दी। 1025 ईस्वी में राजेन्द्र चोल प्रथम ने श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध प्रसिद्ध नौसैनिक अभियान चलाया। चोलो ने श्रीलंका , मालद्वीप , जावा , सुमात्रा, मलय प्रायद्वीप और पीगू आदि को जीता। चोल अभिलेखों में कदारम् (केदाह), श्रीविजय और मलय क्षेत्र के अनेक बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है। इस अभियान ने भारतीय महासागरीय व्यापार नेटवर्क में चोलों की प्रतिष्ठा को और बढ़ाया। चोल काल में ऐनूरुवर और मणिग्रामम् जैसे व्यापारी संघ दक्षिण-पूर्व एशिया के बंदरगाहों में सक्रिय थे। व्यापार के साथ-साथ शैव, वैष्णव और तमिल सांस्कृतिक परंपराओं का भी प्रसार हुआ।

शासन व्यवस्था पर भारतीय प्रभाव

दक्षिण-पूर्व एशिया के शासक भारतीय राजाओं की भाँति महाराजाधिराज और देवराज जैसी उपाधियाँ धारण करते थे। उन्हें ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाता था। जावा तथा कंबोडिया के अभिलेखों में राजा को पृथ्वी पर निवास करने वाला देवता कहा गया है। भारतीय राजाओं के ही समान वे चतुरंगिणी सेना रखते थे ।जावा मे शासक को देवस्वरूप मन जाता था तथा मृत्यु के बाद देवताओ के समान उसकी भी मूर्तिया स्थापित की जाती थी । भारतीय राजतंत्र, प्रशासन और विधि व्यवस्था का प्रभाव यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

समाज और वर्ण व्यवस्था

जावा और अन्य राज्यों के अभिलेखों एवं तत्वनिंग व्यहार नामक जावा की रचना में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों का उल्लेख मिलता है। हालाँकि यहाँ की वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज की अपेक्षा अधिक लचीली थी। स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। वे राजनीति और प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाती थीं। पर्दा प्रथा का अभाव था। कई राज्यों में राजकुमारियों ने शासन भी किया। विवाह को भारत के समान पवित्र धार्मिक संस्कार माना जाता था ।

भाषा और साहित्य

संस्कृत दक्षिण-पूर्व एशिया की सांस्कृतिक भाषा बन गई थी। कंबोडिया, चंपा, जावा, सुमात्रा और बोर्नियो से अनेक संस्कृत अभिलेख प्राप्त हुए हैं। राजा, धर्म, कर्म, मंत्री, विजय, नगर और गरुड़ जैसे अनेक संस्कृत शब्द आज भी दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं में जीवित हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, वेद और स्मृतियों का अध्ययन किया जाता था। थाईलैंड में रामकियेन, कंबोडिया में रीमकर, इंडोनेशिया में काकाविन रामायण, लाओस में फ्रा लाक-फ्रा लाम और मलेशिया में हिकायत सेरी राम जैसे रामायण के स्थानीय संस्करण विकसित हुए। कालिदास के साहित्य का भी व्यापक प्रभाव पड़ा कालिदास के रघुवंश के आधार पर सुमन-संताक एवं कुमारसम्भव के आधार पर स्मरदहन का लेखन किया गया। जावा में अर्जुन विवाह, कृष्णायन तथा भारत युद्ध जैसे महाकाव्यों की रचना महाभारत और रामायण से प्रेरित होकर की गई।

धर्म और धार्मिक जीवन

दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू धर्म और बौद्ध मत दोनों का व्यापक प्रभाव था। शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, दुर्गा और कार्तिकेय की पूजा होती थी। शिव की पूजा लिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती थी। कंबोडिया का अंगकोरवाट विष्णु भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। जावा और सुमात्रा में बौद्ध धर्म का अत्यधिक विकास हुआ।विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यहाँ हिंदू और बौद्ध धर्म में समन्वय की भावना विकसित हुई। अनेक स्थानों पर शिव और बुद्ध की संयुक्त उपासना के प्रमाण मिलते हैं। बाली के निवासी वैदिक यज्ञो का अनुष्ठान करते थे और रामायण महाभारत का नियमित पाठ करते थे। जावा के निवासी विष्णु के अवतारों से परिचित थे एवं त्रिमूर्ति की पूजा किया करते थे।

कला और स्थापत्य

प्रसिद्ध कला इतिहासकार आनंद कुमारस्वामी ने दक्षिण-पूर्व एशिया की कला को भारतीय कला की विस्तारित शाखा कहा है। अंगकोरवाट, बोरोबुदुर, प्रम्बानन, आनंद मंदिर, माई सन तथा अंगकोर थॉम विश्व स्थापत्य के अनुपम उदाहरण हैं। अंकोरवाट का विष्णु मंदिर पाषाण निर्मित था जिसे 1125 मे सूर्य वर्मन द्वितीय ने करवाया था , इसके चारों ओर 650 फुट चौड़ी एवं 2-1/2 मील लंबी खाई है । मंदिर मे जाने के लिए 40 फुट चौड़ा एक पुल बनवाया गया है । मंदिर तीन हजार फुट पत्थर के चबूतरे पर बना है । ऊँचे शिखर, विस्तृत परिक्रमा मार्ग और रामायण-महाभारत के उत्कीर्ण दृश्य इसे विश्व की महानतम स्थापत्य कृतियों में स्थान दिलाते हैं। बोरोबुदुर का स्थापत्य बौद्ध दर्शन का मूर्त रूप है जिसे शैलेन्द्र वंश के राजाओ ने बनवाया था । बोरोबुदुर विश्व की महानतम बौद्ध स्थापत्य कृतियों में से एक है। इसके नौ स्तर हैं। ऊपरी भाग में घंटाकार स्तूप तथा 72 लघु स्तूप निर्मित हैं, जिनमें बुद्ध प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इसकी दीवारों पर जातक कथाओं और बौद्ध जीवन दर्शन का अत्यंत कलात्मक अंकन किया गया है। बर्मा के पगान में स्थित आनंद मंदिर 564 फुट के वर्गाकार प्रांगण स्थित है, जबकि प्रम्बानन मंदिर हिंदू वास्तुकला की श्रेष्ठ उपलब्धियों में गिना जाता है।

तेरहवीं शताब्दी के बाद यहाँ अरब, फारसी और भारतीय मुस्लिम व्यापारियों के माध्यम से इस्लाम का प्रसार तेजी से होने लगा, किंतु दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहाँ नई धार्मिक पहचान ने पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया। इस्लाम के प्रसार के बाद भी रामायण और महाभारत लोकजीवन में जीवित रहे। आज भी इंडोनेशिया में रामायण का मंचन होता है, वायंग कुलित (छाया नाटक) में महाभारत के पात्र जीवंत दिखाई देते हैं और गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन राष्ट्र के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है। जब इंडोनेशिया के अधिकांश भाग इस्लामी प्रभाव में आए, तब बाली ने अपनी विशिष्ट हिंदू परंपरा को सुरक्षित रखा। आज भी वहाँ अग्नि-अनुष्ठान, मंदिर उत्सव, रामायण नृत्य, गणेश और शिव की पूजा तथा संस्कृत मूल के नाम सामान्य जीवन का हिस्सा हैं। स्वयं बीसवीं शताब्दी में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यहाँ की संस्कृति देखकर भावविभोर हो उठे थे।

लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट तक – इतिहास, कूटनीति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारत ने यह अनुभव किया कि दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ प्राचीन सभ्यतागत स्मृतियों का विस्तार है। इसी सोच के साथ 1991 में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने लुक ईस्ट नीति की शुरुआत की। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नीति को नया आयाम देते हुए एक्ट ईस्ट नीति का सूत्रपात किया गया। इसका संदेश स्पष्ट था भारत अब पूर्व की ओर अब सक्रिय रूप से जुड़ेगा। भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, कलादान मल्टी-मोडल परियोजना, आसियान के साथ व्यापारिक साझेदारी, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, रामायण महोत्सव और बौद्ध सम्मेलन इस नीति के प्रमुख स्तंभ बने।

आज आसियान भारत का स्वाभाविक साझेदार है, क्योंकि दोनों के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं; वे दो हजार वर्षों की साझा सांस्कृतिक विरासत पर आधारित हैं। पूर्वोत्तर भारत इस नीति का प्रवेश द्वार है, जहाँ से वही प्राचीन मार्ग पुनर्जीवित हो रहे हैं जिनसे होकर कभी भारतीय व्यापारी, भिक्षु और विद्वान सुवर्णभूमि पहुँचा करते थे। वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी साझेदारी इस ऐतिहासिक संबंध को आधुनिक रणनीतिक आयाम प्रदान कर रही है। इस प्रकार एक्ट ईस्ट नीति भारत की उस सभ्यतागत चेतना का आधुनिक रूप है जिसने कभी समुद्रों के उस पार एक सांस्कृतिक विश्व का निर्माण किया था।

 

Topics: बात भारत कीएक्ट ईस्टदक्षिण-पूर्व एशियाभारत-दक्षिण पूर्व एशिया संबंधसुवर्णभूमि
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

श्रीराम का वन गमन (चित्र एआई द्वारा निर्मित )

राम वन गमन पथ : स्व से राष्ट्र तक, 4 प्रमुख यात्राएं और उनमें छिपा जीवन दर्शन

बात भारत की

बात भारत की : जब इतिहास अधूरा होता है, तो समाज भी अधूरा रह जाता है

कुरुक्षेत्र से कॉर्पोरेट तक, हर जगह गीता का संदेश प्रासंगिक

कुरुक्षेत्र से कॉर्पोरेट तक : हर युग के प्रश्नों का उत्तर है गीता

ॐ का रहस्य

बात भारत की: ॐ का रहस्य, ध्यान, विज्ञान और ब्रह्मांड का संगम

एक शिला के ब्रह्मांड बनने की कहानी

एकाश्म में ब्रह्मांड: एक शिला के कैलाश बनने की कहानी और एक शिल्पी का संकल्प, जिसे आज के इंजीनियर भी मानते हैं ‘असंभव’

Jyotiraditya Scindia Panchjanya Digital highway

भारत दुनिया का सबसे बड़ा ‘डिजिटल हाईवे’: पाञ्चजन्य के ‘बात भारत की’ कार्यक्रम में बोले ज्योतिरादित्य सिंधिया

Load More

ताज़ा समाचार

vp cp radhakrishnan releases book rss at 100 ek sadi sankalp ki in delhi

“युवाओं के राष्ट्रीय चरित्र को ढालने वाली आत्मा की कार्यशाला है संघ की शाखा” : उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन

Young Thinkers Meet Dehradun RSS Arun Kumar Sangh At 100 Ramesh Pokhriyal Nishank Ram Madhav India Foundation

देहरादून: ‘लेखक गांव’ में राष्ट्रीय युवा विचारक बैठक शुरू, संघ सहसरकार्यवाह अरुण कुमार ने ‘RSS@100’ पर दिया व्याख्यान

Azam Khan

बरकरार रहेगी आजम खान की सजा, अपील खारिज, अफसरों को ‘तनखैया’ बताकर किया था जूते साफ करवाने का ऐलान

RSS Bhayyaji Joshi Udaipur Seva Bharati Natural Health Center Inauguration Website Digital Launch

प्राकृतिक चिकित्सा वैकल्पिक नहीं, बल्कि समानान्तर पद्धति: भय्याजी जोशी

श्री नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

PM मोदी का AI वीडियो वायरल! 22,000 रुपये लगाकर 25 लाख कमाने का झांसा, PIB Fact Check ने बताया फर्जी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पंजाब में आप सरकार के मर्म पर प्रहार कर चुनावी एजेंडा सेट कर गए PM मोदी

India UK trade deal

Explainer: UK के साथ व्यापार समझौते से भारत को क्या फ़ायदा होगा?

Journalist Alok Goswami passes away

वरिष्ठ पत्रकार आलोक गोस्वामी का निधन, पाञ्चजन्य के अतुलनीय सहयोगी अब हमारे बीच नहीं रहे

खटीमा: ईसाई बने थारू जनजाति के 36 लोगों ने सनातन धर्म में की घर वापसी, जनेऊ और कलेवा धारण किया

अमेजन से मंगवाई हिंदी की पुस्तक, मिली अंग्रेजी की; शिकायत के बाद भी नहीं हुई कोई कार्रवाई

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies