गत दिनों संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर कानपुर स्थित छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के सेनानायक तात्या टोपे सीनेट हॉल में प्रमुख जन गोष्ठी आयोजित हुई।
इसके मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख श्री स्वांत रंजन ने कहा कि आज हम ऐसे समय में एकत्रित हुए हैं, जब भारत केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि विश्व के लिए एक सांस्कृतिक दिशा के रूप में पुनः स्थापित हो रहा है।
यह कालखंड केवल आर्थिक विकास का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कालखंड है। भारत की आत्मा को समझे बिना भारत के भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समाज जीवन में ‘पंच परिवर्तन’ का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंच परिवर्तन केवल एक अभियान नहीं, बल्कि व्यक्ति से राष्ट्र तक परिवर्तन का एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन है। ये पांच ऐसे आयाम हैं, जिनके माध्यम से हम एक सशक्त, समरस, आत्मनिर्भर और संस्कारित भारत का निर्माण कर सकते हैं।
पंच परिवर्तन के पांच विषयों के अंतर्गत सामाजिक समरसता में भेदभाव व अस्पृश्यता के स्थान पर बंधुत्व की भावना से कार्य करना, कुटुंब प्रबोधन विषय में परिवार को संस्कार का प्रथम केंद्र बनाना, पर्यावरण संरक्षण विषय में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, स्वदेशी विषय में आत्मनिर्भर भारत का आधार एवं नागरिक कर्तव्य में अधिकारों से पहले उत्तरदायित्व।
उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन कोई सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक मार्ग है। यह परिवर्तन सरकारें नहीं कर सकतीं; यह परिवर्तन समाज के जागृत नागरिक ही कर सकते हैं।
गोष्ठी के अध्यक्ष और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने कहा कि भारत आज विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है। हमारे देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा ऊर्जा है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने का केंद्र नहीं होता, वह राष्ट्र के विचार, चरित्र और नेतृत्व का निर्माण करने वाला मंच होता है। इसलिए पंच परिवर्तन की अवधारणा में युवाओं और छात्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

















