रांची में जनजातीय संवाद : RSS सरसंघचालक जी ने कहा- सरना को अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास
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रांची में जनजातीय संवाद : RSS सरसंघचालक जी ने कहा- सरना को अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास

रांची में जनजातीय संवाद कार्यक्रम में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- वनवासी और हिंदू अलग नहीं, एकजुटता ही समाज की ताकत।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 24, 2026, 09:09 pm IST
in भारत, संघ @100, झारखण्‍ड

रांची (हि.स.) । राजधानी रांची के डीबडीह स्थित कार्निवाल बैंक्वेट हॉल में शनिवार को जनजातीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड सहित राज्य के विभिन्न जिलों से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर और दीप प्रज्वलन के साथ किया।

कार्यक्रम का परिचय और सांस्कृतिक प्रस्तुति

कार्यक्रम का औपचारिक परिचय तुका उरांव ने कराया। इसके बाद कैलाश की ओर से प्रस्तुत गीत जनजातियों का धर्म नहीं है, इससे बढ़कर झूठ नहीं है के माध्यम से कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इस अवसर पर राज्य के 32 जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि और समाज से जुड़े लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम को दो सत्रों में विभाजित किया गया।

प्रथम सत्र का संचालन और संदेश पत्र

प्रथम सत्र का संचालन मोहन कच्छप ने किया। इस सत्र में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का संदेश पत्र पढ़कर सुनाया गया, जिसमें अबुआ दिसुम, अबुआ राज की अवधारणा पर प्रकाश डाला गया।

जनजातीय मुद्दों पर प्रश्नोत्तर सत्र

पहले सत्र में जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें समाज के प्रबुद्धजनों ने खुलकर अपनी बात रखी।

भूमि कानून, कन्वर्जन और सामाजिक शोषण पर चर्चा

प्रश्न सत्र के दौरान मुख्य रूप से सीएनटी और एसपीटी कानून का उल्लंघन कर जनजातीय भूमि की खरीद-फरोख्त, ईसाई एवं मुस्लिम समुदाय की ओर से किए जा रहे कथित कन्वर्जन, पेसा कानून के सही तरीके से लागू न होने, ग्रामसभा की शक्तियों को कमजोर किए जाने तथा जनजातीय महिलाओं एवं युवतियों के सामाजिक-सांस्कृतिक शोषण जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

जनजातीय समाज से जुड़े सुझाव

वक्ताओं ने सुझाव दिया कि कन्वर्ट जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण पर पुनर्विचार किया जाए, जनजातीय महिलाओं के जाति प्रमाण-पत्र का निर्धारण उनकी मूल पहचान के आधार पर किया जाए और संथाल परगना क्षेत्र में जनजातीय जमीन की सुरक्षा के लिए परंपरागत व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।

दूसरे सत्र में सरसंघचालक का संबोधन

दूसरे सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित लोगों की जिज्ञासा समाधान करते हुए कहा कि वनवासी समाज और हिंदू समाज अलग नहीं हैं।

हिंदू जीवन पद्धति और सभ्यता पर विचार

सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। इसमें विविधताओं के बावजूद एकता का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता जंगल, खेती और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ी है और वेदों एवं उपनिषदों का मूल भी इसी जीवन पद्धति से जुड़ा हुआ है।

विविधता, धर्म और मानवता का संदेश

सरसंघचालक जी ने कहा कि धरती माता सभी भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का पालन करने वाली है। इसलिए विविधता का सम्मान करना हमारी परंपरा है।

उन्होंने कहा कि धर्म का मूल अर्थ सत्य, सेवा, परोपकार और संयम है। समाज जब भोग और स्वार्थ में उलझ गया, तब आपसी मतभेद बढ़े और बाहरी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व में एक ही धर्म है, मानव धर्म और वही हिंदू धर्म का मूल स्वरूप है।

समाज को एकजुट रहने का आह्वान

उन्होंने जनजातीय समाज को चेताते हुए कहा कि यदि समाज बंटेगा तो कमजोर होगा। यदि एकजुट रहेगा तो कोई शक्ति उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। उन्होंने सरना को पूजा पद्धति बताते हुए कहा कि इसे हिन्दू धर्म से अलग रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज को जोड़ने का है, न कि विभाजित करने का।

शिक्षा, संस्कृति और आत्मनिर्भरता पर जोर

सरसंघचालक जी ने जनजातीय समाज की शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बच्चों को शुरूआती आयु से ही अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरव की शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे वे कभी भटकेंगे नहीं और यदि भटके भी तो अपनी जड़ों की ओर वापस लौट आएंगे।

भगवान बिरसा मुंडा और सामाजिक चुनौतियां

उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुष पूरे समाज की धरोहर हैं और उनके विचारों से सभी को परिचित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनजातीय भूमि की रक्षा, श्रम करने वालों की प्रतिष्ठा, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामाजिक समरसता समय की जरूरत है। कन्वर्जन, जमीन हड़पने, सामाजिक शोषण और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना संगठित होकर ही किया जा सकता है।

स्वाभिमान और आत्मनिर्भर बनने का संदेश

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि आत्मनिर्भर बनते हुए अपने स्वाभिमान को जागृत करें और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति छोड़ें। कार्यक्रम में राज्य भर से आए आदिवासी प्रतिनिधि सहित कुल 36 वक्ताओं ने अपने विचार और सुझाव प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख लोग

कार्यक्रम में क्षेत्र संघचालक देवव्रत पाहन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, चंपई सोरेन, पद्मश्री अशोक भगत, गीता कोड़ा, संघ के क्षेत्रीय और प्रांतीय पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बड़ी संख्या में जनजातीय समाज के लोग उपस्थित रहे।

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