निष्ठा की परीक्षा : राष्ट्र भावनाओं पर समझौता क्यों नहीं करते
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निष्ठा की परीक्षा : राष्ट्र भावनाओं पर समझौता क्यों नहीं करते

भारत विभाजन के बाद निष्ठा पर संदेह क्यों बना रहा? उम्माह, राष्ट्रवाद और भारतीय मुसलमानों की जटिल दुविधा पर तीखा विश्लेषण।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 23, 2026, 10:13 pm IST
in विश्लेषण, मत अभिमत
Bihar Muslim Vote

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत का विभाजन केवल ज़मीन का बँटवारा नहीं था; वह निष्ठाओं का विभाजन था-और उसकी गूंज आज भी भारतीय राजनीति और समाज में सुनाई देती है। भारतीय मुसलमानों (सभी नहीं) के प्रति संदेह किसी खान-पान, पहनावे या धार्मिक आचरण से पैदा नहीं हुआ। यह संदेह पैदा हुआ राष्ट्रीय संकट के क्षणों में, जब राष्ट्र भावनात्मक एकता की अपेक्षा करता है, तर्कों की नहीं।

राष्ट्रीय संकट और भावनात्मक एकता की अपेक्षा

1965 के भारत–पाक युद्ध में लगाया गया ब्लैकआउट कोई औपचारिक आदेश नहीं था-वह नागरिकों की जान बचाने का उपाय था। ऐसे समय में उसका उल्लंघन कोई “छोटी चूक” नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ था। इसी तरह, भारत-पाक खेल मुकाबलों में भारत की हार पर खुशी या जीत पर शोक व्यक्त करना निजी भावना नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत माना गया।

यह व्यवहार केवल भारत तक सीमित नहीं

यह व्यवहार भारत-विशेष नहीं है। ब्राज़ील में अर्जेंटीना की जीत पर जश्न मनाइए, अमेरिका में रूस के समर्थन में नारे लगाइए, या इंग्लैंड में एशेज के दौरान ऑस्ट्रेलिया के लिए मातम मनाइए- हर जगह परिणाम एक-सा होगा: संदेह।

संघर्ष के समय राष्ट्र सामूहिक भावनाएँ अपेक्षित करता है

राष्ट्रों के लिए भावनाएँ भी सामूहिक होती हैं, खासकर संघर्ष के समय। आज अमेरिका और ब्रिटेन में राष्ट्रीय झंडे जलाना, विदेशी झंडे लहराना, या राष्ट्रविरोधी नारे लगाना—यहां तक कि उदार, नास्तिक और सेक्युलर समाज को भी अस्वीकार्य लगता है। ऐसे आचरण का विरोध करना न तो नस्लवाद है, न दक्षिणपंथ-यह नागरिक अनुशासन और राष्ट्रीय एकता की न्यूनतम अपेक्षा है।

उम्माह की अवधारणा और सबसे बड़ा विरोधाभास

सबसे बड़ा विरोधाभास “उम्माह” की अवधारणा में छिपा है। गैर-मुस्लिम देशों में यह अधिकार और पीड़ित-भावना का हथियार बन जाती है, लेकिन मुस्लिम-बहुल देशों में वही अवधारणा सत्ता, जातीय वर्चस्व और भेदभाव के आगे गायब हो जाती है। यही कारण है कि अविश्वास खत्म नहीं होता।

निष्ठा का प्रश्न और समाधान की कठोर सच्चाई

समाधान कठोर है, पर स्पष्ट है। जिस दिन नागरिक पहचान धार्मिक वैश्विक राजनीति से ऊपर रखी जाएगी, उसी दिन निष्ठा पर प्रश्न उठना बंद होगा। राष्ट्र सहिष्णु हो सकते हैं, लेकिन भावनात्मक तटस्थता के साथ नहीं। इतिहास यही सिखाता है – राष्ट्र अधिकार देते हैं, पर निष्ठा की कीमत पर नहीं।

भारत के मुसलमानों की दुविधा : जटिल भी, सरल भी

भारत के मुसलमानों की दुविधा जितनी जटिल दिखाई देती है, उतनी ही मूल स्तर पर सरल भी है। इसकी जड़ें किसी आधुनिक राजनीतिक घटना में नहीं, बल्कि सीधे-सीधे भारत विभाजन में निहित हैं।

विभाजन: वैचारिक और सभ्यतागत विच्छेद

विभाजन केवल भूगोल का बँटवारा नहीं था, बल्कि एक वैचारिक और सभ्यतागत विच्छेद था। इसका आधार यह मान्यता थी कि मुसलमान एक अलग राजनीतिक और सामाजिक इकाई हैं। मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया था-कि इस्लाम अन्य धर्मों के साथ, विशेषकर अल्पसंख्यक स्थिति में, शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व नहीं रख सकता। यह कोई रणनीति नहीं, बल्कि एक वैचारिक दावा था।

उम्माह और पश्चिमी देशों में उभरता यथार्थ

आज वही विचार पश्चिमी देशों में भी प्रत्यक्ष दिख रहा है-ऐसे देश जो आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से अत्यंत विकसित और उदार हैं। इसका मूल कारण इस्लामी राजनीतिक अवधारणा उम्माह है, जहाँ राष्ट्र से पहले धार्मिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती है।

विभाजन के बाद स्थायी असंतोष

भारतीय संदर्भ में इससे स्थायी असंतोष पैदा हुआ। एक ओर यह भावना रही कि यदि विभाजन न होता, तो जनसंख्या के आधार पर सत्ता अंततः उनके हाथ में होती। दूसरी ओर, विभाजन के बाद यह पीड़ा रही कि वे मुस्लिम-बहुल देश में समान अधिकारों के साथ रहने के बजाय भारत में संदेह के घेरे में अल्पसंख्यक बन गए।

संदेह का जन्म और युद्धों की भूमिका

यह संदेह अचानक नहीं आया। विभाजन के तुरंत बाद साम्प्रदायिक हिंसा और युद्धों ने इसे जन्म दिया। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय साधारण नागरिक इलाकों में भी मुसलमानों को शक की निगाह से देखा गया। छोटे-छोटे व्यवहार—जैसे ब्लैकआउट नियमों का पालन न करना—देशद्रोह के संकेत समझे जाने लगे। भारत-पाक क्रिकेट या हॉकी मैचों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ भी राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण मान ली गईं।

समय के साथ बढ़ती दूरी और राजनीतिक लाभ

समय के साथ यह दूरी बढ़ती चली गई। जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती मुखरता ने बहुसंख्यक समाज में यह भय पैदा किया कि कहीं देश का दूसरा विभाजन न हो जाए। इस स्थिति का लाभ राजनीतिक शक्तियों ने उठाया।

विदेशी संवाद और उम्माह की वास्तविकता

विदेशों में मुसलमानों से हुई बातचीत इस पूरी बहस को और स्पष्ट कर देती है। अमेरिका में पाकिस्तानी पंजाबी, मुहाजिर और भारतीय मुसलमानों से संवाद से यह सच्चाई सामने आती है कि मुस्लिम-बहुल देशों में उम्माह की अवधारणा स्वयं दम तोड़ देती है। वहाँ जातीय वर्चस्व, सत्ता एकाधिकार और भेदभाव खुलकर मौजूद हैं। पाकिस्तान में मुहाजिरों की पीड़ा और पंजाबी प्रभुत्व इसका उदाहरण है। उनकी नाराज़गी महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि मुसलमानों को भारत में रुकने के लिए “बहलाया” गया।

उम्माह: चयनित हथियार की सच्चाई

यहीं असली सच्चाई उजागर होती है—उम्माह एक चयनित हथियार है, जिसे गैर-मुस्लिम देशों में अधिकार और दबाव के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन मुस्लिम देशों में सत्ता की राजनीति आते ही भुला दिया जाता है।

समाधान: नागरिकता की प्राथमिकता

समाधान सरल है, भले ही राजनीतिक रूप से कठिन हो। जिस दिन भारतीय मुसलमान धार्मिक वैश्विक राजनीति को त्यागकर भारत को अपनी एकमात्र राष्ट्रीय और सभ्यतागत पहचान मान लेंगे, उस दिन उनकी निष्ठा पर प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाएगा।

वैश्विक संदर्भ में यही एकमात्र स्थायी रास्ता

यही सिद्धांत विश्व के हर गैर-मुस्लिम देश में रहने वाले मुसलमानों पर भी लागू होता है। नागरिकता की प्राथमिकता ही स्थायी विश्वास और सह-अस्तित्व की कुंजी है।

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सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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