महान साहित्यकार, राष्ट्र चेतना के अग्रदूत और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के रचनाकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी की आज जयंती है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम” की रचना 7 नवंबर, 1875 को की थी। इसका पहला प्रकाशन साहित्यिक पत्रिका ‘बंग दर्शन’ में किया गया था, उसके बाद 1882 में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने मशहूर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया था। यह प्रथमतः संस्कृत और बंगाली के मिश्रण में रचित किया गया था। इसे पहली बार 1896 के इंडियन नेशनल कांग्रेस के कलकत्ता सेशन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गाया गया था।
केंद्र सरकार का ऐतिहासिक फैसला: वंदे मातरम के सभी छह छंद गाना हुआ अनिवार्य
मगर इस महान रचना और महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को असल मान-सम्मान वर्तमान केंद्र सरकार ने दिया है। मोदी सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लेते हुए भारत के गौरव और अभिमान से जुड़े राष्ट्रगीत वंदे मातरम के सम्मान से जुड़ी दिशानिर्देश जारी करते हुए वंदे मातरम के पूरे छह छंद गाए जाने को अनिवार्य बना दिया है। वंदे मातरम के पूरे छह छंदों को 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण की वजह से हटा दिया था। अब वंदे मातरम के सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य होगा और अब कोई भी मजहबी चश्मे से इस महान गीत का अपमान नहीं कर सकेगा। ऐसे लोगों को यह स्वीकार करना होगा कि वंदे मातरम भारत माता की शक्ति है। यह निर्णय किसी एक विचारधारा का नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है जो हमें विरासत में मिली है।
नए सरकारी दिशानिर्देश: स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों के लिए जारी हुए कड़े नियम
केंद्र सरकार के नए आदेश के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना उसी तरह से अनिवार्य होगा जैसे राष्ट्रगान के वक्त होता है। इस आदेश के तहत राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन गण मन साथ में, पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान की मुद्रा में खड़े होना होगा।
नए निर्देश के मुताबिक सभी स्कूलों में दिन की शुरुआत वंदे मातरम से होगी। नए नियम के अनुसार राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरे गाए जाएंगे, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड यानी 190 सेकंड की होगी। अभी तक वंदे मातरम के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। नए दिशानिर्देशों के अनुसार तिरंगा फहराने, किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम उनके संबोधनों से पहले और बाद में, राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में सहित कई आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम अनिवार्य होगा। आदेश के मुताबिक मंत्रियों या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौजूदगी वाले गैर-औपचारिक लेकिन जरूरी कार्यक्रमों में भी वंदे मातरम सामूहिक रूप से पूरे सम्मान और शिष्टाचार के साथ गाया जा सकता है।
संविधान सभा की बहस: राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर क्या थे विचार?
संविधान सभा में जन गण मन और वंदे मातरम, दोनों गीतों में से किसे राष्ट्रगान बनाया जाए, इसे लेकर लंबी चर्चा हुई थी। इसे लेकर कई सम्मानित सदस्यों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए थे। कुछ लोग वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान बनाना चाहते थे तो कुछ जन गण मन को, और कुछ दोनों को बराबर सम्मान देने के पक्ष में थे। वर्तमान में कुछ लोग वंदे मातरम को मजहब के चश्मे से देखते हैं और इसे मुस्लिम विरोधी करार देते हैं। मगर ऐसे लोगों को मौलाना आजाद के विचारों को जानना चाहिए जो इस्लाम के जानकार थे और उनका जन्म मक्का जैसे पवित्र नगर में हुआ था। उन्होंने कहा था कि दोनों गीतों के बीच कोई टकराव नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं, बल्कि मौलाना आजाद ने वंदे मातरम को राष्ट्र की आत्मा बताया था।
अब सवाल है कि क्या आज वंदे मातरम का विरोध करने वाले लोग मौलाना आजाद से ज्यादा देशभक्त और उनसे ज्यादा इस्लाम के जानकार हैं? लेकिन सबसे ओजस्वी विचार नेहरू सरकार के कैबिनेट मंत्री के. एम. मुंशी का था। उन्होंने कहा कि जो लोग वंदे मातरम पर धार्मिक आपत्ति उठाते हैं, वे लोग वंदे मातरम की पूर्ण भावना नहीं समझते हैं। यह गीत मां भारती के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है ना कि किसी धार्मिक उपासना का।
24 जनवरी 1950 का ऐतिहासिक निर्णय: डॉ. राजेंद्र प्रसाद की महत्वपूर्ण घोषणा
आँखिरकार राष्ट्रगान के मुद्दे पर संविधान अपनाने से दो दिन पहले यानी 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की बैठक हुई थी, जिसकी अध्यक्षता डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। इसमें जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया था। इस घोषणा में कहा गया कि वंदे मातरम और जन गण मन, दोनों को बराबर सम्मान दिया जाएगा। इस घोषणा में यह भी स्पष्ट किया गया कि वंदे मातरम को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जो स्थान और सम्मान मिला, उसे हमेशा बनाए रखा जाएगा। यह घोषणा करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को कहा था कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान होगा और भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदे मातरम गीत को जन गण मन के समान ही सम्मान दिया जाएगा तथा उसे समान दर्जा प्राप्त होगा।
1971 का कानून और राष्ट्रीय गीत की उपेक्षा: क्या थी तत्कालीन सरकार की नीति?
हमारे संविधान निर्माताओं ने सर्वसम्मति से तय किया था कि वंदे मातरम को भी वही सम्मान मिलेगा जो आज जन गण मन को है। उन्होंने कभी इस बात की कल्पना ही नहीं की थी कि एक दिन मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में फंसकर उनकी आने वाली पीढ़ी के नेता वंदे मातरम को ही भुला देने का कार्य करेंगे, जो 1971 में किया गया था। 1971 में स्वर्गीय इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और संसद में एक नया कानून ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम 1971’ लेकर आयी थीं। इसका उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को रोकना और उनके सम्मान की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
1971 के इस कानून में हमारे राष्ट्रगान जन गण मन को पूरी तरह से कानूनी संरक्षण दिया गया था, जिसके तहत राष्ट्रगान का अपमान करने पर तीन साल तक की सजा का प्रावधान था। लेकिन इस कानून में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हमारे राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को अलग रखा गया। अगर उस समय इस कानून में जन गण मन के साथ वंदे मातरम को भी कानूनी संरक्षण दे दिया जाता, तो आज कोई भी वंदे मातरम का अपमान करने की भूल नहीं करता।
1937 का कांग्रेस अधिवेशन: जिन्ना का दबाव और छह से घटाकर दो छंद किए जाने की कहानी
महत्वपूर्ण सवाल है कि इतने राष्ट्रभक्ति पूर्ण गीत के छह छंद होने के बावजूद भी केवल दो छंद ही क्यों गाए जाते थे? दरअसल इसकी जड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति निहित थी। मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना को खुश करने के लिए कांग्रेस ने 1937 में घुटने टेक दिए थे। इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो देखते हैं कि वंदे मातरम आजादी के हर सिपाही का स्वर था। क्रांतिकारी और अहिंसा को मानने वाले, सभी इसका उद्घोष करते थे। एक समय तक वंदे मातरम से कांग्रेस को भी दिक्कत नहीं थी और यह कांग्रेस के हर अधिवेशन में गाया जाता था। लेकिन 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से वंदे मातरम को लेकर एक ऐसा फैसला ले लिया जो अकल्पनीय था। कांग्रेस के इस एक फैसले ने वंदे मातरम की मूल भावना को ही नष्ट कर दिया।
15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग का एक अधिवेशन हुआ, जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना ने आश्चर्यजनक तौर पर वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बताया था। जिन्ना ने कहा कि कांग्रेस इसे भारत का राष्ट्रगीत बनाना चाहती है। जिन्ना ने ठीक उसी तरह का डर दिखाया था जो आज के कई कट्टरपंथी नेता आम मुसलमानों को वंदे मातरम के बारे में वर्तमान में दिखाते हैं। जिन्ना के इस वंदे मातरम विरोधी रुख से कांग्रेस इतना घबरा गई कि उसने हफ्ते भर बाद ही 22 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम की समीक्षा करने की घोषणा कर दी। उस समय जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस पार्टी को अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करनी थी।
कांग्रेस पार्टी ने यह संकेत दे दिए कि कोलकाता में होने वाली कार्य समिति की बैठक में वंदे मातरम में बदलाव किया जा सकता है। 29 अक्टूबर 1937 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम में बदलाव की घोषणा कर दी। जिन्ना के दबाव और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए वंदे मातरम के पहले दो छंदों को छोड़कर बाकी सारे छंद हटा दिए गए। इस घोषणा में यह भी कहा गया कि वंदे मातरम के बदले अब कोई दूसरा देशभक्ति का गीत भी गाया जा सकता है। नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के इस फैसले का कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी विरोध किया, लेकिन उनके स्वर को अनसुना कर दिया गया। इस तरह जिन्ना कांग्रेस को दबाने और अपने मकसद में कामयाब हो गया। इस बदलाव से जिन्ना और मुस्लिम लीग के हौसले इतने बुलंद हो गए कि इसके महज ढाई साल बाद ही 1940 में पाकिस्तान के नाम से एक अलग देश की मांग रख दी, जो महज 7 वर्ष यानी 1947 में पूरी भी हो गई।












