जिल-ए-इलाही की सल्तनत और दंगों की राजनीति : एक सुनियोजित इतिहास
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जिल-ए-इलाही की सल्तनत और दंगों की राजनीति : एक सुनियोजित इतिहास

स्वतंत्र भारत में दंगे कैसे सत्ता-संरक्षण का औज़ार बने? इंदिरा-राजीव से आज तक की सुनियोजित विरासत का पढ़िए तीखा मत-अभिमत

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 22, 2026, 08:00 pm IST
in भारत, मत अभिमत, दिल्ली
Delhi Riots

दिल्ली दंगों के दौरान की तस्वीर

इतिहास अक्सर “दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं” के सुविधाजनक झूठ के पीछे छिपा दिया जाता है। लेकिन कुछ अध्याय ऐसे होते हैं जो दफन होने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि उनका पैटर्न बहुत सुनियोजित होता है। स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक दंगे केवल हुए नहीं-उन्हें रचा गया, दोहराया गया और विरासत की तरह आगे बढ़ाया गया।

इंदिरा गांधी और 1969 के अहमदाबाद दंगे

इस आगे बढ़ाया इंदिरा गांधी ने। 1969 के अहमदाबाद हिंदू-मुस्लिम दंगे-2,000 से अधिक मौतें और 4,000 से ज़्यादा घायल, यह न तो अचानक भड़की हिंसा थी और न ही कोई दुर्घटना। यह राजनीतिक सत्ता-संरक्षण का एक ठंडा, गणनात्मक प्रयोग था।

नेहरू की विरासत और सत्ता-संरक्षण की राजनीति

चाचा-मैनो वंश की नव मुग़ल सल्तनत को वैध ठहराने के लिए जवाहरलाल नेहरू को मृत्यु के बाद भी हथियार बनाया गया। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेन देसाई—मोरारजी देसाई के समर्थक को योजनाबद्ध तरीके से बदनाम किया गया। सत्ता को पूर्ण निष्ठा चाहिए थी; असहमति देशद्रोह थी, और नैतिकता एक अनावश्यक बोझ।

राजीव गांधी और 1984 का सिख विरोधी दहन

जिल-ए-इलाही-2, राजीव गांधी, ने इसी मॉडल को और परिष्कृत किया। 1984 में सिख समुदाय को अचानक नया “दुश्मन” घोषित कर दिया गया। देश जलता रहा, राज्य देखता रहा। न्याय भीड़ को सौंप दिया गया, जवाबदेही नारों के नीचे दफन हो गई, और शोक को राजवंशीय अधिकार-बोध के आगे तुच्छ बना दिया गया।

आज का दौर और नियंत्रित अराजकता

आज वही विरासत हारे-थके जिल-ए-इलाही-3, ‘द नीरो’ के हाथों में है। उपलब्धियों के अभाव में वह ढहती हुई जागीर को नियंत्रित अराजकता के ज़रिये बचाने पर आमादा दिखते हैं। अगर पहले उत्तराधिकारियों ने चुनिंदा आग लगाई, तो यह सर्वव्यापी दहन चाहते हैं ? धर्म बनाम धर्म, जाति बनाम जाति, भाषा बनाम भाषा, यहाँ तक कि बहुसंख्यक हिंदू समाज के भीतर भी।

मोदी युग और विपक्ष की बौखलाहट

भारत के बढ़ते वैभव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेश में की गई देश की ब्रांडिंग से विपक्षी दलों की दाल अब नहीं गल पा रही है। वे कभी भाजपा पर साप्रंदायिक होने का झूठा आरोप लगाते हैं तो कभी राष्ट्रनिष्ठ और हिंदूनिष्ठ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति में घसीटने लगते है

नीरो की बांसुरी और आज का भारत

कभी रोम नीरो की बांसुरी पर जल रहा था। आज भारत से अपेक्षा है कि वह चुपचाप जले, जबकि अधिकार-बोध पीड़ित होने का अभ्यास करता रहे। चेहरे बदलते हैं, प्रवृत्ति नहीं। दंगे अपवाद नहीं थे-वे तरीका थे।

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सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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