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भारत-चीन संबंध : मित्रता-प्यार, पैंतरे हजार

चीन एक तरफ भारत के साथ अच्‍छे संबंध चाहता है, दूसरी तरफ सीमा पर आक्रामकता भी बनाए हुए है। यह उसके रणनीतिक मंसूबों में नरमी के संकेत नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव से निपटने का उसका नया पैंतरा है

Written byनम्रता हसीजानम्रता हसीजा — edited by Rajpal Singh Rawat
Jan 19, 2026, 10:34 am IST
inविश्व
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिन के बीच रूस के कजान में 23 अक्तूबर, 2024 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक बैठक हुई थी

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिन के बीच रूस के कजान में 23 अक्तूबर, 2024 को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक बैठक हुई थी

लगभग डेढ़ साल पहले भारत और चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गश्त की व्यवस्थाओं को लेकर समझौता किया, जिसमें देपसांग और डेमचोक जैसे पुराने विवादित बिंदु शामिल थे। इस समझौते से सीमा पर बरसों से चला आ रहा तनाव समाप्त हो गया, जो 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के कारण हुए संघर्ष के बाद बढ़ गया था।

बीजिंग के लिए नई दिल्ली के साथ हालिया कूटनीतिक गर्मजोशी, जो 2024 के अंत में सीमा समझौतों और उसके बाद उच्च स्तरीय संवाद से स्पष्ट है, रणनीतिक इरादे में नरमी का संकेत नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक, रणनीतिक पैंतरा है, जिसे गंभीर भू-राजनीतिक तनाव के दौर से निपटने के लिए तैयार किया गया है। चीन के घरेलू दृष्टिकोण से भारत के साथ संबंधों को प्रबंधित करने के निर्णय को मुख्य रूप से चीन-अमेरिका रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक हितों के चश्मे से देखा जाता है। चीन के आंतरिक विमर्श में वर्तमान पहल को सच्ची मित्रता के रूप में नहीं, बल्कि सतर्क और सशर्त पुनर्संतुलन के रूप में देखा जाता है, जिसका उद्देश्य भारत को अमेरिका का रणनीतिक साझेदार बनने से रोकना और आर्थिक अवसरों का लाभ उठाना है।

दरअसल, 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस लौटने की संभावना ने चीन को भारत के साथ संबंधों को स्थिर करने के लिए रणनीतिक बदलाव पर सोचने को प्रेरित किया। 2025 में ट्रंप की ट्रेड वॉर नीतियों ने आवश्यक आर्थिक दबाव बनाया, जिससे कूटनीतिक नरमी को बनाए रखने और गहरा करने में मदद मिली। भारत के साथ टकराव कम करने से बीजिंग को अपने कूटनीतिक और सैन्य संसाधनों को बचाने और अपने मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिला। इसके अलावा, अमेरिकी टैरिफ वॉर ने चीन को अपने उत्पादों के लिए भारत जैसे वैकल्पिक बाजारों की तलाश करने के लिए प्रोत्साहित किया।
हालांकि, यह कूटनीतिक नरमी नई दिल्ली के सामने जटिल विरोधाभास प्रस्तुत करती है। जहां बीजिंग आर्थिक स्थिरता चाहता है, वहीं उसका सैन्य रवैया और क्षेत्रीय गतिविधियां आक्रामक बनी हुई हैं। एलएसी पर चीनी सैन्य विकास तथा मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान पाकिस्तान को चीन का समर्थन दर्शाते हैं कि चीन-भारत मुकाबले के स्रोत पिछले साल और तेज हुए हैं। नई दिल्ली को यह सच्चाई समझनी चाहिए, भले भारतीय कंपनियां चीन के साथ आर्थिक जुड़ाव के लिए दबाव डालें। परेशानियां बनी रहेंगी, जो संबंधों को पटरी से उतार सकती हैं।

चीनी जुड़ाव के कारण

फुदान विश्वविद्यालय के अमेरिकी अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर व दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के निदेशक झांग जियाडोंग का तर्क है कि चीन-भारत संबंधों में नरमी वैश्विक प्रणालीगत बदलावों से उपजी है। उनके अनुसार, चीन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर मानता है, क्योंकि अमेरिकी ट्रेड वॉर अभी तक खत्म नहीं हुआ, यूक्रेन संघर्ष जारी है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है, इसलिए चीन, भारत के साथ क्षेत्रीय स्थिरता को रणनीतिक प्राथमिकता देता है।

कोविड-19 महामारी के बाद से चीन की अर्थव्यवस्था को कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारणों से आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसके चलते राष्ट्रपति शी जिनपिन को 2024 के आखिर में एक प्रोत्‍साहन पैकेज को मंजूरी देनी पड़ी। यह तर्क, विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में सख्‍त आर्थिक नीतियों की संभावना को देखते हुए चीन को पहले सीमा समझौते पर भारत के प्रति सुलह का रुख अपनाने और बाद में संबंधों में आर्थिक नरमी लाने के लिए मजबूर कर सकता है।

इस सिद्धांत के प्रमाणस्वरूप, भारत में चीनी राजनयिक यह विमर्श चला रहे हैं कि भारत की आर्थिक प्रगति के लिए चीनी उपकरण-तकनीशियन आवश्यक हैं। वे वीजा और यात्रा पाबंदियां ढीली करने, चीनी आयात अनुमति देने और हवाई उड़ानों की बहाली का दबाव डाल रहे हैं। चीन-भारत संबंधों में बदलाव का एक और प्रमुख कारण ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में हो रहा बदलाव है। फुदान विश्वविद्यालय के साउथ एशियन स्टडीज सेंटर के प्रोफेसर लिन मिनवांग के अनुसार, इसने हालिया चीन-भारत संबंधों को ‘फिर से शुरू’ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका विश्लेषण कहता है कि यह बदलाव चीन के दृढ़ कूटनीतिक धैर्य और भारत के रणनीतिक बदलाव का परिणाम है, न कि चीन की नीतियों में नरमी का। वास्तव में, चीन ने भारत को वॉशिंगटन के प्रभाव से दूर कर उसके साथ संबंध मजबूत करने का अवसर देखा और नई दिल्ली की पहलों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

उपग्रह चित्र से साफ है कि भारतीय सीमा के पास चीन लगातार निर्माण कर रहा है

विवाद की जड़ें

भारत-चीन संबंधों के इस सकारात्मक मोड़ के बावजूद नई दिल्ली को सावधानी बरतनी होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन के आंतरिक विमर्श में अभी भी यही प्रचलित है कि वैश्विक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भारत को काबू में रखना आवश्यक है। एलएसी पर निरंतर सैन्य निर्माण तथा मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष में पाकिस्तान को खुला कूटनीतिक-लॉजिस्टिकल समर्थन इसी का प्रमाण हैं। इसीलिए चीन की सरकारी मीडिया 2020 के सीमा विवाद को वह क्षण बताती है, जब बीजिंग ने भारत पर नई सामान्य स्थिति थोपी। सीसीटीवी के एक लेख (जिसे अक्तूबर 2024 के सीमा गश्त समझौते पर चीन की आधिकारिक व्याख्या माना जाता है) में दावा किया गया है कि पीएलए कभी एलएसी पर अग्रिम स्थिति से पीछे नहीं हटी, जिससे भारत का ‘भ्रम टूट गया कि चीन झुक जाएगा।’

लिन मिनवांग के अनुसार, इस दृढ़ता ने सीमा वार्ता के नियम बदल दिए और नई दिल्ली को नए संतुलन को स्वीकार करने पर मजबूर किया, जो समझौते का आधार बना। इसके अलावा, शी जिनपिन द्वारा पीएलए वेस्टर्न थिएटर कमांड पर दिया जा रहा विशेष ध्यान नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय है। चीन के पाँच थिएटर कमांड में यह सबसे बड़ा है, जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल और म्यांमार सीमाओं पर ऑपरेशनल नियंत्रण रखता है।

चीन की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार, बीजिंग ने तिब्बत में सैन्य-सुरक्षा बलों को उन्नत किया है, जिससे उच्च-ऊंचाई वाले इलाकों में युद्धक क्षमता और सीमा सुरक्षा में भारी वृद्धि हुई। 2024 में प्रकाशित ‘हिस्ट्री ऑफ द डेवलपमेंट ऑफ चाइनीज मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट्स’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट, जो पहले एक पूर्ण सैन्य-स्तरीय इकाई था, को विकसित कर डिप्टी थिएटर स्तर का बनाया गया। इससे इसके कमांडरों को उच्च पद, अधिक अधिकार और शीर्ष सैन्य निर्णयों में प्रत्यक्ष भूमिका मिली। इसके अतिरिक्त, आर्म्ड पुलिस की तिब्बत कोर ने जवानों की संख्या 32 प्रतिशत बढ़ाई, 85 प्रतिशत बल को ड्रोन जैसी नई तकनीकों से लैस किया तथा व्यापक गश्त से सीमा नियंत्रण मजबूत किया।

नई दिल्ली इन हरकतों को तिब्बत में चीन की सैन्य मौजूदगी बढ़ाने के रूप में देख रही है, जो चीन-भारत के नाजुक संबंधों में सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशों में बाधा डाल सकता है। एक और गंभीर चिंता का विषय है-मई 2025 के संघर्ष के दौरान चीन
द्वारा पाकिस्तान को दिया गया सीधा समर्थन। इस पर सरकार और भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च स्तरों पर पहले ही काफी ध्यान दिया जा चुका है।

फुदान विश्वविद्यालय के साउथ एशियन स्टडीज सेंटर के उप-निदेशक लिन ने एक कदम आगे बढ़कर भारत को चेताया कि पाकिस्तान पर सैन्य कार्रवाई से पहले उसे 2020 से कश्मीर के पास चीन की मौजूदगी पर विचार करना चाहिए। यह भारत के ‘दो-मोर्चों पर युद्ध’ के डर को पुष्ट करता है। यह चेतावनी चीन पर आर्थिक निर्भरता की रणनीति के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है। भारत अभी भी चीनी आयात पर अत्यधिक निर्भर है, जबकि कई वस्तुओं का स्वदेशी उत्पादन संभव है। इस निर्भरता से चीन को अपने सस्ते उत्पादों से भारतीय बाजार भरने का मौका मिला, जिससे स्थानीय उद्योग कमजोर हो रहे हैं और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी, खिलौने, बच्चों की किताबें और यहां तक कि मानव रक्त जैसी वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भरता भारत की कमजोरी दर्शाती है, जबकि पर्याप्त निवेश से इन उत्पादों को देश में ही बनाने की क्षमता है।

‘संबंधों में नरमी’ का मूल्यांकन

फिलहाल चीन-भारत संबंध अस्थायी सुधार के दौर में हैं, लेकिन चीन के नेतृत्व, नीति-समुदाय के संकेतों तथा वेस्टर्न थिएटर कमांड की सैन्य गतिविधियों से स्पष्ट है कि यह मात्र एक संघर्ष-विराम समझौता है। भारत को चीन की ओर से लगातार दबाव के लिए तैयार रहना चाहिए, विशेषकर एलएसी पर। तिब्बत मुद्दे पर दलाई लामा की उत्तराधिकार प्रक्रिया भी संबंधों में तनाव बढ़ा सकती है। चीनी राजदूत जू फेइहोंग ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत को दलाई लामा का समर्थन नहीं करना चाहिए।

इस सबसे स्पष्ट है कि चीन आर्थिक निर्भरता (खाद, दुर्लभ पृथ्वी तत्व जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों के नियंत्रित निर्यात के माध्यम से) और कूटनीतिक उपकरणों (जैसे-अरुणाचल प्रदेश के भारतीय पासपोर्ट अमान्य करने से) का उपयोग दबाव बनाने के लिए कर रहा है। इससे भारत को सतर्क रहना होगा। आने वाला समय बताएगा कि यह नाजुक सुलह भू-राजनीतिक खींचतान झेलेगी, या हिमालयी सीमा व तिब्बत मुद्दे पर ये एशियाई दिग्गज गहरी दुश्मनी की ओर बढ़ेंगे।

Topics: भू-राजनीतिक तनाव:देपसांग और डेमचोकपूर्वी लद्दाख संघर्षपीएलए वेस्टर्न थिएटर कमांडवास्तविक नियंत्रण रेखादो-मोर्चों पर युद्धतिब्बत और दलाई लामाकूटनीति और वैश्विक राजनीतिभारत चीन संबंधमोदी-शी जिनपिंगब्रिक्स शिखर सम्मेलनचीन-अमेरिका रणनीतिक प्रतिस्पर्धापाञ्चजन्य विशेषडोनाल्ड ट्रंप की नीतियांट्रंप प्रशासनआर्थिक निर्भरतारणनीतिक पैंतरा
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