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सनातन संस्कृति के शंखनाद का साक्षी बन रहा हरिद्वार का बैरागी द्वीप

बैरागी द्वीप की पावन भूमि पर देशभर के 108 प्रमुख तीर्थों की जल-रज से भरे पवित्र कलशों की स्थापना ने सम्पूर्ण वातावरण को तीर्थमय बना दिया है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jan 17, 2026, 01:54 pm IST
inधर्म-संस्कृति
हरिद्वार में होगा अखिल विश्व गायत्री परिवार के शताब्दी समारोह का आयोजन

हरिद्वार में होगा अखिल विश्व गायत्री परिवार के शताब्दी समारोह का आयोजन

तीर्थनगरी हरिद्वार इन दिनों अखिल विश्व गायत्री परिवार के शताब्दी समारोह की तैयारियों के साथ सनातन संस्कृति के शंखनाद से गुंजायमान हो रही है। राजा दक्ष की नगरी कनखल स्थित बैरागी द्वीप युग चेतना का जीवंत केंद्र बनती जा रही है। यह भूमि साक्षी बन रही है गायत्री परिवार के उस विराट आध्यात्मिक प्रयास की; जो आने वाले समय में समूची विश्व मानवता को नयी दिशा देने का सामर्थ्य रखती है। जहां भी दृष्टि जाती है; वहां साधना की ऊर्जा, सेवा का संकल्प और समर्पण की सुगंध अनुभव होती है। यहां की वायु में साधना की शक्ति है। धरती में तप की ऊष्मा और आकाश में युग परिवर्तन के संकल्प की प्रतिध्वनि गूंज रही है।

बंजर से भव्य नगर तक: श्रम, संकल्प और संस्कार की गाथा

शांतिकुंज के मीडिया प्रतिनिधि हेमंत साहू बताते हैं कि लगभग 30 लाख वर्ग मीटर में फैला यह शताब्दी समारोह स्थल आज एक सुव्यवस्थित, अनुशासित और प्रेरणादायी नगर का रूप ले चुका है। जिस भूमि को कभी बंजर और अनुपयोगी माना जाता था, उसी भूमि पर आज आवासीय नगर, भोजनालय, साधना स्थल, सेवा केंद्र, प्रशासनिक भवन, अस्पताल, परिवहन विभाग, मीडिया केंद्र और प्रदर्शनी स्थल सुचारु रूप से संचालित हो रहे हैं। यह निर्माण केवल ईंट-पत्थर और संसाधनों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति है, जिसमें लाखों परिजनों का त्याग, तप और अनुशासन समाहित है।

108 तीर्थों की जल-रज ऊर्जा से जागृत हुआ बैरागी द्वीप

बैरागी द्वीप की पावन भूमि पर देशभर के 108 प्रमुख तीर्थों की जल-रज से भरे पवित्र कलशों की स्थापना ने सम्पूर्ण वातावरण को तीर्थमय बना दिया है। यह जल कलश भारत की आध्यात्मिक एकता, सांस्कृतिक अखंडता और युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के युग निर्माणी विचारों के पर्याय हैं। प्रातः और सायं गूंजते गायत्री मन्त्रों और यज्ञाहुतियों की दिव्य सुगंध ने पूरे बैरागी द्वीप को प्राणवान बना दिया है। हर यज्ञकुंड से उठती अग्नि मानो यह उद्घोष कर रही है कि मानवता के नव निर्माण का समय समीप है। यह सब किसी एक व्यक्ति का प्रयास नहीं, बल्कि अखिल विश्व गायत्री परिवार की सामूहिक चेतना का साकार रूप है, जहाँ हर परिजन स्वयं को साधक भी मानता है और सेवक भी। देश के कोने-कोने से आए हजारों गायत्री परिजन कड़ाके की ठंड की परवाह किए बिना समारोह स्थल पर बने टेंटों में निवास कर रहे हैं। शीतलहर की रातें, सीमित संसाधन और कठोर परिस्थितियों के बावजूद उनके चेहरों पर गुरुकार्य के प्रति श्रद्धा व समर्पण और तप का तेज स्पष्ट झलकता है।

प्रशासनिक सेवा और सामाजिक दायित्व का अनूठा समन्वय

शताब्दी समारोह में समयदान करने आये बिहार सरकार के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आनंद कुमार कहते हैं, “मैं शांतिकुंज द्वारा आयोजित इतने बड़े समारोह में पहली बार आया हूं। एक सरकारी अधिकारी के रूप में कर्तव्य निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है। ऐसे आयोजन यह बताते हैं कि सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि एक संस्कार है।” उन्होंने कहा कि इस मंच से जुड़कर उन्हें जनकल्याण, सामाजिक सहभागिता और सामूहिक चेतना की सशक्त अनुभूति हुई है।

देश के कोने-कोने से उमड़ा श्रद्धालुओं का समर्पण

बिहार के स्वयंसेवक राजाराम एवं अभिमन्यु ने कहा, “हमने मुंबई में आयोजित अश्वमेध महायज्ञ में दो माह तक समयदान किया था, लेकिन वंदनीया माताजी की जन्मशताब्दी में सेवा करना हमारे जीवन का अमूल्य निर्णय है। निःस्वार्थ सेवा में हमने अनुभव किया कि ईश्वर स्वयं मार्गदर्शक बनकर हर कार्य में साथ खड़े होते हैं।” वहीं झारखंड के भरत रजक और बालेश्वर साव कहते हैं, ‘’उन्होंने जीवन में अनेक बड़े राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक आयोजन देखे हैं, पर यह समारोह सबसे अलग है। यहाँ कोई आदेश नहीं देता, हर व्यक्ति स्वयं अपने दायित्व को पहचानकर कार्य में जुट जाता है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।”

दक्षिण भारत से आई एक स्वयंसेविका ने कहा, “भाषा अलग हो सकती है, लेकिन सेवा की भाषा एक ही है। यहां आकर लगा कि हम किसी संस्था में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार में कार्य कर रहे हैं।” मध्य प्रदेश के बड़वानी से आई कस्तुरी सीताराम कन्नौजिया ने कहा, “महिलाओं को यहां पूरी गरिमा और आत्मीयता के साथ सेवा का अवसर मिला है। यह अनुभव मेरे जीवन की अमूल्य पूँजी बन गया है।” छत्तीसगढ़ के रायपुर से आए धनाउराम ध्रुव ने कहा, “हम जनजातीय अंचल से आते हैं। यहां हमारी पहचान, संस्कृति और श्रम-तीनों का सम्मान है। इस समारोह ने आत्मगौरव को और दृढ़ किया है।” जम्मू-कश्मीर के सुंदरबनी से आए सतपाल शर्मा ने कहा, “यहाँ सेवा करते हुए लगा कि राष्ट्र का निर्माण केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि संस्कारों से होता है।”

युग निर्माण का प्रत्यक्षीकरण

जन्मशताब्दी समारोह के दलनायक एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या के अनुसार 18 जनवरी से 24 जनवरी तक चलने वाला यह शताब्दी समारोह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक जीवंत आंदोलन है। यहां हर हाथ कार्यरत है, हर मन समर्पित है और हर हृदय युग परिवर्तन के संकल्प से धड़क रहा है। ठिठुरती ठंड में निःस्वार्थ भाव से समयदान कर रहे स्वयंसेवक वास्तव में युग निर्माण की नींव रख रहे हैं।”

इस आयोजन में 10 अन्य देशों से स्वयंसेवक प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हैं। लगभग 30 देशों के परिजन प्रत्यक्ष तथा 80 देशों के परिजन अप्रत्यक्ष रूप से इस समारोह से जुड़ने जा रहे हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं इंटर्नशिप कार्यक्रम के अंतर्गत इस विशाल आयोजन के प्रबंधन, व्यवस्था और निष्पादन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। देश-विदेश से आए स्वयंसेवकों के आवासन हेतु भागीरथी नगर, अत्रि नगर, चरक नगर सहित नौ नगर बसाए गए हैं, जिनका नाम नौ महान ऋषियों के नाम पर रखा गया है। इन नगरों में 40,000 से अधिक स्वयंसेवकों के आवासन, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की गयी है।

सुव्यवस्थित प्रशासन और आधुनिक व्यवस्थाएं

समूचे समारोह के सफल संचालन हेतु एक सुदृढ़ प्रशासनिक ढांचा विकसित किया गया है। 2 जनवरी 2026 को इस महायज्ञ का “वसुधा बंधन” कार्यक्रम उद्घाटन प्रांत के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह द्वारा किया गया था। आयोजन स्थल पर प्रशासनिक कार्यालय के अलावा 24×7 कार्यरत अस्पताल की व्यवस्था की गयी है, जिसमें 12 बेड, फर्स्ट-एड सुविधा तथा दो एंबुलेंस की सतत उपलब्धता सुनिश्चित की गयी है। माता भगवती के नाम पर दो विशाल भोजनालयों का निर्माण किया गया है, जहाँ प्रतिदिन हजारों स्वयंसेवकों के भोजन की व्यवस्था है। परिवहन विभाग के अंतर्गत 100 से अधिक छोटे-बड़े वाहनों की व्यवस्था की गयी है। मीडिया बंधुओं के लिए अलग से सूचना एवं प्रकाशन केंद्र स्थापित किया गया है।

 

Topics: हरिद्वारगायत्री परिवारकनखलशांतिकुंज हरिद्वारपाञ्चजन्य विशेषबैरागी द्वीप
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