तुर्किए से मिल रहे ताजा संकेत बता रहे हैं कि शायद तुर्किए पिछले दिनों बने सऊदी अरब-पाकिस्तान रक्षा गठजोड़ में जुड़ जाए। खबर फिलहाल ‘तुर्किए के इस समझौते में शामिल होने की बहुत संभावना’ जताती है। दरअसल, परमाणु हथियारों से लैस जिन्ना के बद्दिमाग देश के साथ रियाद का यह ‘रक्षा समझौता’ पिछले दिनों कतर में हमास के सरगनाओं पर इस्राएल के नाकाम हमले के बाद हुआ था। इससे न सिर्फ खाड़ी देशों में चिंता की लकीरें उभरी थीं बल्कि तुर्किए भी एक प्रकार से सचेत हुआ था। कारण यह कि उसने भी हमास के उन सरगनाओं की बढ़—चढ़कर मेजबानी की थी।
इस बाबत टाइम्स आफ इस्राएल ने एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है। इसमें बताया गया है कि तुर्किए सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सितंबर 2025 में हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते को विस्तार देते हुए उसमें शामिल होने संबंधी वार्ता कर रहा है।
सऊदी अरब के पास फिलहाल परमाणु हथियार नहीं हैं। इस खाड़ी देश ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते पर दस्तखत किए हैं। जिन्ना का देश दुनिया का इकलौता परमाणु हथियार संपन्न इस्लामी देश है। सऊदी अरब-पाकिस्तान रक्षा गठजोड़ आनन—फानन में तब हुआ था जब 9 सितंबर 2025 को कतर में हमास पर में इस्राएल का हमला लक्ष्य पर चोट नहीं कर पाया था। लेकिन इस हमले से चिंतित खाड़ी देश आक्रोशित हुए थे।

हालांकि इस समझौते के तहत सीधे तौर पर परमाणु हथियारों को लेकर कोई बात नहीं की गई थी, हालांकि इसमें एक शर्त यह जरूर है कि किसी एक देश पर हमला दोनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। जहां तक तुर्किए के इस गठजोड़ में शामिल होने की बात है तो इसकी ‘बहुत संभावना’ जताई जा रह है। अंकारा भले ‘नाटो’ में सदस्य के नाते अमेरिका के परमाणु हथियारों को अपने यहां तैनात किए है, लेकिन उसके पास अपने कोई हथियार नहीं हैं।
समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने भी इस मुद्दे पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें कहा गया है कि तुर्किए और सऊदी अरब परमाणु हथियार से लैस ईरान के घटनाक्रमों को लेकर लंबे समय से चिंतित रहे हैं।
अंकारा के एक विशेषज्ञ निहात अली ओजकान का कहना है कि अमेरिका इस इलाके में अपने और इस्राएल के हितों को प्राथमिकता देता जा रहा है, इसलिए बदलती परिस्थितियों और इलाकाई संघर्षों की वजह से अनेक देश अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के नए नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। इन चिंताओं के बावजूद, ट्रंप के राष्ट्रपति एर्दोगन के साथ करीबी रिश्ते हैं और उन्होंने इस इलाके में तुर्किए की बड़ी भूमिका पर बल दिया है। लेकिन यह इस्राएल के लिए बहुत चिंता की बात है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका तुर्किए को एडवांस्ड F-35 स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम में फिर से शामिल कर सकता है, लेकिन यह यरुशलम को बिल्कुल रास नहीं आता।
उधर तुर्किए भी गाजा संघर्ष की वजह से इस्राएल के सबसे कड़े आलोचकों में से एक रहा है, जिसकी तुलना तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने होलोकॉस्ट से की है। साथ ही, सीरिया में उभरे घटनाक्रमों से भी दोनों देशों के रिश्ते और खराब हुए हैं।

















