गत 3 अगस्त को नई दिल्ली के झंडेवाला स्थित केशव कुंज में ‘संघ प्रार्थना : गीता के परिप्रेक्ष्य में’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि गीता ने विश्व के सामने एक नवीन प्रकार का दर्शन प्रस्तुत किया है। गीता मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है।
लेखक ने कुछ पंक्तियों के माध्यम से उस भाव को जागृत करने का प्रयास किया है, जिसकी आज आवश्यकता है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह का निवारण किया था, उसी प्रकार यह पुस्तक स्वयंसेवकों के मन में कर्तव्य और राष्ट्रभाव को जागृत करने का कार्य करेगी। गीता-मनीषी एवं ‘जीओ गीता’ के संस्थापक स्वामी ज्ञानानन्द महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि संघ की प्रार्थना का मूल भाव गीता के संदेश से ही प्रेरित है और उसका उद्देश्य मन पर पड़े अज्ञान के आवरण को दूर करना है।
उन्होंने इस संदर्भ में सूर्य और बादलों का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य सदैव विद्यमान रहता है, आवश्यकता केवल उसके आवरण को हटाने की होती है। सुरुचि प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के लेखक हैं डॉ. मार्कंडेय आहूजा। उन्होंने कहा कि संघ प्रार्थना केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह भारतीय जीवन-दृष्टि, राष्ट्रचेतना, कर्तव्यबोध और आध्यात्मिक मूल्यों का सजीव घोष है। पुस्तक में भगवद्गीता के आलोक में संघ प्रार्थना के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
कार्यक्रम की शुरुआत में सुरुचि प्रकाशन के प्रबंध निदेशक रजनीश जिंदल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सुरुचि प्रकाशन की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देशभर के 150 से अधिक पुस्तक-विक्रय केंद्रों और ऑनलाइन माध्यमों के द्वारा विभिन्न विषयों पर आधारित 600 से अधिक शीर्षक पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।

















