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रिटायरमेंट के बाद 36 बीघा में प्राकृतिक खेती, चंद्रमोहन जांगिड़ ने किसानों के सामने पेश की मिसाल

जहां अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आरामदायक जीवन बिताना पसंद करते हैं, वहीं सीकर जिले के भादवाड़ी गांव के चंद्रमोहन जांगिड़ ने अपनी दूसरी पारी समाज, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के नाम कर दी।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 8, 2026, 06:33 pm IST
inपर्यावरण

जहां अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आरामदायक जीवन बिताना पसंद करते हैं, वहीं सीकर जिले के भादवाड़ी गांव के चंद्रमोहन जांगिड़ ने अपनी दूसरी पारी समाज, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के नाम कर दी। NBC (NEI Ltd.) में 33 वर्षों तक अधिकारी के रूप में सेवाएं देने के बाद उन्होंने खेती को केवल आजीविका नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाया। आज वे 36 बीघा भूमि पर पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक खेती कर हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सफलता केवल बड़े पद या ऊंची नौकरी तक सीमित नहीं होती, बल्कि समाज के लिए किया गया सार्थक कार्य ही व्यक्ति को वास्तविक पहचान दिलाता है।

रिटायरमेंट नहीं, नई शुरुआत

सेवानिवृत्ति के बाद चंद्रमोहन जांगिड़ ने महसूस किया कि रासायनिक खेती मिट्टी, पानी और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। उन्होंने संकल्प लिया कि अब वे ऐसी खेती करेंगे, जिससे धरती भी स्वस्थ रहे और लोगों की थाली तक शुद्ध भोजन पहुंचे। वे कहते हैं-

“अगर आज हमने रासायनिक खेती नहीं छोड़ी तो आने वाली पीढ़ी को अनाज नहीं, बीमारियां विरासत में मिलेंगी।”

36 बीघा में पूरी तरह प्राकृतिक खेती

पिछले छह वर्षों से उनके खेत में यूरिया, डीएपी और रासायनिक कीटनाशकों का नामोनिशान नहीं है। उनकी जगह जीवामृत, घन जीवामृत, वेस्ट डिकम्पोजर, नीमास्त्र और गो-आधारित जैविक घोलों का उपयोग होता है। इन सभी जैविक उत्पादों को वे स्वयं तैयार करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई, मिट्टी की उर्वरता बढ़ी और फसलों की गुणवत्ता पहले से कहीं बेहतर हो गई।

देसी नुस्खों से कीट नियंत्रण

जहां अधिकांश किसान महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर हैं, वहीं चंद्रमोहन जांगिड़ नीम, लहसुन, हरी मिर्च, धतूरा, आक, गोमूत्र, सरसों की खली, फिटकरी और चूने से तैयार प्राकृतिक घोलों का उपयोग करते हैं। ये उपाय पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ फसल और मानव स्वास्थ्य के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित हैं।

मिट्टी को फिर से बनाया जीवंत

लगातार प्राकृतिक खेती अपनाने का असर उनकी जमीन पर साफ दिखाई देता है। खेतों का जैविक कार्बन बढ़ा है, मिट्टी की संरचना सुधरी है और उत्पादन क्षमता में भी सकारात्मक परिवर्तन आया है। उनकी खेती यह साबित करती है कि प्राकृतिक तरीके अपनाकर भी बेहतर उत्पादन संभव है।

जिन्होंने मजाक उड़ाया, वही आज सीखने आते हैं

शुरुआत में लोगों ने उनकी सोच को अव्यावहारिक बताया, लेकिन आज आसपास के गांवों के किसान उनके खेत पर प्रशिक्षण लेने पहुंचते हैं। युवा किसान जैविक खाद बनाना, प्राकृतिक कीट नियंत्रण और कम लागत वाली खेती की तकनीक उनसे सीख रहे हैं।

खेती के साथ पर्यावरण संरक्षण का मिशन

चंद्रमोहन जांगिड़ केवल किसान नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के सक्रिय प्रहरी भी हैं। वे पौधारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं। उनके प्रयासों को देखते हुए उन्हें ‘श्रीमती मुंगेश्वरी देवी गोदारा स्मृति पर्यावरण प्रहरी सम्मान’ सहित कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

अब बनेगा प्राकृतिक खेती प्रदर्शन केंद्र

उनकी अगली योजना अपने खेत को “प्राकृतिक खेती प्रदर्शन केंद्र” के रूप में विकसित करने की है, जहां किसान प्रशिक्षण लेकर आधुनिक और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को व्यवहारिक रूप से सीख सकेंगे।

युवाओं के लिए प्रेरणादायक संदेश

चंद्रमोहन जांगिड़ का मानना है कि खेती का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी और इंसान को स्वस्थ रखने में है। सरकार योजनाएं दे सकती है, लेकिन खेती तभी बदलेगी जब किसान अपनी सोच बदलेगा।”

प्रेरणा की मिसाल

चंद्रमोहन जांगिड़ ने यह साबित कर दिया कि सेवानिवृत्ति जीवन का अंत नहीं, बल्कि समाज के लिए नई शुरुआत भी हो सकती है। आज उनकी 36 बीघा की प्राकृतिक खेती केवल एक खेत नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रयोगशाला है, जहां से स्वस्थ खेती, स्वच्छ पर्यावरण और बेहतर भविष्य का संदेश पूरे समाज तक पहुंच रहा है। उनकी सफलता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपने अनुभव और संकल्प से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं।

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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