वनवासी बच्चों की ताकत बना मल्लखंभ : दादरा-नागर हवेली और दमन-दीव में लिखी मजबूत कहानी
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वनवासी बच्चों की ताकत बना मल्लखंभ : दादरा-नागर हवेली और दमन-दीव में लिखी मजबूत कहानी

दादरा-नागर हवेली और दमन-दीव के वनवासी इलाकों में मल्लखंभ खेल आत्मविश्वास, पहचान और बदलाव की कहानी लिख रहा है। खेलो इंडिया और प्रशासनिक सहयोग से बच्चों को मिला नया मंच।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 9, 2026, 04:19 pm IST
inभारत, दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, खेल

दीव (हि.स.) । दादरा और नागर हवेली व दमन-दीव के वनवासी इलाकों में, जहां खेल लंबे समय तक रोज़मर्रा की आजीविका की जद्दोजहद के पीछे दबा रहा, वहीं पारंपरिक भारतीय खेल मल्लखंभ आज बदलाव की एक शांत लेकिन मजबूत कहानी लिख रहा है। कभी खुले खेतों और खाली मैदानों तक सीमित रहा यह खेल अब आत्मविश्वास, पहचान और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनता जा रहा है—वह भी संसाधनों से वंचित समुदायों के बच्चों के लिए।

मल्लखंभ कोच शुभम मैर और शुरुआती संघर्ष

इस परिवर्तन की धुरी हैं मल्लखंभ कोच शुभम मैर, जो 2019–20 में महाराष्ट्र के नासिक जिले से यहां आए थे। उन्हें खानवेल ग्राम पंचायत द्वारा अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया। वर्तमान में शुभम खानवेल डिवीजन के शेल्टी गांव स्थित मल्लखंभ अकादमी में मुख्य कोच के रूप में कार्यरत हैं। शुभम बताते हैं,“पहले दिन कुछ भी नहीं था—न प्रशिक्षण सुविधा, न उपकरण, न सुरक्षा इंतज़ाम। बच्चे धान के खेतों में, नंगी ज़मीन पर अभ्यास करते थे, कभी-कभी पेड़ों पर भी चढ़ते थे। पोल, मैट, तेल या पाउडर कुछ नहीं था। लेकिन सीखने की भूख असाधारण थी।”

खेती और दिहाड़ी मजदूरी से निकलकर खेल की ओर

अधिकांश बच्चों ने पहले कभी मल्लखंभ का नाम तक नहीं सुना था। खेती और दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले वनवासी परिवारों से आने वाले इन बच्चों के लिए खेल को करियर के रूप में देखना लगभग असंभव-सा था। जहां दो वक्त की रोटी जुटाना भी चुनौती हो, वहां व्यवस्थित प्रशिक्षण एक दूर का सपना लगता था।

खेलो इंडिया यूथ गेम्स से बदली दिशा

2019–20 में निर्णायक मोड़ तब आया, जब शुभम खेलो इंडिया यूथ गेम्स की तैयारी के लिए पंचकूला (हरियाणा) गए। इसके बाद लक्ष्य स्पष्ट था—उभरते खिलाड़ियों को प्रतियोगिता का अनुभव दिलाना। मकसद तुरंत पदक जीतना नहीं, बल्कि बच्चों को राष्ट्रीय स्तर के माहौल से परिचित कराना और आत्मविश्वास विकसित करना था। इस प्रयास को बाद में संस्थागत सहयोग भी मिला।

वनवासी खेल विकास को मिली प्रशासनिक प्राथमिकता

युवा कार्य एवं खेल, दादरा और नागर हवेली व दमन-दीव के संयुक्त सचिव अरुण गुप्ता ने बताया कि वनवासी खेल विकास संघ शासित प्रदेश की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। दादरा और नागर हवेली में 50 प्रतिशत से अधिक आबादी वनवासी समुदायों की है।

खानवेल और सिलवासा में खेल अवसंरचना का विस्तार

उन्होंने बताया कि खानवेल में स्थायी मल्लखंभ प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया गया है, जबकि सिलवासा में खेलो इंडिया स्टेट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से तीरंदाजी, एथलेटिक्स और टेबल टेनिस को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस केंद्र में लगभग 75 खिलाड़ी आवासीय सुविधा के साथ प्रशिक्षण ले रहे हैं, जिनमें अधिकांश वनवासी पृष्ठभूमि से हैं। इसके अलावा दिउ, दमन और दादरा एवं नागर हवेली में विश्वस्तरीय खेल अवसंरचना और हाई-परफॉर्मेंस सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।

प्रशिक्षण का असर और राष्ट्रीय मंच पर उपस्थिति

इस सहयोग का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। नासिक से आए वरिष्ठ कोचों के मार्गदर्शन से प्रशिक्षण पद्धतियां व्यवस्थित हुईं और नियमित प्रतियोगिताओं से खिलाड़ियों के कौशल में निखार आया। खेलो इंडिया बीच गेम्स 2026 में शुभम पहली बार छह लड़कों और छह लड़कियों की टीम लेकर पहुंचे—जिनमें से कई के लिए यह इतने बड़े बहु-खेल आयोजन का पहला अनुभव था।

आत्मविश्वास ही सबसे बड़ी जीत

शुभम कहते हैं,“जब बच्चे यहां प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि वे किसी भी राज्य के खिलाड़ियों से कम नहीं हैं। यही विश्वास सब कुछ बदल देता है।”

बच्चियों की आवाज़, सपनों की उड़ान

12 वर्षीय काव्या, जिन्हें स्कूल में मल्लखंभ से परिचय मिला, कहती हैं,“कक्षा सातवीं में यह खेल शुरू हुआ तो मुझे अच्छा लगा। सर ने बताया कि मेहनत से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।”

परिवार और खेल के बीच संतुलन

11 वर्षीय त्रुषा के पिता होटल में रसोइया हैं और मां गृहिणी। वह मुस्कराते हुए कहती हैं,“मेरे भाई-बहन मल्लखंभ नहीं करते, लेकिन मैं करना चाहती हूं।”

लड़कियों के लिए आत्मविश्वास और पहचान का माध्यम

इन लड़कियों के लिए मल्लखंभ सिर्फ शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और पहचान का रास्ता है। हालांकि चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। महिला कोचों की कमी के कारण खासकर लड़कियों के प्रशिक्षण में बाधाएं आती हैं, क्योंकि इस खेल में शारीरिक सहायता की आवश्यकता होती है।

महिला कोचों की कमी बनी बड़ी चुनौती

शुभम बताते हैं,“एक उम्र के बाद पुरुष कोच लड़कियों को प्रशिक्षित नहीं कर सकते। सामाजिक कारणों और महिला कोचों की कमी से कई प्रतिभाशाली लड़कियां पीछे रह जाती हैं।”

संकल्प अडिग, विश्वास अटल

फिर भी संकल्प अडिग है। कोच और प्रशासन समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयासरत हैं। विश्वास साफ है—प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

सही मार्गदर्शन से बदल सकती है तस्वीर

शुभम कहते हैं,“इन बच्चों के पास घर पर सुविधाएं नहीं हो सकतीं, लेकिन क्षमता अपार है। सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो ये बहुत आगे जा सकते हैं।”

Topics: Khelo India tribal playersसामाजिक परिवर्तनtraditional Indian gamesमल्लखंभवनवासी बच्चेदादरा नागर हवेलीदमन दीवपारंपरिक भारतीय खेलखेल अवसंरचनावनवासी बच्चों का मल्लखंभDaman Diu tribal sportsखेलो इंडियाMalakhambh success story
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