तुष्टिकरण की कीमत से सभ्यता पर संकट : भारत के खिलाफ रची गई साजिशों का भयावह सच
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तुष्टिकरण की कीमत से सभ्यता पर संकट : भारत के खिलाफ रची गई साजिशों का भयावह सच

कट्टरपंथ, अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय युद्ध भारत के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं। दशकों की तुष्टिकरण नीति ने कैसे राष्ट्र को भीतर से कमजोर किया— एक सख़्त और बेबाक विश्लेषण।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 8, 2026, 11:30 pm IST
inविश्लेषण, मत अभिमत
सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र

भारत में कट्टरपंथ और विभाजनकारी शक्तियां जड़ें जमा चुकी हैं। यह खतरनाक है। यह स्थिति उसके लोगों के कारण नहीं, बल्कि दशकों तक सत्ता में रहे उन शासकों की विनाशकारी नीतियों का परिणाम है, जिन्होंने तुष्टिकरण को सहिष्णुता और कमजोरी को नैतिकता समझ लिया।

आधुनिक युद्ध के हथियार : सीमाएं, जनसांख्यिकी और आतंक

वर्षों से भारत के शत्रुओं ने उसकी छिद्रपूर्ण सीमाओं, जनसांख्यिकीय हेरफेर, आतंकवाद, मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध घुसपैठ को युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। ये कोई आकस्मिक घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि भारत को भीतर से खोखला करने की सुविचारित रणनीतियाँ थीं-सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर पर।

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पनपता कट्टरपंथ

लगातार आने वाली सरकारों ने तथाकथित “धर्मनिरपेक्षता” की आड़ में कट्टरपंथी तत्वों को पनपने दिया। आतंकवादी नेटवर्कों को सहन किया गया। अवैध घुसपैठ को सामान्य बना दिया गया। जनसांख्यिकीय आक्रमण को नज़रअंदाज़ किया गया। राष्ट्रीय हित को बार-बार वोट-बैंक की राजनीति और वैचारिक अहंकार के लिए बलि चढ़ा दिया गया।

परिणाम: सामाजिक तनाव और वैचारिक विघटन

इसके परिणाम स्पष्ट हैं। सामाजिक ताना-बाना तनाव में है। कानून-व्यवस्था चुनौती में है। कट्टर विचारधाराएं खुलेआम सक्रिय हैं। भारत स्वयं को ऐसी परिस्थितियों के निकट पाता है, जो विभाजन-पूर्व भारत की भयावह याद दिलाती हैं-सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, जनसांख्यिकीय असुरक्षा और वैचारिक विघटन।

संप्रभु राष्ट्र और आत्मरक्षा का सिद्धांत

यह स्पष्ट होना चाहिए-

कोई भी संप्रभु राष्ट्र जीवित नहीं रह सकता यदि वह अपने शत्रुओं— चाहे वे बाहरी हों या आंतरिक — को बिना भय के कार्य करने दे। भारत ने कभी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा नहीं रखी। निर्णायक विजय के बाद भी उसने कब्ज़ाए गए क्षेत्रों को लौटाया, अपनी शक्ति को सीमित किया और रणनीतिक लाभ के बजाय नैतिक संयम चुना। उस संयम को कमजोरी समझ लिया गया।

इतिहास का कठोर सबक

सबक कठोर है लेकिन अनिवार्य : जो सभ्यताएँ स्वयं की रक्षा से इनकार करती हैं, वे सभ्य नहीं रहतीं-वे समाप्त हो जाती हैं।

निर्णायक कार्रवाई की अनिवार्यता

अब भारत को स्पष्टता, दृढ़ता और शून्य अस्पष्टता के साथ कार्य करना होगा। सीमाएँ, जनसांख्यिकी, आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान – ये कोई समझौते के विषय नहीं हैं। देरी की कीमत पहले ही बहुत भारी पड़ चुकी है। और अधिक हिचकिचाहट राजनीतिक आलोचना से कहीं अधिक गंभीर परिणाम ला सकती है—राष्ट्रीय विघटन।

इतिहास का अंतिम निर्णय

इतिहास उन समाजों को कभी क्षमा नहीं करता जो खतरे को पहचानते हैं, पर उसका सामना करने का साहस नहीं जुटा पाते।

Topics: तुष्टिकरण नीतिजनसांख्यिकीय बदलावभारत में कट्टरपंथतुष्टिकरण की राजनीतिराष्ट्रीय सुरक्षाजनसांख्यिकीय बदलाव भारतआंतरिक सुरक्षाअवैध घुसपैठ समस्याराष्ट्रवादआंतरिक दुश्मनअवैध घुसपैठभारत विभाजनकारी शक्तियांकट्टरपंथभारत की संप्रभुताराष्ट्रीय सुरक्षा खतरा
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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