सरला भट्ट उन शुरुआती किरदारों में थीं, जिन्हें केंद्र में रखते हुए कश्मीर घाटी में दहशत की खौफनाक पटकथा लिखी गई। ऐसी दहशत कि कश्मीरी हिंदू खुद ही अपने पुरखों की जमीन-जायदाद और सदियों की समृद्ध विरासत की भूमि को छोड़कर भाग जाएं। बेशक इसका खाका सीमा पार पाकिस्तान में खींचा गया और सोचे-समझे तरीके से इसे जमीन पर उतारा गया, लेकिन यह भयानक षड्यंत्र सिर्फ इसलिए सफल हो सका क्योंकि तत्कालीन सरकार ने जानते-बूझते इसे सफल होने दिया। कहीं मुस्लिम वोट बैंक हाथ से न निकल जाए इसलिए घाटी में होने वाले मानवाधिकार हनन के नंगे नाच पर चुप्पी साध ली गई।
सरला भट्ट मामले में आरोपपत्र दाखिल होना इसलिए भी विशेष है क्योंकि यहां बात केवल कश्मीर की एक बेटी की नहीं, बल्कि उन लाखों कश्मीरी हिन्दुओं के सामूहिक दर्द और अनकही व्यथा को समझने की है, जिसे दशकों तक सहलाने की, उसपर मरहम लगाने की कोशिश नहीं की गई। एक आजाद देश में, कथित स्वशासन के कालखंड में उन्हें जान बचाने और अपनी बहू-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए पलायन करना पड़ा। विडंबना देखिए कि उनके विवश पलायन पर ‘स्वेच्छा से घर छोड़ने’ का ठप्पा लगा दिया गया! यहां बात केवल नैतिकता की थी ही नहीं; बात थी राजनीतिक इच्छाशक्ति की और बिना किसी भेदभाव वाली न्याय-सत्ता की स्थापना की।
इस मामले में कुख्यात आतंकवादी यासीन मलिक को मुख्य साजिशकर्ता मानते हुए आरोपपत्र दाखिल किया गया है, जो पहले से ही आतंकवादियों को आर्थिक मदद के मामले में तिहाड़ में उम्रकैद की सजा काट रहा है। लेकिन एक दौर वह भी था जब मुस्लिम तुष्टीकरण को चुनावी सफलता की गारंटी मानने वाली सत्ता को इस खूंखार आतंकवादी में ‘अमन का मसीहा’ दिखता था और उसके लिए कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दफ्तर में पलक पांवड़े बिछाए जाते थे।
आतंकी दरिंदगी
सरला भट्ट का जीवन किसी भी अन्य मध्यमवर्गीय कश्मीरी परिवार की तरह सुंदर सपनों, जिम्मेदारियों और उम्मीदों से बुना हुआ था। वे श्रीनगर के सौरा मेडिकल इंस्टीट्यूट में एक समर्पित नर्स के रूप में काम कर रही थीं। बीमारों की सेवा करना, तड़पते मरीजों को मरहम लगाना और लोगों की जिंदगियों को बचाना उनका दैनिक काम था। लेकिन 1990 के उस पाशविक दौर में, जहां मानवता की हत्या हो चुकी थी, सरला भट्ट की यही कर्तव्यनिष्ठा उनके लिए काल बन गई।
अप्रैल 1990 के मध्य में, जब घाटी के कोने-कोने में जेकेएलएफ का खौफ अपने चरम पर था, सरला भट्ट ने अस्पताल के भीतर आतंकियों की कुछ बेहद संदिग्ध गतिविधियों को भांपा और इसकी चर्चा अपने वरिष्ठों से की। 737 पन्नों के आरोपपत्र में जांच एजेंसी ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि आयुर्विज्ञान संस्थान के भीतर तब आतंकवादियों का एक गहरा नेटवर्क सक्रिय था, जिसमें कुछ डॉक्टरों और प्रशासनिक कर्मचारियों की सहानुभूति या प्रत्यक्ष संलिप्तता जेकेएलएफ के साथ थी। आरोपपत्र के अनुसार, सरला भट्ट द्वारा देखी गई संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी उनके ही विभाग या संस्थान के भीतर से लीक होकर आतंकियों तक पहुंच गई। नतीजा यह हुआ कि 19 अप्रैल 1990 को, दिन के उजाले में अस्पताल परिसर के भीतर से ही बंदूक के बल पर सरला भट्ट का अपहरण कर लिया गया।
इसके बाद सरला भट्ट के साथ जो हुआ, वह आतंकवाद के उस घिनौने और दरिंदगी भरे चेहरे को उजागर करता है। उन्हें एक अज्ञात ठिकाने पर बंधक बनाकर रखा गया। उन पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया गया, सामूहिक बलात्कार किया गया और उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। फिर भी आतंकियों का मन नहीं भरा, तो उन्होंने सरला भट्ट के शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया। बर्बरता की हद यह थी कि उनके नग्न शव को श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके की एक व्यस्त सड़क पर फेंक दिया गया। यह केवल एक हत्या नहीं थी, यह पूरे कश्मीरी हिंदू समुदाय के भीतर डर पैदा करने का ऐसा खौफनाक संदेश था कि यदि किसी ने भी आतंकियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत की, तो उसका अंजाम ऐसा ही होगा।

सोची-समझी साजिश
सरला भट्ट के साथ यह नृशंसता कोई अकेली या छिटपुट घटना नहीं थी, बल्कि यह लक्षित हत्या की उस सोची-समझी श्रृंखला का हिस्सा थी, जिसे कश्मीरी हिंदुओं के समूल सफाए और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के लिए तैयार किया गया था। टीका लाल टपलू, जस्टिस नीलकंठ गंजू, सतीश टिक्कू और दूरदर्शन के निदेशक लस्सा कौल जैसी प्रतिष्ठित और समाज को दिशा देने वाली हस्तियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया था। इन हत्या का मकसद बेहद क्रूर व साफ था- कश्मीरी हिंदू समाज के नेतृत्व, उनके बौद्धिक गौरव और उनके सामूहिक आत्मविश्वास को इस तरह तोड़ देना कि वे खुद को अनाथ महसूस करने लगें। जब समाज के सबसे रसूखदार, सम्मानित और सुरक्षित समझे जाने वाले लोग सरेआम सड़कों पर मार दिए गए, तो आम कश्मीरी हिंदुओं के भीतर यह संदेश गहराई से बैठ गया कि अब इस घाटी में उनके बने रहने का सीधा मतलब सिर्फ और सिर्फ अपनी दर्दनाक मौत की तारीख का इंतजार करना है।
इसके बाद आधुनिक भारत के इतिहास ने वह पीड़ादायक पलायन देखा, जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह ऐसा ऐतिहासिक और गहरा घाव था जिसे देश की कथित सेकुलर राजनीति ने लंबे समय तक एक ‘सामान्य विस्थापन’ कहकर ढकने की कोशिश की। इस भयानक त्रासदी के बाद सरला भट्ट के परिवार ने जो 36 वर्ष बिताए हैं, वह एक अंतहीन और पथराए हुए रुदन की दास्तान है। जम्मू के तपते हुए शरणार्थी शिविरों की बदहाली, फटे हुए टेंटों की जिंदगी और अपनी ही मातृभूमि में एक बेगाने, लाचार शरणार्थी तरह जीने के दर्द के बीच, इस परिवार ने न्याय की उम्मीद लगभग छोड़ ही दी थी। साढ़े तीन दशक तक इस परिवार ने हर एक दिन इस कड़वी याद और मलाल के साथ जिया है कि उनकी बेटी को इंसाफ दिलाना तो दूर, देश की मुख्यधारा की राजनीति और मीडिया उसका नाम लेने से भी कतराते रहे, ताकि उनकी तथाकथित सफेद सेकुलर चादर पर कोई धब्बा न लग जाए।
दिल्ली का सौतेला व्यवहार
इस पूरे काले इतिहास का सबसे विचलित करने वाला और शर्मनाक अध्याय वह है, जो दिल्ली की सत्ता के गलियारों में लिखा जा रहा था। जिस समय घाटी में मस्जिदों के लाउड स्पीकरों से कश्मीरी हिंदुओं को यह खौफनाक मजहबी नारा दिया जा रहा था: “रलीव, गलीव या चलीव” अर्थात् या तो इस्लाम कबूल करो, या मरो, या फिर घाटी से चले जाओ; जब “असि गछी पाकिस्तान, बतव रोसते, बतनेव सान” अर्थात् हमें (कश्मीर में) पाकिस्तान चाहिए, कश्मीरी पंडित पुरुषों के बिना, लेकिन उनकी महिलाओं के साथ- जैसे नारे गूंज रहे थे और बाद में जब यही नारे कश्मीरी हिंदुओं के घरों पर और यहां-वहां पोस्टरों के रूप में चिपकाए गए, तब ‘दिल्ली दरबार’ गांधी के उन तीन बंदरों की भूमिका में था, जो न देख सकते थे, न सुन सकते थे और न ही बोल सकते थे।
1990 के उस भयानक दौर में घाटी की विभीषिका और दिल्ली की उदासीनता के इस कड़वे सच को तत्कालीन उपराज्यपाल जगमोहन ने अपनी प्रसिद्ध किताब “माई फ्रोजन टर्बुलेंस इन कश्मीर” में बड़ी बेबाकी के साथ दर्ज किया है। इस किताब के अध्याय ‘द वार्निंग सिग्नल्स’ में वे लिखते हैं, “घाटी बारूद के ढेर पर बैठी थी। मस्जिदों से मजहबी उन्माद के नारे गूंज रहे थे। मैंने दिल्ली में बैठे नीति-निर्धारकों को बार-बार आगाह किया, उन्हें जमीनी हकीकत बताई और तुरंत कड़े कदम उठाने की गुहार लगाई। लेकिन दिल्ली की सत्ता अपनी फितरती सहूलियत की सियासत में मग्न थी। उनके लिए कश्मीर की बेटियों की अस्मत और बेगुनाहों का खून महज एक राजनीतिक समीकरण था, जिसे वे देश के व्यापक वोट बैंक के चश्मे से देख रहे थे। दिल्ली के इसी शुतुरमुर्गी रवैये ने आतंकियों का हौसला बढ़ाया और घाटी को बर्बादी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।”
देश के नीति-निर्धारक इन हत्यारों के सामने नतमस्तक थे
जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सरगना यासीन मलिक, जिसके हाथ सरला भट्ट समेत बहुतेरे कश्मीरी हिंदुओं और वायुसेना के जवानों के खून से सने थे, वह लगभग तीस वर्ष तक देश और दुनिया में एक सम्मानित अतिथि की तरह घूमता रहा। उसकी इस अय्याशी, हवाई यात्राओं और पांच सितारा होटलों का खर्च इसी देश के उन करदाताओं के पैसे से उठाया जा रहा था, जिनके भाइयों और बहनों को वह घाटी में मौत के घाट उतार रहा था। यह वही यासीन मलिक है, जो देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सरकारी आवास पर रेड कारपेट पर आमंत्रित किया जाता था। देश के सर्वोच्च पद पर बैठे लोग कश्मीरी हिंदुओं के इस कसाई से हाथ मिलाकर निहाल हुए जाते थे और सोफे पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए कश्मीर में ‘अमन की बहाली’ का ढोंग रचते थे। आतंकवादियों और गुमराह लोगों को मुख्यधारा में लाने के बाने में चले इस आत्मघाती और कायरतापूर्ण खेल ने कश्मीरी हिंदुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया। तुष्टीकरण की इस घिनौनी नीति ने आतंकियों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि वे चाहे जितने भी कत्लेआम मचा लें, यदि उनके सिर पर ‘दिल्ली दरबार’ के खास लोगों का हाथ हो, तो उनका बाल भी बांका नहीं हो सकता। यह निश्चित ही आजाद भारत के इतिहास का सबसे शर्मनाक अध्याय था।

राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिस मामले में अपराध इतना खुला और स्पष्ट था, पीड़ित परिवार सामने था, और हत्यारे सरेआम घूम रहे थे, वहां 36 साल तक जांच की एक इंच भी प्रगति क्यों नहीं हुई? आखिर क्यों तीन दशक से अधिक समय तक पुलिस की डायरियां बंद रहीं? क्यों गवाहों की जुबान पर सन्नाटा पसरा रहा?
इसका सीधा और कड़वा उत्तर उस दौर के राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकताओं में है। कश्मीर की तत्कालीन राज्य सरकारों और दिल्ली के नीति-निर्धारकों ने ‘शांति खरीदने’ के चक्कर में न्याय का खुला सौदा कर लिया था। उनके लिए आतंकियों के खिलाफ मुकदमों को आगे बढ़ाने का मतलब था घाटी में और ज्यादा अशांति मोल लेना और देश के एक बड़े वोट बैंक को नाराज कर देना। इसी राजनैतिक नपुंसकता के कारण सरला भट्ट जैसे दर्जनों जघन्य मामलों को ‘अनसुलझी’ फाइलों के ढेर में डालकर बंद कर दिया गया।
इसके अलावा, दूसरी सबसे बड़ी वजह थी घाटी में स्थापित खौफ का वह साम्राज्य, जहां कानून की नहीं बल्कि केवल बंदूक की चलती थी। 1990 के उस भयानक दौर में यदि कोई आम नागरिक या चश्मदीद अदालत में खड़े होकर इन आतंकवादियों के खिलाफ गवाही देने की हिम्मत करता, तो अगले ही सूर्योदय से पहले उसके पूरे कुनबे की लाशें सड़क पर बिछ जाती थीं। राज्य का प्रशासनिक और सुरक्षा ढांचा इस कदर सड़ चुका था कि वह अपने गवाहों को न्यूनतम सुरक्षा देने का भरोसा भी नहीं दिला सकता था। जब पुलिस और खुफिया तंत्र खुद डरे हुए हों, और देश की सर्वोच्च राजनैतिक सत्ता आतंकियों के साथ गलबहियाें में लगी हो, तो कोई भी आम इंसान अपनी और अपने बच्चों की जान को जोखिम में डालकर गवाही देने आगे क्यों आता? यही कारण था कि गवाहों की खामोशी और फाइलों का सन्नाटा ही घाटी का अंतिम सच बन गया था।
न्याय का सूर्योदय
लेकिन समय का चक्र हमेशा एक जैसा नहीं रहता। वर्तमान केंद्र सरकार ने आतंकवाद और उसके इस छद्म तंत्र के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए उस ठंडे बस्ते को पलट दिया, जिसे छूने की हिम्मत पिछले तीन दशक में किसी ने नहीं की थी। दशकों से धूल खा रही फाइलों को निकाला गया, गवाहों के पते ढूंढे गए और कड़ियों से कड़ियों को इस तरह जोड़ा गया कि आज न्याय का कानून अपना काम कर रहा है। दशकों के इस घने और हताशा भरे अंधेरे को चीरते हुए, जांच एजेंसी ने हाल ही में अदालत के समक्ष जो आरोपपत्र दाखिल किया है, वह कानून के राज की पुनर्स्थापना है। तीन दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद, जब भौतिक सबूत लगभग नष्ट हो चुके थे, घटनास्थल का भूगोल बदल चुका था और कई मुख्य किरदार इस दुनिया से जा चुके थे, इस मामले को दोबारा खड़ा करना कानून और इंसाफ की एक बहुत बड़ी जीत है।
जांच एजेंसी ने इस मामले को वैज्ञानिक, दस्तावेजी और ऐतिहासिक कड़ियों को जोड़कर बिल्कुल नए सिरे से जीवित किया है। जेकेएलएफ के पुराने आंतरिक रिकॉर्ड्स, उस दौर की खुफिया एजेंसियों की गोपनीय रिपोर्ट्स और थानों में धूल खा रही पुरानी पुलिस डायरियों के एक-एक शब्द को खंगाला गया। इसके साथ ही, अनुच्छेद 370 के हटने के बाद जब घाटी से आतंकवाद का वह पुराना संस्थागत खौफ कम हुआ, तब जांच एजेंसी उन चश्मदीदों और गवाहों तक फिर से पहुंचने में सफल रही जो 1990 में अपनी जान के डर से चुप हो गए थे। एक सुरक्षित माहौल और गवाही की गोपनीयता का पुख्ता भरोसा मिलने के बाद, कई गवाहों ने आखिरकार अदालत के सामने उस सच को उगल दिया जिसे वे 36 साल से सीने में दबाए बैठे थे। आरोपपत्र में केवल सरला भट्ट की हत्या का तकनीकी ब्योरा नहीं है, बल्कि इसमें उस पूरी संगठित कूटनीति, विदेशी मदद और पाकिस्तानी इशारों पर रची गई साजिश का कच्चा चिट्ठा है, जिसके तहत यासीन मलिक और उसके संगठन ने कश्मीरी हिंदुओं के व्यवस्थित नरसंहार और उनके महान विस्थापन का खूनी रास्ता तैयार किया था।
सरला भट्ट के मामले में दशकों बाद दाखिल यह आरोपपत्र केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के एक बहुत बड़े और गहरे पाप का राष्ट्रीय प्रायश्चित है। यह इस बात का साफ और बुलंद उद्घोष है कि भारत की राज्यसत्ता अब इतनी कमजोर, लाचार या अवसरवादी नहीं रही कि वह अपने ही निर्दोष नागरिकों के हत्यारों से ‘किस्तों में अमन’ खरीदने की नीति पर चले। सरला भट्ट को न्याय मिलना, दरअसल उस पूरी कश्मीर घाटी में न्याय के शासन और भारत के कानून के राज की स्थापना की वास्तविक वापसी की शुरुआत है।
















