बात निकली है तो...
September 20, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम विश्लेषण

बात निकली है तो…

उत्तराखंड के शिक्षा सुधार से लेकर सीमा सुरक्षा, विदेशी फंडिंग और ऑनलाइन कट्टरपंथ के खिलाफ कार्रवाई जैसे घटनाक्रम एक नई नीति-दिशा की ओर इशारा करते हैं। सवाल केवल मदरसों का नहीं, बल्कि शिक्षा, पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर बदलते दृष्टिकोण का है

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Jul 20, 2026, 01:25 pm IST
inविश्लेषण, उत्तराखंड, राजस्थान
राजस्थान में सीमा क्षेत्रों में अतिक्रमण के खिलाफ लगातार चलाया जा रहा अभियान

राजस्थान में सीमा क्षेत्रों में अतिक्रमण के खिलाफ लगातार चलाया जा रहा अभियान

कुछ भी अचानक नहीं होता। प्रत्येक बड़े निर्णय के पीछे परिस्थितियों, अनुभवों और समय की मांगों का लंबा सिलसिला काम करता है। जैसे बिना आग के धुआं नहीं उठता, वैसे ही उत्तराखंड सरकार का 1 जुलाई का निर्णय-मदरसा बोर्ड समाप्त करना, राज्य के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में मुख्यधारा की शिक्षा अनिवार्य करना और मदरसों में मजहबी शिक्षा को पूरी तरह स्वैच्छिक बनाना-किसी आकस्मिक राजनीतिक कदम का नतीजा नहीं है। यह उस व्यापक राष्ट्रीय चिंतन का हिस्सा है, जिसमें शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सबसे प्रभावी साधन माना जा रहा है।

यदि पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से देखा जाए तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश में मदरसों को लेकर विमर्श अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। सीमा सुरक्षा, घुसपैठ, विदेशी फंडिंग, न्यायालयों की टिप्पणियां, प्रशासनिक जवाबदेही, वित्तीय पारदर्शिता तथा संविधानसम्मत शिक्षा व्यवस्था जैसे अनेक विषय आज एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। यह प्रश्न भी लगातार उठ रहे हैं कि क्या देश में संचालित मजहबी शिक्षण संस्थान समान शैक्षिक मानकों, राष्ट्रीय मूल्यों और विधिक व्यवस्था के अनुरूप संचालित हो रहे हैं या नहीं।

शिक्षा सुधार की नई दिशा

उत्तराखंड सरकार का स्पष्ट मानना है कि देश के प्रत्येक बच्चे को ऐसी शिक्षा मिले, जो उसे आधुनिक ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रोजगार की क्षमता और राष्ट्रजीवन में सक्रिय भागीदारी के योग्य बनाए। इसी उद्देश्य से भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान तथा अन्य सामान्य विषयों की शिक्षा सभी शिक्षण संस्थानों में अनिवार्य की गई है। वहीं, मजहबी शिक्षा को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानते हुए स्वैच्छिक रखा गया है, इस पर रोक नहीं लगाई गई है। इस व्यवस्था का मूल भाव यह है कि राज्य का दायित्व किसी विशेष पंथ की शिक्षा देना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी को समान, गुणवत्तापूर्ण और राष्ट्रोपयोगी शिक्षा उपलब्ध कराना है।

वास्तव में यह निर्णय केवल एक बोर्ड के गठन या समाप्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में समानता, पारदर्शिता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व स्थापित करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका संदेश स्पष्ट है कि भारत में शिक्षा का आधार अलगाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता, संवैधानिक दायित्व और समान अवसर होना चाहिए। किसी भी शिक्षण संस्था का मूल्यांकन अब उसकी परंपरा या विशेष पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि इस कसौटी पर होगा कि वह देश के भावी नागरिकों को कितना सक्षम, जागरूक और राष्ट्रनिष्ठ बना रही है।

सीमा पर सुरक्षा सर्वोपरि

उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को समान और राष्ट्रीय दृष्टि से पुनर्गठित करने की पहल के कुछ ही दिनों बाद देश की पश्चिमी सीमा से भी एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने स्पष्ट संकेत दिया कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर सरकार और न्यायपालिका दोनों का दृष्टिकोण अधिक स्पष्ट और दृढ़ होता जा रहा है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने भारत-पाकिस्तान सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित अवैध मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्र की परिस्थितियां सामान्य नहीं होतीं। ऐसे क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सुरक्षा संबंधी मामलों में प्रशासन के निर्णयों में अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने केवल कार्रवाई को वैधता प्रदान करने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि जिला प्रशासन, पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश देकर यह भी स्पष्ट कर दिया कि सीमा क्षेत्र में स्थित प्रत्येक संवेदनशील निर्माण का मूल्यांकन केवल भूमि अभिलेखों या नगर नियोजन के मानकों से नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में किसी भी निर्माण का आकलन सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट, सामरिक आवश्यकताओं और राष्ट्रीय हित की कसौटी पर किया जाना अनिवार्य है।

उच्‍च न्‍यायालय का यह निर्णय केवल अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की बदलती अवधारणा का भी परिचायक है। वर्षों तक मजहबी पहचान के कारण जिन अवैध निर्माणों पर कार्रवाई से प्रशासनिक संकोच दिखाई देता था, अब उनके संबंध में कानून और सुरक्षा को प्राथमिक आधार बनाया जा रहा है। यदि कोई निर्माण अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित है, उसकी वैधानिक स्थिति संदिग्ध है अथवा सुरक्षा एजेंसियां उसे संवेदनशील मानती हैं, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई को केवल राजस्व या स्थानीय प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न माना जाएगा।

वस्तुतः यह घटनाक्रम उस व्यापक परिवर्तन की ओर संकेत करता है, जिसमें भारत की सीमाओं को केवल भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता की प्रथम सुरक्षा-रेखा के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में सीमा क्षेत्र में स्थित प्रत्येक अवैध निर्माण, चाहे उसकी प्रकृति या पहचान कुछ भी हो, अब कानून, सुरक्षा और राष्ट्रहित की कसौटी पर ही परखा जाएगा। यही नए भारत की बदलती प्रशासनिक और न्यायिक सोच का स्पष्ट संकेत है।

बाड़मेर में बॉर्डर के पास बने मदरसा परिसर की मस्जिद ध्वस्त की गई।

कसौटी पर मदरसा व्यवस्था

उधर, पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों से जुड़ा विवाद भी यह संकेत देता है कि अब मदरसा व्यवस्था को लेकर न्यायपालिका का दृष्टिकोण केवल परंपरा या प्रचलित व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 350 से अधिक कर्मियों की नियमितीकरण याचिकाएं खारिज करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 के अंतर्गत वर्ष 2020 से पूर्व की गई इन नियुक्तियों को अवैध माना गया था।

इस विवाद की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पहले पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 को असंवैधानिक घोषित करते हुए स्थानीय समितियों द्वारा की गई नियुक्तियों को निरस्त कर दिया था। बाद में वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की संवैधानिक वैधता तो बहाल कर दी, किंतु इसके बाद गठित समिति ने वर्ष 2015 से 2020 के बीच हुई नियुक्तियों की समीक्षा कर उन्हें वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं पाया। इन्हीं निष्कर्षों को चुनौती देने वाली 40 से अधिक याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।

यह निर्णय केवल कुछ सौ कर्मचारियों के सेवा विवाद तक सीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि सरकारी सहायता, वेतन, सेवा लाभ अथवा नियमित नियुक्ति का अधिकार केवल लंबे समय तक कार्य करने के आधार पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। प्रत्येक नियुक्ति को विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया, पारदर्शिता और वैधानिक प्रावधानों की कसौटी पर खरा उतरना ही होगा।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि मदरसों सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए अब समान संवैधानिक और प्रशासनिक मानदंड लागू होंगे। किसी भी संस्था को केवल उसकी धार्मिक या पारंपरिक पहचान के आधार पर नियमों से छूट नहीं दी जा सकती। नियुक्तियों से लेकर वित्तीय सहायता और प्रशासनिक निर्णयों तक, प्रत्येक प्रक्रिया का परीक्षण अब कानून, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर होगा। यह व्यवस्था भारत में समान शिक्षा तंत्र और समान प्रशासनिक उत्तरदायित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ नहीं है, बल्कि वह वैचारिक तंत्र भी है जो युवाओं के मन में भारत-विरोधी सोच विकसित करने का प्रयास करता है। यही कारण है कि आज जांच एजेंसियों का ध्यान केवल हथियारों और विस्फोटकों तक सीमित नहीं है; वे ऑनलाइन कट्टरपंथ, हवाला, विदेशी धन, संदिग्ध संस्थानों और संगठित वैचारिक नेटवर्क की भी समान गंभीरता से जांच कर रही हैं।

उत्तराखंड में शिक्षा सुधार, राजस्थान में सीमा क्षेत्र से जुड़े न्यायिक निर्णय, पश्चिम बंगाल में नियुक्तियों पर न्यायालय का रुख, उत्तर प्रदेश में विदेशी फंडिंग की जांच तथा एनआईए और एटीएस की लगातार कार्रवाई-इन सभी घटनाओं का साझा संदेश यही है कि भारत अब राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता को अलग-अलग विषय मानकर नहीं चल रहा। शासन की प्राथमिकता स्पष्ट है-जो भी संस्था या व्यक्ति संविधान, कानून और राष्ट्रहित की सीमाओं के भीतर कार्य करेगा, उसका स्वागत होगा; किंतु यदि किसी व्यवस्था का उपयोग कट्टरपंथ, अवैध वित्तपोषण, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों या युवाओं के वैचारिक दुरुपयोग के लिए किया जाता है, तो उसके विरुद्ध कानून का कठोरतम प्रयोग होगा।

यह केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की उस नई सोच का संकेत है जिसमें आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल बंदूक से नहीं, बल्कि शिक्षा, वैचारिक जागरूकता, वित्तीय पारदर्शिता और विधि के कठोर अनुपालन के माध्यम से भी लड़ी जा रही है। आने वाले समय में यह विमर्श और व्यापक होगा, क्योंकि भारत अब समस्या के लक्षणों पर नहीं, बल्कि उसकी जड़ों पर प्रहार करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

कुल मिलाकर पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में मदरसों का सर्वेक्षण, पंजीकरण और सत्यापन केवल प्रशासनिक अभ्यास नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, वैधानिकता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का एक व्यापक अभियान बनता दिखाई दे रहा है। अनेक राज्यों में जांच के दौरान ऐसे संस्थान सामने आए, जो बिना मान्यता संचालित हो रहे थे अथवा निर्धारित शैक्षिक मानकों और नियामकीय प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे थे। परिणामस्वरूप कहीं उन्हें निर्धारित मानकों के अनुरूप लाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, तो कहीं कानून के उल्लंघन पर प्रशासनिक कार्रवाई की गई। स्पष्ट है कि अब यह विषय केवल सर्वेक्षण तक सीमित नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

विदेशी फंडिंग पर शिकंजा

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश से सामने आया एक मामला इस पूरे विमर्श को शिक्षा और प्रशासन की सीमाओं से आगे बढ़ाकर वित्तीय पारदर्शिता तथा विदेशी फंडिंग के प्रश्न तक ले जाता है। मौलाना शमसुल हुदा खान के विरुद्ध एक हजार से अधिक पृष्ठों की चार्जशीट दाखिल करते हुए जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने ब्रिटिश नागरिकता छिपाकर मदरसे का संचालन किया तथा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त किया। मामले में बड़ी मात्रा में बैंक अभिलेख, वित्तीय दस्तावेज और अन्य साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं, जिनकी न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस प्रकरण में विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने, करोड़ों रुपये की संपत्तियां अर्जित करने, विदेशों से धन हस्तांतरण तथा धन के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों की जांच की जा रही है। यही कारण है कि यह मामला केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) जैसी केंद्रीय एजेंसियां भी इससे जुड़े वित्तीय तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं की समानांतर जांच कर रही हैं।

दरअसल, विदेशी फंडिंग का प्रश्न केवल आर्थिक अनियमितता का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय कानून स्पष्ट करता है कि विदेश से प्राप्त प्रत्येक धनराशि का स्रोत, उद्देश्य और उपयोग पूरी पारदर्शिता के साथ दर्ज होना चाहिए। यदि किसी संस्था द्वारा इस धन का उपयोग घोषित उद्देश्य से इतर किया जाता है अथवा वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन होता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान है। हाल के वर्षों में जांच एजेंसियों की सक्रियता यह संकेत देती है कि अब इस विषय में किसी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।

यही कारण है कि विदेशी फंडिंग की जांच अब केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं रह गई है। सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष ऐसे अनेक मामले आए हैं, जिनमें विदेशी धन, ऑनलाइन कट्टरपंथ, युवाओं के वैचारिक ब्रेनवॉश, आतंकी भर्ती और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के बीच कथित संबंधों की जांच की जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती अब केवल सीमा पार से आने वाले खतरे तक सीमित नहीं है, बल्कि वैचारिक, डिजिटल और वित्तीय माध्यमों से संचालित संगठित नेटवर्क भी सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी के केंद्र में आ चुके हैं। हाल के कुछ प्रमुख मामलों पर दृष्टि डालें तो यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है।

जैसलमेर में ऑपरेशन क्लीन स्वीप के तहत अतिक्रमण पर हुई कार्रवाई।

कट्टरपंथ पर प्रहार

हाल के वर्षों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), विभिन्न राज्यों की आतंकवाद निरोधी इकाइयों (एटीएस) तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारत के समक्ष चुनौती केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसियों के समक्ष ऐसे अनेक मामले आए हैं, जिनमें मजहबी शिक्षा की आड़ लेकर युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर प्रेरित करने, उन्हें राष्ट्रविरोधी मानसिकता के लिए तैयार करने अथवा आतंकी संगठनों के लिए वैचारिक आधार निर्मित करने के आरोप सामने आए हैं। साथ ही, सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और बंद डिजिटल समूहों के माध्यम से युवाओं का वैचारिक ब्रेनवॉश कर उन्हें हिंसक जिहादी संगठनों से जोड़ने के प्रयास भी सुरक्षा एजेंसियों की जांच में उजागर हुए हैं। यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद का स्वरूप अब केवल हथियारों तक सीमित नहीं, बल्कि वैचारिक, डिजिटल और मनोवैज्ञानिक आयाम भी ग्रहण कर चुका है।

इसी संदर्भ में गत 8 जुलाई को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने देशव्यापी अभियान चलाते हुए ऑनलाइन कट्टरपंथ और आतंकी गतिविधियों से जुड़े एक बड़े नेटवर्क के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई की। दिल्ली सहित 10 राज्यों के 20 स्थानों पर एक साथ की गई छापेमारी में मोबाइल फोन, लैपटॉप, डिजिटल उपकरण तथा अनेक आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद किए गए, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। विजयवाड़ा में दर्ज इस मामले की जांच मई में एनआईए ने अपने हाथ में ली थी। अब तक इस प्रकरण में 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि एक नाबालिग को हिरासत में लिया गया है। जांच के दौरान राजस्थान के जोधपुर निवासी 19 वर्षीय जीशान की गिरफ्तारी भी हुई, जिस पर सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा की ओर प्रेरित करने और उन्हें संगठित नेटवर्क से जोड़ने के आरोप हैं। यह कार्रवाई बताती है कि सुरक्षा एजेंसियां अब डिजिटल मंचों पर संचालित वैचारिक युद्ध को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही हैं, जितनी किसी प्रत्यक्ष आतंकी गतिविधि को।

इसी क्रम में गत माह जून में मध्य प्रदेश एटीएस ने एक अंतरराज्यीय कट्टरपंथी नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए बिहार के एक मदरसा संचालक सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह नेटवर्क पाकिस्तान में बैठे संचालकों के संपर्क में था और एन्क्रिप्टेड ऑनलाइन समूहों के माध्यम से युवाओं तक कट्टरपंथी सामग्री पहुंचाई जा रही थी। आरोपियों में कुछ ऐसे लोग भी शामिल बताए गए, जिन्होंने देवबंद के एक मदरसे में साथ अध्ययन किया था। यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि जब किसी शैक्षणिक या धार्मिक संस्था का उपयोग शिक्षा और संस्कार के बजाय कट्टरपंथी विचारों के प्रसार अथवा राष्ट्रविरोधी नेटवर्क के लिए किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तब वह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर प्रश्न बन जाता है। यही कारण है कि अब जांच एजेंसियां केवल अपराधियों तक सीमित न रहकर उन वैचारिक और संगठित तंत्रों की भी पड़ताल कर रही हैं, जिनका उपयोग युवाओं के कट्टरपंथीकरण के लिए किए जाने के आरोप लगते रहे हैं।

इसी वर्ष मार्च में मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने अंतरराष्ट्रीय आतंक वित्तपोषण और कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में एक प्रमुख आरोपी को गिरफ्तार किया। जांच के दौरान तुर्किये और जर्मनी से धन आने, हवाला नेटवर्क के माध्यम से धनराशि हस्तांतरण तथा मजहबी संस्थाओं की आड़ में उसके कथित उपयोग के पहलुओं की जांच की गई। यह प्रकरण इस बात का संकेत है कि अब सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद के केवल प्रत्यक्ष स्वरूप पर नहीं, बल्कि उसके आर्थिक तंत्र और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर भी समान रूप से नजर रख रही हैं।

मौलाना के कारनामे

  •  मौलाना शम्सुल हुदा खान ने 2013 में ब्रिटेन की नागरिकता लेने के बाद भी उसने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मतदान किया।
  • भारतीय नागरिकता छोड़ने के बावजूद सरकारी वेतन और 2023 तक पेंशन ली;
  • ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की, जिसका आधार यूपी पुलिस की धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश से जुड़ी एफआईआर हैं।
  •  विदेशी धन के लेनदेन और संपत्ति अर्जित करने में धनशोधन पहलुओं की जांच के बाद अदालत में 1,000 से अधिक पृष्ठों की चार्जशीट दाखिल की गई।
  • चार्जशीट के साथ बड़ी संख्या में बैंक रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन के दस्तावेज और अन्य साक्ष्य अदालत में पेश किए गए हैं।
  • एनजीओ के माध्यम से धन के कथित दुरुपयोग, मदरसों के निर्माण और अचल संपत्तियां खरीदने
    के आरोप।

इससे पहले जनवरी 2024 में उत्तर प्रदेश एटीएस ने पश्चिम बंगाल के एक मदरसे में छापेमारी कर कंप्यूटर, सिम कार्ड तथा अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए थे। यह कार्रवाई अबू सालेह नामक आरोपी की गिरफ्तारी के बाद की गई, जिस पर विदेशी फंडिंग, मानव तस्करी और आतंक वित्तपोषण से जुड़े नेटवर्क से संबंध होने के आरोप हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, छापेमारी के दौरान ऐसे दस्तावेज भी बरामद हुए, जिनमें कथित रूप से अवैध घुसपैठ से संबंधित विवरण दर्ज थे। इस प्रकरण ने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि यदि किसी मजहबी या शैक्षणिक संस्था का उपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों अथवा अवैध नेटवर्क के लिए किए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो उसकी निष्पक्ष और कठोर जांच राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बन जाती है।

इसी प्रकार, दिसंबर 2023 में एनआईए ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में आईएसआईएस मॉड्यूल के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाकर 15 लाोगों को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी के अनुसार, ये लोग विदेशी आकाओं के निर्देश पर कट्टरपंथी प्रचार, युवाओं की भर्ती, आईईडी निर्माण की तैयारी तथा आतंकी गतिविधियों के लिए संगठित नेटवर्क विकसित करने में संलिप्त थे। यह कार्रवाई इस तथ्य को रेखांकित करती है कि वैश्विक जिहादी नेटवर्क अब डिजिटल माध्यमों, वित्तीय चैनलों और स्थानीय मॉड्यूलों के सहारे अपनी पैठ बनाने का निरंतर प्रयास करते रहे हैं, जिनका समय रहते पर्दाफाश करना राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।

बदलती सुरक्षा नीति का संकेत

इन सभी घटनाओं का समग्र विश्लेषण बताता है कि भारत के समक्ष चुनौती अब केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवाद की नहीं रह गई है। सुरक्षा एजेंसियों की जांच का दायरा अब ऑनलाइन कट्टरपंथ, विदेशी संपर्क, हवाला नेटवर्क, संदिग्ध विदेशी फंडिंग, वैचारिक ब्रेनवॉश और युवाओं को संगठित कट्टरपंथी नेटवर्क से जोड़ने वाले तंत्र तक विस्तृत हो चुका है। स्पष्ट है कि आतंकवाद के विरुद्ध आज की लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक, आर्थिक और डिजिटल आधारों को ध्वस्त करने की भी लड़ाई है। इसी कारण नए भारत की सुरक्षा नीति अब आतंकवाद की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित न रहकर उसकी पूरी पारिस्थितिकी—विचार, वित्त, तकनीक और संगठन—पर एक साथ प्रहार करती दिखाई देती है।

इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने पर भले ही वे शिक्षा सुधार, सीमा सुरक्षा, सेवा विवाद अथवा आर्थिक अपराध जैसे पृथक विषय प्रतीत होते हैं। किंतु जब इन सभी को एक साथ रखकर देखने पर एक स्पष्ट प्रवृत्ति उभरकर सामने आती है। भारत अब उन समानांतर तंत्रों की व्यापक समीक्षा कर रहा है, जिनका उपयोग वर्षों से शिक्षा, मजहबी संस्थाओं, विदेशी फंडिंग, कट्टरपंथी नेटवर्क, और डिजिटल माध्यमों के जरिए कट्टरपंथी विचारधारा के प्रसार के लिए किए जाने के आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ नहीं है, बल्कि वह वैचारिक तंत्र भी है जो युवाओं के मन में भारत-विरोधी सोच विकसित करने का प्रयास करता है। यही कारण है कि आज जांच एजेंसियों का ध्यान केवल हथियारों और विस्फोटकों तक सीमित नहीं है; वे ऑनलाइन कट्टरपंथ, हवाला, विदेशी धन, संदिग्ध संस्थानों और संगठित वैचारिक नेटवर्क की भी समान गंभीरता से जांच कर रही हैं।

उत्तराखंड में शिक्षा सुधार, राजस्थान में सीमा क्षेत्र से जुड़े न्यायिक निर्णय, पश्चिम बंगाल में नियुक्तियों पर न्यायालय का रुख, उत्तर प्रदेश में विदेशी फंडिंग की जांच तथा एनआईए और एटीएस की लगातार कार्रवाई—इन सभी घटनाओं का साझा संदेश यही है कि भारत अब राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता को अलग-अलग विषय मानकर नहीं चल रहा। शासन की प्राथमिकता स्पष्ट है—जो भी संस्था या व्यक्ति संविधान, कानून और राष्ट्रहित की सीमाओं के भीतर कार्य करेगा, उसका स्वागत होगा; किंतु यदि किसी व्यवस्था का उपयोग कट्टरपंथ, अवैध वित्तपोषण, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों या युवाओं के वैचारिक दुरुपयोग के लिए किया जाता है, तो उसके विरुद्ध कानून का कठोरतम प्रयोग होगा।

अत: यह केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की उस नई सोच का संकेत है जिसमें आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल बंदूक से नहीं, बल्कि शिक्षा, वैचारिक जागरूकता, वित्तीय पारदर्शिता और विधि के कठोर अनुपालन के माध्यम से भी लड़ी जा रही है। आने वाले समय में यह विमर्श और व्यापक होगा, क्योंकि भारत अब समस्या के लक्षणों पर नहीं, बल्कि उसकी जड़ों पर प्रहार करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

Topics: मदरसा सेवा आयोगआंतरिक सुरक्षामजहबी शिक्षाविदेशी फंडिंगपाञ्चजन्य विशेषउत्तराखंड मदरसा बोर्डATSशिक्षा सुधारभारत पाकिस्तान सीमाहवाला नेटवर्कअवैध निर्माणआतंकवाद विरोधीसीमा सुरक्षा बलअल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान मान्यताआतंकी नेटवर्कसमान शिक्षा नीतिराष्ट्रीय सुरक्षा
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

‘भारत बन रहा आर्थिक सेतु’

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को तमिल संत और दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा रचित प्राचीन ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ का रूसी अनुवाद भेंट करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : बदलती वैश्विक भूमिका

दिल्ली विश्वविद्यालय में लहराया एबीवीपी का परचम

DUSU चुनाव रिजल्ट : दुनिया ने फिर देखा दम, DUSU में फिर गूंजा ABVP का परचम! छात्रों ने लहराया भगवा

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : दिखी कूटनीतिक कुशलता

सम्मेलन में भारतीय कलाकारों द्वारा दी गई सांस्कृतिक प्रस्तुति

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : बढ़ा भारत का कद

अवैध घुसपैठियों पर कसता शिकंजा

जम्मू में जनसंख्या असंतुलन – घुसपैठियों के नेक्सस पर प्रहार, जानें कैसे काम करता है पूरा गिरोह

Load More

ताज़ा समाचार

‘भारत बन रहा आर्थिक सेतु’

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को तमिल संत और दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा रचित प्राचीन ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ का रूसी अनुवाद भेंट करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : बदलती वैश्विक भूमिका

आज का श्लोक : वाचा मित्रत्वमायाति वाचैवायाति शत्रुताम्

आज का राशिफल

20 सितंबर राशिफल: मेष से मीन तक जानें आज किस राशि की चमकेगी किस्मत

NEET UG Fake Certificate CM Pushkar Singh Dhami Uttarakhand Medical Admission Panchjanya

NEET UG में फर्जीवाड़े पर CM धामी सख्त: 8 अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र निरस्त, होगी कड़ी कानूनी कार्रवाई!

Nandigram Bypoll Milan Pradhan Arrest Mamata Banerjee Congress TMC Politics Panchjanya

Nandigram Bypoll Analysis: जानिए मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस-ममता समीकरण और सियासी दावों की पूरी कहानी

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद पर जीत हासिल की।

DUSU चुनाव में एबीवीपी ने लहराया भगवा, बोली – भारत का Gen-Z संस्कारवान, राष्ट्रवादी और समरसता में विश्वास रखने वाला

mathura rss paryavaran sanrakshan gatividhi kund pujan water conservation

राधाष्टमी पर RSS स्वयंसेवकों की सराहनीय पहल: मथुरा में जलाशयों और कुंडों हुआ पूजन, लोगों ने ली अनोखी शपथ

narendra modi satta darshan seva sankalp parivartankari netritva

नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष : ‘सेवा’ से परिवर्तनकारी नेतृत्व तक की राजनीतिक यात्रा

IIT BHU University of Michigan MoU EV Research Prof Amit Patra Panchjanya

IIT रुड़की दीक्षांत समारोह 2026: 1,277 स्नातक विद्यार्थियों को मिली डिग्री, अजीत डोभाल रहे मुख्य अतिथि

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies