बांग्लादेश के रंगपुर में रह रहे हिंदू परिवारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भारत में बसे एक शरणार्थी परिवार का दर्द इन दिनों हर किसी को झकझोर रहा है। परिवार के सदस्य प्रिय रंजन का कहना है कि उनके दादा जी वर्षों पहले बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से भारत आ गए थे, लेकिन आज भी उनके कई परिजन रंगपुर में रह रहे हैं।
प्रिय रंजन बताते हैं कि बांग्लादेश में हालात बिगड़ने के बाद वे लगातार अपने परिजनों से फोन पर संपर्क में थे। करीब सात दिन पहले तक बातचीत होती रही, लेकिन अब अचानक संपर्क पूरी तरह टूट गया है। इससे परिवार की चिंता और बेचैनी कई गुना बढ़ गई है।
उन्होंने कहा, “मन बहुत घबराया हुआ है। समझ नहीं आ रहा कि हमारे परिजन सुरक्षित हैं या नहीं। कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई।”
परिजनों से हुई आखिरी बातचीत का जिक्र करते हुए प्रिय रंजन ने बताया कि वहां का माहौल बेहद भयावह था। परिजन डरे-सहमे हुए थे। उनका कहना था कि कभी भी कोई भी घर में घुस जाता है, महिलाओं और लड़कियों के साथ जबरदस्ती की जा रही है, और यदि कोई हिंदू मिल जाए तो उसे लाठी-डंडों से पीटा जाता है।
डर के साए में जी रहे हिंदू परिवार घर से बाहर निकलने से पहले आसपास की स्थिति की जानकारी लेते हैं। अगर निकलना भी पड़े तो 10–15 लोगों के झुंड में, वह भी जल्द से जल्द बाजार का काम निपटाकर लौट आते हैं। रात होने से पहले ही सभी अपने घरों में बंद हो जाते हैं।
प्रिय रंजन के अनुसार, परिजनों ने फोन पर यह भी बताया था कि हिंदुओं पर जबरन धार्मिक पहचान थोपने की कोशिश की जा रही है। मर्दों को लुंगी और टोपी पहनने को मजबूर किया जा रहा है, जबकि महिलाओं को बुर्का पहनने का दबाव डाला जा रहा है। विरोध करने पर जान से मारने की धमकी तक दी जा रही है।
उन्होंने कहा, “अब एक सप्ताह से कोई खबर नहीं मिल रही है। हमें डर सता रहा है कि हमारे परिजन जिंदा हैं या मार दिए गए।”
उल्लेखनीय है कि प्रिय रंजन और उनके जैसे कई परिवार स्वयं कभी शरणार्थी रहे हैं। वे बताते हैं कि उनका परिवार 1965 के आसपास बांग्लादेश से भारत आया था। पहले त्रिपुरा में कुछ समय बिताया, फिर 1966 में सहरसा पहुंचे और बाद में पूर्णिया के मरंगा क्षेत्र में पुनर्वास कराया गया।
1969 में इंदिरा गांधी सरकार की पुनर्वास नीति के तहत नेपालगढ़ कॉलोनी में कुल 67 शरणार्थी परिवारों को बसाया गया, जहां प्रत्येक परिवार को घर और जमीन दी गई। आज ये सभी परिवार भारतीय नागरिक हैं।
अब वही परिवार भारत सरकार से भावुक अपील कर रहा है। प्रिय रंजन ने कहा,
“हम भारत सरकार से हाथ जोड़कर मांग करते हैं कि हमारे परिवार और बांग्लादेश में फंसे हिंदुओं की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। अगर संभव हो तो उन्हें सुरक्षित रूप से भारत लाया जाए।”
बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति को लेकर उठती यह पीड़ा न सिर्फ एक परिवार की चिंता है, बल्कि मानवता और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल भी है, जिस पर अब सरकार और समाज दोनों का ध्यान जाना जरूरी हो गया है।
















