'हर सनातनी करे बांग्लादेशी हिंदुओं की सहायता' 
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‘हर सनातनी करे बांग्लादेशी हिंदुओं की सहायता’ 

व्याख्यानमाला का अंतिम सत्र प्रश्नोत्तर का रहा। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने जो प्रश्न किए, उनके उत्तर  में सरसंघचालक भागवत ने  जो  कहा, उसे यहां बिन्दुवार  प्रस्तुत किया जा रहा है - 

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 29, 2025, 01:40 pm IST
inविश्व, संघ को जानें, विश्लेषण, संघ @100

मित्र भाव और अपने आचरण के माध्यम से ही हम किसी दूसरे व्यक्ति के विचार में परिवर्तन कर सकते हैं। युवा सहित सर्वत्र समाज में परिवर्तन के लिए संघ के स्वयंसेवक इसी पद्धति  पर चलते हैं।

  •  संघ केवल शाखा चलाता है और कुछ नहीं करता। संघ के स्वयंसेवक सब कुछ करते हैं।
  • हिंदुत्व एक मूल्य व्यवस्था है और सेकुलरिज्म एक राज्य व्यवस्था है। भारत के संदर्भ में  सेकुलरिज्म एक अप्रासंगिक शब्द है।
  • धर्म और रिलीजन पर्यायवाची शब्द नहीं हैं।
  • कोई मंदिर नहीं जाता तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अधार्मिक है। कर्म कांड और पूजा पाठ ही धर्म नहीं है। पर कर्म कांड और पूजा पाठ अकारण भी नहीं हैं।
  •  सेकुलरिज्म यानी पंथनिरपेक्ष होना है, धर्मनिरपेक्ष  नहीं  होना।
  • धर्म के चार पैर हैं : सत्य, करुणा, शुचिता और तपस। भारत इन पर सतत चलता रहा है,  इसलिए उन्नत हो रहा है।
  •  स्वच्छता का विषय स्वयं से शुरू करना होगा। अपने घर और  घर के सामने के रास्ते को साफ रखना, इतना भी किया तो परिवर्तन दिखने लगेगा। सार्वजनिक स्थान पर कचरा नहीं फेंकना, यह स्वयं से शुरू करना चाहिए और अपने मित्रों से उसका आग्रह करना चाहिए। इससे स्वच्छता का वातावरण बनेगा।
  •  संस्कृत के प्रचार-प्रसार हेतु संस्कृत भारती नामक संगठन कार्य कर रहा है। संस्कृत संभाषण की कार्यशाला भी वे चलाते हैं, जिसमें संस्कृत बोलने का अभ्यास कराया जाता है। संस्कृत बोलने वालों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कर्नाटक का मुत्तूर गांव पूरी तरह संस्कृत में बोलने वाला गांव बना है। संस्कृत के प्रति आग्रह बना रहना चाहिए।
  •  ज्ञान सब प्रकार का होना चाहिए, लेकिन इसके साथ विवेक भी चाहिए।
  • परंपरागत मूल्यों का संवर्धन दकियानूसी नहीं है।
  • अपना युवा कृतित्व संपन्न है। हमारे युवाओं को राष्ट्रभक्ति और संस्कृति-भक्ति मिल गई तो वे आधुनिक तकनीक के साथ संपूर्ण दुनिया का कल्याण करेंगे।
  •  आम चिकित्सा सुविधा  गांव और जिला स्तर पर उपलब्ध हो।
  •  रूस, यूक्रेन और इस्राएल में जो हो रहा है, उससे एक बात तो स्पष्ट है-जिसकी लाठी उसकी भैंस। ये दुनिया को शांति समझाते फिरते हैं और अब ये युद्ध कर रहे हैं।
  • सब प्रकार की संप्रभुता प्राप्त करनी चाहिए। हमें (भारत को) सुरक्षा परिषद में सीट दो-यह कहने की आवश्यकता नहीं है; उन्हें यह कहना चाहिए कि भारत को सीट देनी चाहिए।
  •  हमारे पड़ोसी देश एक तरह से हमारे ही हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि व्यक्ति से व्यक्ति का संबंध बने। इसके लिए सरकार को सुविधाएं भी प्रदान करनी चाहिए। इन्हें जोड़ना ही है-ऐसी दृष्टि चाहिए। अभी की विदेश नीति में सुधार की नहीं, सजगता और गति की आवश्यकता है।
  •  बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों को एकत्रित रहना पड़ेगा। दुनियाभर के हिंदुओं को अपनी मर्यादा में रहकर उनकी सहायता करनी होगी। हम भी कर रहे हैं।
  •  मदरसों में राष्ट्रीय और आधुनिक शिक्षा भी मिलनी चाहिए।
  •  संघ का काम कोई भी आकर देख सकता है। वहां आपको दिखे कि संघ मुस्लिम-विरोधी है, तो ठीक; और अगर ऐसा नहीं है, तो अपनी धारणा बदलिए। मैं तो यही कहूंगा कि अब यह समझाने की बात नहीं है, आकर देखिए। कई लोग देखने के लिए आए हैं और देखकर उन्होंने मान लिया है कि संघ मुस्लिम-विरोधी नहीं है।
  •  जहां तक अयोध्या में राम मंदिर का प्रश्न है, न्यायालय के निर्णय के बाद वहां मंदिर का निर्माण हुआ। अब ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर कोई निर्माण करना झगड़ा बनाए रखने का एक राजनीतिक षड्यंत्र है।
  •  मुसलमानों को समझना होगा और कहना होगा कि वे पंथ/मजहब या पूजा-पद्धति के आधार पर भिन्न हैं, पर पूर्वज और संस्कृति के आधार पर बड़े विचार के ही अंग हैं।
  •  जिन जातियों ने अब तक अपना धर्म नहीं बदला और अब बदल रही हैं तो इसके लिए दोषी हमारा समाज ही है। हमें उनके बीच जाकर काम करना चाहिए, उनकी उपेक्षा न करें। उनके सुख-दुःख में शामिल हों। जब हम उनके साथ समरस होंगे तो जो कन्वर्जन कर रहे हैं वे नहीं करेंगे और जो कर चुके हैं वे वापस आ आएंगे।
  •  संविधान की प्रस्तावना संक्षेप में हिंदुत्व को ही बताती है। इसमें सीधे तौर पर ‘हिंदू’ शब्द नहीं है, लेकिन सभी उपासनाओं को स्वतंत्रता, न्याय और स्वातंत्र्य है। डॉ. आंबेडकर ने कहा कि यह सब मैंने विदेश से नहीं लिया, यह तथागत बुद्ध से लिया है। बंधुभाव ही धर्म है, यह उन्होंने अपने भाषण में कहा। धर्म पर आधारित संविधान, यह हिंदू राष्ट्र की विशेषता है। यद्यपि ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया, लेकिन संविधान सभा में स्वभाव से सभी लोग वही थे। सूरज पूरब में उगता है, अब इसके लिए भी संविधान की मंजूरी चाहिए ! हिन्दुस्थान हिंदू राष्ट्र है। यह सत्य है।
  • पहले भी हमारे यहां जातियां थीं, पर भेदभाव नहीं था। देश, काल, परिस्थिति के कारण यह जातिभेद आया, उसके जाने का समय आ गया है। हमारी एक राष्ट्रीय पहचान पहले से है, वह हिंदू है, वही भारतीय है।
  •  संघ मनुस्मृति लेकर नहीं चलता। हमारा अपना एक संविधान है। हम महिला-विरोधी नहीं हैं। हम पूरे समाज का संगठन करते हैं। हमने अपनी पद्धति से महिलाओं को कई कार्यों में जोड़ा है। उनके लिए व्यक्ति निर्माण का कार्य राष्ट्र सेविका समिति करती है।
  •  हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमी एक ही है कि वह जिस तरह से जुड़ा होना चाहिए, वैसा नहीं है। जबकि हिंदू समाज के पास बुद्धि, ज्ञान, पराक्रम आदि सब कुछ है।
  • मणिपुर के प्रवास के दौरान मैंने सभी मत-पंथों और गुटों के साथ तथा युवाओं से भी बातचीत की। वहां के हालात सुधर रहे हैं। कुछ समय लगेगा, लेकिन मन का भाव भी बदलेगा। इसके लिए निरंतर संवाद करते रहना होगा। समूचे पूर्वोत्तर के राज्यों में रहने वालों की जड़ें भारत से ही जुड़ी हैं।
  •  बढ़ती जनसंख्या बोझ नहीं है, बल्कि दूरगामी दृष्टि से जनसंख्या को व्यवस्थित करने का विचार कर एक नीति बनानी चाहिए।
  •  चिकित्सकों और जनसंख्या के संतुलन आदि के आधार पर कहा जा सकता है कि 19 से 25 वर्ष के बीच विवाह और सही समय पर तीन बच्चे होना एक दंपत्ति के लिए स्वास्थ्यकर होता है।
  • देश के क्रांतिकारियों और महापुरुषों को सम्मान दिलाने के लिए समाज के किसी भी वर्ग से कोई भी प्रयास होगा तो संघ का उसे सहयोग और समर्थन रहेगा। ऐसे हजारों महापुरुष हुए हैं, जिन्हें योग्य नाम और पहचान, सम्मान नहीं मिला है।
  • सब प्रकार की सुविधा और संसाधन होने के बावजूद कुछ लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार अभाव के कारण नहीं, बल्कि व्यक्ति के नैतिक पतन के चलते होता है।
  • भाजपा नेतृत्व से हम सदैव दूर ही रहते आए हैं, जनसंघ के जमाने से ही ऐसा रहा है। संघ के स्वयंसेवकों से हमारा हमेशा जुड़ाव रहता है। नरेन्द्र भाई, अमित भाई संघ के स्वयंसेवक हैं और उनके साथ हमारे निकट संबंध हैं। कुछ दिनों पहले अंदमान में था अमित भाई मेरे निकट बैठे थे। इसमें दूरियां और नजदीकियां जैसा कुछ नहीं है।
  • संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करने के लिए ही संघ और उसके स्वयंसेवक निरंतर कार्य कर रहे हैं। हम इसके लिए ही कार्य करते रहेंगे। यह जब तक नहीं होगा तब तक करते रहेंगे। इसी जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त करें, इस विश्वास को लेकर काम करते हैं। नहीं हुआ तो अगला जन्म लेकर भी यही काम करेंगे। हमारी सोच बहुत साफ है कि हम संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करने निकले हैं, समाज के भीतर एक अलग समाज बनाने के लिए नहीं।
  •  हम अपने गौरवशाली इतिहास को भूल चुके हैं। अपने पूर्वजों के द्वारा स्थापित गौरव को जानें।
  • दुनिया को धर्म देने का काम भारत को करना है।
  •  संघ को सत्ता नहीं चाहिए और न ही किसी से प्रतिस्पर्धा ही करनी है। संघ का एक ही लक्ष्य है- तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें।

‘सबके कल्याण की कामना करता है हिंदू’

Topics: हिंदू राष्ट्रपंथनिरपेक्षता बनाम धर्मनिरपेक्षता)न्यायसंविधान: बंधुभावशाखाडॉ. आंबेडकर के विचारपाञ्चजन्य विशेषसत्यसमाज संगठनस्वयंसेवकसांस्कृतिक राष्ट्रवादधर्मस्वतंत्रतासंघ RSS‘व्यक्ति निर्माण’हिंदुत्व: मूल्य व्यवस्थासमरसताशुचिता
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