‘सबके कल्याण की कामना करता है हिंदू’
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‘सबके कल्याण की कामना करता है हिंदू’

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 28, 2025, 10:29 pm IST
inभारत, पंच परिवर्तन, विश्लेषण, संघ @100
कोलकाता में शताब्दी व्याख्यान देते श्री मोहनराव भागवत

कोलकाता में शताब्दी व्याख्यान देते श्री मोहनराव भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर 21 दिसंबर को सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का कोलकाता में विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। इसका विषय था-‘100 वर्ष की यात्रा : नए क्षितिज।’ यह व्याख्यानमाला की तीसरी कड़ी थी। पहली कड़ी 26-28 अगस्त तक नई दिल्ली में और दूसरी कड़ी 8 और 9 नवंबर को बेंगलूरु में आयोजित हुई थी। चौथी कड़ी फरवरी, 2026 में मुंबई में होगी। कोलकाता व्याख्यान में समाज के हर वर्ग के विशिष्ट लोगों के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे। श्री भागवत ने तीन सत्र में व्याख्यानमाला को संबोधित किया। अंतिम सत्र प्रश्नोत्तर का था। यहां प्रस्तुत हैं श्री भागवत के व्याख्यान के संपादित अंश-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक या पथसंचलन करते हैं, यदि उनकी तुलना ‘पैरामिलिट्री’ से करें तो गलत होगा। संघ के स्वयंसेवक देश-दुनिया में सेवा के कार्य करते हैं। इसलिए संघ को केवल ‘सर्विस ऑर्गेनाइजेशन’ कहना उचित नहीं होगा। संघ के अनेक कार्यकर्ता राजनीतिक दलों में भी कार्य करते हैं, इससे यह अर्थ लगाना कि संघ कोई राजनीतिक संगठन है, गलत होगा। संघ का कोई शत्रु नहीं, पर संघ के बढ़ने से जिनके स्वार्थ की दुकान बंद हो सकती है, वे विरोध करते हैं, झूठ फैलाते हैं। हमारा प्रयास है कि संघ के बारे में जो लोगों की राय बने वह वस्तुस्थिति के आधार पर बने, किसी तीसरे स्रोत से फैलाए गए गलत विमर्श के आधार पर नहीं। संघ की स्थापना विश्व भर में भारत की जय-जयकार हो, इसलिए हुई है। विश्वगुरु बनने वाले भारत का समाज उस अनुरूप खड़ा हो, इसलिए हुई है।

संघ किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं चला, किसी प्रतिक्रिया में शुरू नहीं हुआ। संघ विशुद्ध रूप से हिंदू समाज के संगठन हेतु शुरू हुआ है। हमारे देश में कुशल योद्धा, शासक, बुद्धिमान होते हुए भी मुट्ठी भर अंग्रेजों ने हम पर शासन कैसे कर लिया, यह सोचने का विषय था। 1857 की क्रांति की असफलता से यह सवाल खड़ा हुआ। अन्तर्निहित एकता की बात हमारी संस्कृति में चलती आई है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के जीवन में देश के काम के अलावा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं था। डॉ. हेडगेवार के माता-पिता का एक ही दिन एक घंटे के अंतराल पर निधन हो गया था। तब डॉक्टर जी की आयु मात्र 11 वर्ष थी। उनके माता-पिता प्लेग के रोगियों की सेवा करते थे और उसी की चपेट में आ गए। उनके निधन के बाद डॉ. हेडगेवार ने अत्यंत निर्धनता में जीवन बिताया। पर वे मेधावी थे और कक्षा में सबसे आगे रहते थे। स्वप्न में भी वन्देमातरम् को गलत कहने का विचार डॉ. हेडगेवार नहीं कर सकते थे। डॉ. हेडगेवार को कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में इसलिए नहीं भेजा गया, क्योंकि वे डॉक्टर बनें। उनका काम अनुशीलन समिति से संपर्क कर पश्चिम भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का श्रीगणेश करना था।

डॉ. हेडगेवार ने देश के लिए नौकरी नहीं की, विवाह नहीं किया और असहयोग आंदोलनों में गांव-गांव गए, तो उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला। डॉ. हेडगेवार ने कभी अंग्रेजों की सरकार को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने न्यायाधीश के आगे कहा था कि स्वतंत्र होना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। डॉ. हेडगेवार की स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं और क्रांतिकारियों से चर्चा होती रहती थी। अंग्रेज हमें गुलाम बनाने वाले पहले नहीं थे। उससे पहले इस्लाम आया, उससे पहले शक थे, उससे पहले कुषाण थे, उससे पहले सिकंदर और हूण थे। स्वार्थ और भेदरहित तथा अनुशासन के आधार पर समाज बने, तो एक गुणवत्ता आएगी।
दस साल के चिंतन के बाद 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की।

संघ का उद्देश्य

संघ का उद्देश्य किसी को नष्ट करना नहीं है। संघ का जन्म डॉ. हेडगेवार के मन की व्यथा और देश की दुर्दशा के आधार पर हुआ। इसलिए संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करना उनका उद्देश्य था। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से देशव्यापी कार्यकर्ताओं का संगठन खड़ाकर समाज जीवन में परिवर्तन करना संघ की कार्यपद्धति है। संघ का लक्ष्य संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन है, किसी का विरोध करना नहीं है। इस देश के लिए उत्तरदायी समाज हिंदू समाज है। अंग्रेजों के आने के बाद हम एक राष्ट्र बने, यह गलत अवधारणा है। भारत सनातन काल से है।

दुनिया में भारत के ही लोग सभी विविधताओं को स्वीकार करते हैं, सम्मान करते हैं। ये इस देश की विशेषता है। हिंदू किसी एक
पूजा-पद्धित, एक खानपान का नाम नहीं है। हिंदू कोई धर्म, मजहब भी नहीं है। हिंदू एक स्वभाव का नाम है। भारत का कोई भी व्यक्ति जो इस स्वभाव को मानता है, वह हिंदू है। देश के कारण हम ऐसे बने, इसलिए यह हिंदू का देश है। हिंदू सर्वसमावेशक और सबका कल्याण मानने वाले होते हैं। हिंदू नाम नहीं विशेषण है। उनकी पूजा या भाषा देशी हो अथवा विदेशी, लेकिन जो इस संस्कृति को मानता है, मातृभूमि को मानता है, वह हिंदू है। हमारी विविधता उसी एकता से निकली है। विविधता उसका श्रृंगार है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इंडो ईरानियन प्लेट पर रहने वालों का 40 हजार वर्ष से डीएनए एक है।

भारतवर्ष में सभी हिंदू हैं। संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करने की जो कार्यपद्धित है, वह संघ की अपनी है, अनोखी है। एक घंटा सब भूलकर देश के लिए चिंतन करना ही संघ की शाखा है। हमें समाज का संगठन करना है, समाज के भीतर कोई प्रभावी संगठन नहीं खड़ा करना है। अच्छे काम, निस्वार्थ बुद्धि से किए जाने वाले सभी कार्यों में हम सहयोग करते हैं। संघ से तैयार हुए स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। अच्छे काम के लिए संघ सबकी सहायता करता है।

ईश्वरीय कार्य

विचारों की स्पर्धा हो सकती है, लेकिन सबका मन एक रहना जरूरी है। अमेरिका में अब्राहम लिंकन ने अपने विरोधी को रक्षा मंत्री बनाकर एकता सूत्र को बढ़ाया। संघ का काम मित्रता के आधार पर शुद्ध सात्विक कार्य है। संघ का सही से पता तब चलेगा जब आप संघ की शाखा में प्रत्यक्ष आकर देखेंगे और समझेंगे। स्वयंसेवक सभी क्षेत्रों में कार्य करते हैं। संघ किसी का नियंत्रण नहीं करता- न बाहर से, न अंदर से। संघ को अंदर से देखना आवश्यक है। डॉ. हेडगेवार नहीं होते तो संघ नहीं होता। संघ को समझने के लिए उनका चरित्र जरूर पढ़ना चाहिए।

संघ अपनी स्थापना के दिवस से ही सामूहिकता के भाव से चलता है। संघ एक सामूहिक कार्यपद्धति है। हिंदुस्थान हिंदू राष्ट्र है; डॉ. हेडगेवार के समय में इसकी मान्यता नहीं थी। उस समय वे हिंदू समाज के संगठन के लिए खड़े हुए। अत्यंत विपरीत परिस्थिति में, आर्थिक रूप से बेहद अभावग्रस्त होने के बावजूद शुद्ध अंतःकरण, निस्वार्थ बुद्धि से डॉ. हेडगेवार ने संघ का कार्य प्रारंभ किया। समाज के स्नेह के भरोसे संघ आगे बढ़ा। यह ईश्वरीय कार्य है।

दुनिया के किसी स्वयंसेवी संगठन का इतना विरोध नहीं हुआ, जितना संघ का हुआ। हमले हुए और हत्या भी हुई, लेकिन स्वयंसेवक आगे बढ़े। एक भी स्वयंसेवक के मन में इसको लेकर कटुता का भाव नहीं है।

संघ गुरु दक्षिणा से चलता है। बाहर से कुछ नहीं लेते, स्वयंसेवक सब चलाते हैं। संघ आर्थिक रूप से स्वावलंबी है। पाई-पाई का हिसाब रखा जाता है और ऑडिट होता है। भारत के कुल पौने सात लाख गांवों में से सवा लाख स्थानों में संघ है। 45,000 शहरों-नगरों में अभी हम आधे में पहुंचे हैं और आधे में पहुंचना है। विरोध के वातावरण में हम सजग रहते थे। अब अनुकूलता के वातावरण में हमें तेज गति से कार्य का विस्तार करना है। कार्यकर्ताओं की गुणवत्ता का सुदृढ़ीकरण हमारे शताब्दी वर्ष का एजेंडा है।

अपने घर का पैसा लगाकर बिना प्रसिद्धि के ही समाज की सेवा में लगे लोगों की बड़ी संख्या है। हम इसे समाज की सज्जन शक्ति कहते हैं। समाज की सज्जन शक्ति का नेटवर्क स्थापित करना, परस्पर समन्वय करना और इनमें पूरकता लाने के कार्य में संघ साथ रहेगा। देशव्यापी कार्यकर्ताओं के आधार पर संपूर्ण समाज में आचरण का परिवर्तन करने का समय आ गया है।

पंच परिवर्तन

आचरण अर्थात् आदत में परिवर्तन करने की पांच बातों को स्वयंसेवक पहले अपने जीवन में लाएं, इसकी शुरुआत हमने संघ के शताब्दी वर्ष में की है। ये पांच विषय हैं-
सामाजिक समरसता : मंदिर, पानी, श्मशान सब हिंदुओं के लिए समान हैं।
कुटुम्ब प्रबोधन : परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर संवाद होना चाहिए। सप्ताह में एक दिन नियत समय पर परिवार के सभी सदस्यों को एकत्र आना। साथ बैठकर बिना मीनमेख निकाले भोजन करना, भजन करना। और चार घंटे के समय में अपने कुटुम्ब, अपनी परंपरा की चर्चा करना।
पर्यावरण : पर्यावरण संरक्षण की चर्चा बहुत होती है पर वह चर्चा कृति में नहीं आती। इसके लिए छोटे-छोटे उपाय हम स्वयं से करें। अपना घर स्वच्छ रहना चाहिए और सामने का रास्ता भी। पानी बचाओ, सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग, छत पर पेड़-पौधे लगाओ।
स्वदेशी : स्वावलंबन और रोजगार के साथ आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी वस्तुओं को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। स्वयं का बोध होना चाहिए कि हम कौन हैं। अपने आचरण में स्वदेशी भाषा, भ्रमण, भेष, भोजन और भवन होना चाहिए।
संविधान : प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य, मार्गदर्शक तत्व और नागरिक अधिकार हमें अपने बच्चों को पढ़ाने चाहिए। संविधान निर्माताओं के हिंदू मन का भाव संविधान में प्रकट होता है।

इन पांच परिवर्तनों की पहल को लेकर हम समाज में जाने वाले हैं। संघ संपूर्ण समाज को अपना मानता है। इस अपनत्व के आधार पर हम सब एक हों। सब शाखा में आएं यह आवश्यक नहीं। आएं तो अच्छा ही है, क्योंकि संघ की शाखा के समान नि:स्वार्थ बुद्धि और प्रामाणिकता का प्रशिक्षण देने वाली दूसरी कोई कार्यप्रणाली नहीं है। संघ श्रेय लेने के लिए काम नहीं करता है।

Topics: सर्वसमावेशकगुरु दक्षिणाअंतर्निहित एकता‘व्यक्ति निर्माण’विश्वगुरुहिंदू राष्ट्रसनातनपथसंचलनशाखापाञ्चजन्य विशेषशताब्दी वर्षस्वयंसेवकसरसंघचालक
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