सुनने में वामपंथियों को बुरा लगेगा, लेकिन यह ऐतिहासिक अकाट्य तथ्य है कि इस्लाम का विस्तार जिहाद से ही हुआ है। इस्लाम अपनी शिक्षाओं, सेवा या चैरिटी से नहीं फैला। इस्लाम दुनिया के जिस देश में प्रवेश करता है, वहां दूसरे संप्रदायों को निगल जाता है। यह इस्लाम का मूल स्वभाव है। जो यह कहते हैं कि अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी से इस्लामी कट्टरपंथ का जन्म होता है, वे या तो मूर्ख हैं या फिर इस्लामी जिहाद को हिजाब पहनाना चाहते हैं।
बांग्लादेश की जनता के पास एक ऐसी सरकार थी, जिसने गरीबी को 80 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया। यानी, देश की 80 प्रतिशत आबादी गरीबी से बाहर आई। प्रति व्यक्ति आय 700 डॉलर से चार गुना बढ़कर 2800 डॉलर हो गई। जीडीपी दर सौ अरब डॉलर से छलांग मारकर 460 अरब डॉलर दर जा पहुंची। देश गरीब से उभरती अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आ गया। बांग्लादेश दुनिया की कपड़ा फैक्ट्री बन गया, लेकिन बांग्लादेश की जनता ने क्या चुना? ऐसी कट्टरपंथी इस्लामिक व्यवस्था, जो दूसरे किसी भी समुदाय का जीने का अधिकार छीन ले। विकास की राह पर चलता बांग्लादेश अचानक जिहाद की फैक्ट्री बन गया। दुनिया की तमाम खुफिया एजेंसियों का ‘प्ले ग्राउंड’ बन गया। चीन, अमेरिका और पाकिस्तान की भारत विरोधी रणनीति का केंद्र बन गया।
लीबिया, इराक, सीरिया, पाकिस्तान या फिर बांग्लादेश, सभी इस्लामी देशों की राह कमोबेश एक जैसी है। इन्हें न जाने क्यों प्रगति, प्रगतिशील नेतृत्व, जीवन स्तर में सुधार रास नहीं आता। जुलाई 2024 की गर्मियों में कमोबेश बांग्लादेश के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से उन्मादियों के झुंड निकले। इस बात पर तमाम किस्म की कयासबाजी हो सकती है कि इसके पीछे कौन सी ताकत थी, लेकिन सत्य यही है कि बांग्लादेश के युवाओं ने अपने मुल्क की तस्वीर बदल डालने वाली शेख हसीना का ही तख्ता उखाड़ फेंका। 2009 से 2024 तक शेख हसीना के कार्यकाल पर मुख्य आरोप यही था कि वह ‘भारत परस्त’ हैं। एक ‘काफिर’ मुल्क के साथ दोस्ती रखती हैं। नोबेल, मैग्सेसे जैसे पुरस्कारों के दम पर दुनिया भर में डीप स्टेट द्वारा तैयार की गई कठपुतलियों में से एक मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश के सीईओ बन गए। लेकिन यह महज सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह बांग्लादेश का जिहाद, इस्लामी कट्टरपंथ और दुनिया की बड़ी ताकतों की चालबाजियों की अंधकारभरी सुरंग में प्रवेश था। बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति, कैसे बांग्लादेश का निजाम और अवाम भारत के खिलाफ है, इसके क्या खतरे हैं, साथ ही भारत के पास क्या विकल्प हैं, इस जटिल स्थिति को समझने के लिए तीन चरण हैं-

चरण 1- जिहादी जाल
बांग्लादेश में मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस कट्टरपंथियों के हाथ की कठपुतली भर नहीं हैं। वह एक कट्टरपंथी खेमे के मुखिया हैं। उनके विश्व विख्यात बैंकिंग नेटवर्क की कुल जमा खासियत जिहादियों का पोषण रही, यह सामने आ चुका है। फिलहाल यह देखना जरूरी है कि बांग्लादेश के जिहादी रैवेये के पीछे कौन-सी ताकते हैं। पहला नंबर जमात-ए-इस्लामी (बांग्लादेश), जेईआई का है। यह वही कुख्यात संगठन है, जिसने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का समर्थन किया था। जेईआई के कारकुन उस समय बांग्लादेशी जनता पर जुल्म ढाती पाकिस्तानी सेना के गाइड थे। शेख हसीना ने जेईआई को बहुत सख्ती से कुचला, लेकिन इसकी जड़ें मस्जिदों व मदरसों के जरिये बहुत गहरी थीं। मोहम्मद यूनुस के समय में यह बहुत बड़ी ताकत के रूप में सामने आया है।
जेईआई पाकिस्तान और अन्य इस्लामी मुल्कों को बांग्लादेश का स्वाभाविक साझीदार मानता है। यह शरिया कानून का हिमायती है। जेईआई मूल इस्लामी सिद्धातों में यकीन रखता है। यह उस विचारधारा का हामी है, जो कहती है कि काफिर का तब तक उत्पीड़न करो, जब तक वह इस्लाम में अकीदा न ले आए या फिर मर न जाए। बांग्लादेश में ईश निंदा के नाम पर होने वाले हिंदुओं के कत्ल, हिंदुओं के घरों, व्यापार और धर्मस्थलों पर हमले में मुख्य किरदार जेईएल ही है। जेईआई वह संगठन है, जो वृहद् बांग्लादेश की थ्योरी लेकर सामने आया। उसका मानना है कि पूर्वोत्तर भारत इस्लाम के विस्तार का स्वाभाविक क्षेत्र है। यह वही विचारधारा है, जो बांग्लादेश की सीमा के इस तरफ यानी भारत में भी है। शरजील इमाम हो या फिर हाल ही में मारा गया उस्मान हादी, विचार एक ही है। चिकन नेक पर कब्जा करके शेष पूर्वोत्तर भारत का संपर्क काटना और उसे इस्लाम के परचम तले लाना। जमात का असर बांग्लादेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में किस कदर है, यह 2024 में हुए तख्तापलट में सामने आया। इससे पहले माना जाता था कि जमात सिर्फ मदरसों तक सीमित है, लेकिन अब यह हकीकत है कि बांग्लादेश के विश्वविद्यालयों में जमात का गहरा असर है।
एक और रक्तबीज है-हिफाजत-ए-इस्लाम (एचईआई)। यह संगठन दीनी मदरसों में फैला है। इसकी विचारधारा वही मध्ययुगीन इस्लामी स्वरूप है, जिसमें महिलाओं या अन्य पंथों को जीने की आजादी तक नहीं है। यह चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन इसका असर इतना है कि चुनावी नतीजों को यह प्रभावित करेगा। एचईआई भारत को हिंदू राष्ट्र कहता है। सीएए और एनआरसी पर नफरत फैलाने में यह काफी सक्रिय था। पिछले एक साल में एक अन्य संगठन ने भी बांग्लादेश में अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली हैं। यह है जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी)। यह एक घोषित आतंकी संगठन है, जो अल-कायदा से जुड़ा है। भारत में इसके तमाम स्लीपर मॉड्यूल पकड़े जा चुके हैं। यह बड़े पैमाने पर जिहादी भर्ती कर रहा है। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और झारखंड तक इसका नेटवर्क है। इसकी रणनीति वही है, जो पाकिस्तान परस्त आतंकी संगठनों की है। भारत में घुसपैठ, इसके बाद आतंकवादी हमले।

एक और अल-कायदा समर्थित आतंकी संगठन है अंसारुल्लाह बांग्ला टीम। इसने पिछले कुछ समय में बांग्लादेश के उदारवादी बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की हत्या के जरिये अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इसका इरादा भी भारत के मुसलमानों को जिहाद की राह पर लाने का है। इसका ऑनलाइन विंग खासा सक्रिय है। यह खासतौर पर शिक्षित मुस्लिम युवाओं को जिहाद के लिए उकसाता है। एक और संगठन है हिज्ब-उत-तहरीर। कहने को तो यह खुद को हिंसा से दूर बताता है, लेकिन मकसद खलीफा का राज कायम करना ही है। यह ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह वैचारिक रूप से जिहाद को फैला रहा है। बांग्लादेश के विश्वविद्यालयों और सोशल मीडिया पर इसका बहुत असर है। आईएसआई के बांग्लादेश फ्रंट ‘हूजी’ के बारे में तो सभी जानते हैं। यह भी शेख हसीना की सरकार जाने के बाद भारत में आतंकी हमलों की फिराक में है।
एक और कट्टरपंथी संगठन हिज्ब-उल-तहरीर (एचयूटी) भी खुलकर मैदान में है। खाड़ी और अन्य मुस्लिम देशों तक जड़ें रखने वाला यह संगठन युनूस सरकार में भी दखल रखता है। कहते हैं कि एचयूटी ने सत्ता परिवर्तन में भी अहम भूमिका निभाई है। खिलाफत की मांग करते हुए मार्च के महीने में इस संगठन ने पूरे देश में प्रदर्शन किए। मामला इसलिए गंभीर हो जाता है कि बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव है। शेख हसीना के हटने के बाद यह पहला चुनाव है। इस चुनाव में शेख हसीना की अवामी लीग भाग नहीं ले सकेगी। भारत विरोधी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), जो मुख्य पुराना दल है, चुनाव लड़ रहा है। इसकी कमान खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के हाथ में है। लेकिन जमात का असर इस कदर है कि बीएनपी भी इन कट्टरपंथियों के साथ तालमेल की कोशिश कर रही है। बदले माहौल में, जमात की शर्तों तले दबी बीएनपी भी शरिया शासन की वकालत कर रही है। एक नई पार्टी नेशनल सिटिजन पार्टी चुनाव मैदान में है। शेख हसीना का तख्ता पलटने वाले आंदोलन के कई नेता इससे जुड़े हैं।
हिफाजत-ए-इस्लामी भी चुनाव को प्रभावित कर रही है। जिहादी इरादे रखने वाली इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश का भी असर कट्टरपंथी मुसलमानों में है। वैसे हादी की मौत के बाद चुनाव टलने की आशंकाएं भी हैं। यह भी आरोप है कि यूनुस ने चुनाव टालने के लिए ही हादी की हत्या कराई है। चुनाव का कोई भी नतीजा हो या फिर यूनुस इन तरकीबों से सत्ता में बने रहे, यह तय है कि बांग्लादेश शरिया शासन में जा रहा है। कोई भी पार्टी सरकार में आए या यूनुस ही बने रहें, सबके अंदर बहुत गहरे तक भारत विरोध की भावना है। इनमें से कोई भी सरकार हिंदुओं के प्रति जिहादी भावना को कम करने वाली नहीं है। यानी, आने वाला समय बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए बहुत खतरनाक है।
चरण 2- दुनिया की ताकतों का अखाड़ा
पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए यह स्वर्णिम क्षण है। 1971 की हार और बांग्लादेश का अलग होना, पाकिस्तानी सेना के लिए ऐसा अपमान है, जो आज तक उनके जहन में है। इस तरह की खुफिया जानकारी है कि जनवरी 2025 में आईएसआई ने बांग्लादेश के साथ खुफिया समझौता किया है। इसके अलावा, अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आईएसआई ने अपनी पिट्ठू जमात को चुनाव मैदान में उतार रखा है। हिफाजत-ए-इस्लामी पर भी आईएसआई का असर बताया जाता है। इसके साथ आईएसआई रोहिंग्या शिविरों में भी सक्रिय है। आईएसआई ऐसा जाल बिछा रही है, जिससे बांग्लादेश चीन-पाकिस्तान ब्लॉक में हमेशा के लिए फंस जाए। बीएनपी के
साथ जमात के चुनावी गठबंधन को भी आईएसआई की चाल माना जा रहा है।
उधर, चीन की खुफिया एजेंसी एमएसएस आईएसआई के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से भी सक्रिय है। चीनी एजेंसी की रुचि बांग्लादेश के बंदरगाहों और समुद्री रास्तों में है। तमाम पोर्ट परियोजनाओं में एमएसएस के एजेंट सक्रिय हैं। चीन की रुचि आतंकवाद में कम, अपनी पकड़ बनाने में ज्यादा है। वह वही मॉडल इस्तेमाल कर रहा है, जो पाकिस्तान और अफ्रीका में किया था। बंदरगाह, पुल और सिविल परियोजनाओं में अपने हजारों कंसल्टेंट लगाकर चीन ने एक तरीके से बांग्लादेश में मजबूत आधार बना लिया है। यहां उसकी रुचि भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय आतंकी संगठनों के जरिये भारत के लिए सिरदर्द पैदा करने में भी है। चीनी एजेंसी राजनीतिक रूप से जमात को फंडिंग कर रही है और विध्वंसक रणनीति के तहत हूजी और पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों के संपर्क में है। चीन की रुचि यहां से बंगाल की खाड़ी में अंदमान के जरिये भारत के प्रभुत्व को कम करने की है।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भी इस मैदान में उतर चुकी है। मौजूदा ट्रंप प्रशासन को भारत की स्वतंत्र विदेश नीति रास नहीं आ रही है। डीप स्टेट भारत में अपनी पसंद की सत्ता चाहती है। सीआईए बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल अपने इस लक्ष्य के लिए कर सकती है। सीआईए की दूसरी मुख्य चुनौती यह है कि बांग्लादेश को पूरी तरह चीन के पाले में न जाने दिया जाए। बांग्लादेश के तख्तापलट में सीआईए के सत्ता पलट विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। साथ ही, मौजूदा मुख्य सलाहकार यूनूस को भी अमेरिकी प्रभाव वाला माना जाता है। सीआईए की रुचि यहां से भारत पर दबाव बनाने के साथ चीन को भी नियंत्रण में रखने में है। सीआईए को इस्लामी कट्टरपंथ और जिहाद से तब तक कोई दिक्कत नहीं है, जब तक इसकी आंच अमेरिकी हितों पर नहीं आ रही है। एनजीओ और मानवीय सहायता संगठनों के जरिये सीआईए रोहिंग्या शिविरों में भी सक्रिय है। यहां से वह चीन के गेम प्लान पर तो नजर रख ही रही है, साथ ही म्यांमार पर भी उसकी नजर है।
ढाका में एक अमेरिकी नागरिक की मौत से काफी सरगर्मी पैदा हुई है। यह अमेरिकी सार्वजनिक रूप से तो एक एनजीओ से जुड़ा था, लेकिन इसे सीआईए का असेट माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के दौरान इसकी रहस्यमयी मौत को लेकर कई तरह की कयासबाजी भी रही। तुर्की की खुफिया एजेंसी एमआईटी भी ढाका में सक्रिय है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन का सपना इस्लामी खिलाफत का है। सुन्नी नेतृत्व का सपना देखने वाले आज के तुर्की के तमाम एनजीओ रोहिंग्या शिविरों में सक्रिय हो गए हैं। तुर्की के प्रतिनिधिमंडल मजहबी सम्मेलन कर रहे हैं। भारत से शत्रुता का भाव रखने वाला तुर्की बांग्लादेश के तमाम कट्टरपंथी और आतंकी संगठनों के संपर्क में है।

चरण 3- भारत के सामने विकल्प
भारत की नजर बांग्लादेश के हर घटनाक्रम और वहां चल रही विदेशी गतिविधियों पर है। 1971 के बाद यह पहला मौका है, जब पाकिस्तानी सेना के अफसरों का ढाका में स्वागत हुआ है। भारत के लिए चिंताजनक बात यह है कि आईएसआई और पाकिस्तान बांग्लादेश के जिहादी मिजाज को भारत विरोधी और हिंदू विरोधी बनाने में लगा हुआ है। दीपू दास को जिंदा जलाने की घटना के बाद दुनिया भर के हिंदुओं में आक्रोश है। पाकिस्तान परस्त जमाती नेता भीड़ को यह समझाने में लगे हैं कि उनके जीवन की हर दिक्कत का कारण भारत और हिंदू हैं। हाल ही में बीएसएफ की बांग्लादेश के रेंजर्स के साथ उच्चस्तरीय बैठक हुई, तो इसमें भी बांग्लादेशी अफसरों के तेवर बदले हुए थे। उन्होंने सीमा पर बाड़बंदी के काम पर आपत्ति जताई। भारत-बांग्लादेश की कुल स्थलीय सीमा लगभग 4,096.7 किलोमीटर लंबी है। यह भारत की किसी भी एक देश के साथ सबसे लंबी सीमा है। पश्चिम बंगाल में 2,216 किलोमीटर, असम में 263 किमी, मेघालय में 443 किमी, त्रिपुरा में 856 किमी, मिजोरम में 318 किमी सीमा बांग्लादेश से लगती है। इनमें अधिकतर स्थानों पर उस तरह के सुरक्षा इंतजाम नहीं हैं, जैसे पाकिस्तान बार्डर पर हैं।
बांग्लादेश के कट्टरपंथी मौलाना पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और 24 परगना जिलों में खुलेआम तकरीरे कर रहे हैं। असम में सीएए और एनआरसी के खिलाफ माहौल में जहर घोलने की तैयारी है। इसके साथ ही संकेत मिलने लगे हैं कि बांग्लादेश सेना व आईएसआई उल्फा को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रही है। मेघालय और मिजोरम में भी स्थानीय गुटों को प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराए जा सकते हैं। हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच में कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, दिल्ली और मध्य प्रदेश में बांग्लादेशी संगठन एचयूटी की डिजिटल मौजूदगी नजर आई है। बांग्लादेश में लगभग 14 लाख रोहिंग्या भी मौजूद हैं। कॉक्स बाजार एरिया में आईएसआई और तुर्की की एमआईटी इनके बीच सक्रिय है। इस तरह की आशंका है कि इन कट्टरपंथी रोहिंग्याओं को प्रशिक्षण देकर असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के रास्ते भारत में धकेला जा सकता है। पहले ही बड़ी संख्या में रोहिंग्या घुसपैठिये देश के अलग-अलग हिस्सों में जमे हुए हैं।
भारत के सामने चुनौतियां अब कई तरह की हैं। एक ओर, जहां इस्लामी कट्टरपंथी बांग्लादेशी सेना और आईएसआई के साथ मिलकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, वहीं भारत के अंदर आतंकवाद की नई खेप पूर्वी सीमा से आ सकती है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी में चीन और पाकिस्तान की संयुक्त मौजूदगी इस क्षेत्र में नई सामरिक चुनौतियां पैदा करने वाली है। एक और अहम मसला है, बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले, जिसे भारत लंबे समय तक चुपचाप बैठे रहकर नहीं देख सकता।
भारत के पास कई विकल्प हैं। जैसे-बांग्लादेश चावल व अन्य खाद्यान्न के मामले में भारत पर निर्भर है, पर वह इसके नए चैनल खोज रहा है। इसके अलावा ऊर्जा व समुद्री मार्ग से व्यापार के मामले में भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत पर निर्भर है। नई दिल्ली को बांग्लादेश के मामले में बहुत फूंक-फूंककर कदम रखना होगा। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि दुनिया की कई ताकतें यहां से भारत पर निशाना साधने की फिराक में हैं।
पूर्वोत्तर में इन आतंकी गुटों से खतरा
उल्फा- यह असम में फिर सिर उठा सकता है। बांग्लादेश के ढाका और चटगांव में इसके सुरक्षित ठिकाने माने जाते हैं। शेख हसीना के समय में उल्फा के तमाम नेताओं का प्रत्यर्पण हुआ, लेकिन इन्हें फिर से हथियार व अन्य सहायता मिल सकती है।
नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड- इसका आधार भी बांग्लादेश में था। शेख हसीना के समय में लगातार कार्रवाई से यह बहुत कमजोर हो गया था। आईएसआई से इसके गठजोड़ के पुख्ता सुबूत हैं। यह पुराना नेटवर्क जिंदा हो सकता है।
एनएससीएन (आईएम और के गुट)- इस नागा गुट के ठिकाने म्यांमार में है। म्यामांर में दबाव बढ़ने और भारत द्वारा सर्जिकल कार्रवाई के कारण यह नया ठिकाना तलाश रहा है। चटगांव इलाके में इसके आधार बन सकते हैं। चीन और आईएसआई की मदद से इसे हथियार मिल सकते हैं।
केएलओ- उत्तरी बंगाल के इलाकों में इसके छिपने के ठिकाने और प्रशिक्षण शिविर रहे हैं। यह गुट भी सिर उठा सकता है।
रोहिंग्या नेटवर्क- रोहिंग्या नेटवर्क की पूर्वोत्तर के राज्यों में घुसपैठ हो सकती हैं। आईएसआई इन्हें हथियारबंद करने की कोशिश कर सकता है।

















