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होम मत अभिमत

अभिमत : ‘पूर्व सरकारों ने घुसपैठ को वैध बना दिया था’

बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा दशकों से पश्चिम बंगाल की राजनीति, जनसांख्यिकी और सुरक्षा से जुड़ा रहा है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद इस विषय पर नई बहस और नई नीतियों की चर्चा तेज हो गई है।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Jun 9, 2026, 08:45 pm IST
in मत अभिमत, पश्चिम बंगाल
सीमा पर माैजूद घुसपैठिए

सीमा पर माैजूद घुसपैठिए

बांग्लादेश लौटने के लिए बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कतार में खड़े होने की तस्वीरें पश्चिम बंगाल में बदलाव का संकेत हैं। पश्चिम बंगाल और उसके लोगों ने बांग्लादेश से इस तरह की घुसपैठ के खिलाफ उम्मीद लगभग छोड़ दी थी। उन्होंने देखा कि उनकी भूमि, दुर्लभ संसाधनों और आवास पर धीरे-धीरे ऐसे घुसपैठियों द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है, पहले वाम मोर्चा सरकार के पूर्ण संरक्षण के साथ और उसके बाद तृणमूल सरकार की मिलीभगत से। पश्चिम बंगाल के वास्तविक नागरिकों की पिछली आधी सदी बांग्लादेश से आए घुसपैठियों द्वारा बर्बाद कर दी गई, विशुद्ध रूप से वोट बैंक की राजनीति के लिए।

पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ का लंबा इतिहास रहा है। 1971 के युद्ध के दौरान अनुमानित एक करोड़ लोग पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए नरसंहार से बचने के लिए पूर्वी पाकिस्तान से भारत में शरण लेने आए थे। बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के बाद भी पश्चिम बंगाल में घुसपैठ लगातार जारी रही। उस समय बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और विकास की कमी घुसपैठ का मुख्य कारण थी। पश्चिम बंगाल में स्थिति और बदतर जब हुई जब जून 1977 में पहली बार माकपा-प्रभुत्व वाला वाम मोर्चा सत्ता में आया और मई 2011 तक सत्ता में बना रहा।

बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ के मुद्दे को 15 अगस्त 1975 को शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद के दौर से देखा जाना चाहिए। उनकी मृत्यु के बाद बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता में डूब गया और 1977 के तख्तापलट ने सेना प्रमुख जिया-उर-रहमान को सत्ता में ला दिया, जिन्होंने तत्कालीन सत्तारूढ़ अवामी लीग के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का गठन किया। आज उनके पुत्र तारिक रहमान प्रधानमंत्री हैं। मुजीबुर्रहमान युग के बाद बांग्लादेश में बंगाली पहचान की तुलना में इस्लामी पहचान पर अधिक जोर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश का धीरे-धीरे एक कट्टरपंथी इस्लामी राज्य में परिवर्तित हो गया। यह प्रवृत्ति तब और अधिक प्रमुख हो गई जब बीएनपी ने कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया। बांग्लादेश में जमात को हमेशा पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त रहा और इस प्रकार पाकिस्तान अप्रत्यक्ष रूप से बांग्लादेश में पैर जमाने में सफल रहा।

राजनीति, सीमा और घुसपैठ

पश्चिम बंगाल में सत्ता संरचना में परिवर्तन बांग्लादेश की सत्ता संरचना में बदलाव के साथ वर्ष 1977 में हुआ। इसके बाद भारत में, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, घुसपैठियों के चलन में बड़ा बदलाव आया। वर्ष 1977 में जिया-उर-रहमान चीन की यात्रा करने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष बने, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और रक्षा साझेदारी का मार्ग प्रशस्त हुआ। पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार का रुख चीन समर्थित अधिक था। इस प्रकार पाकिस्तान और चीन 1970 के दशक के उत्तरार्ध से ही बांग्लादेश के भीतर प्रभाव स्थापित करने में सक्षम हो गए। पाकिस्तान ने विशेष रूप से भारत-बांग्लादेश सीमा की भेद्यता का लाभ उठाकर कट्टरपंथी युवाओं की बड़ी संख्या को भारत में धकेला। बीएनपी सरकार के समय बांग्लादेश में सबसे अधिक उग्रवादी शिविर थे, जो भारत के उत्तर-पूर्व में आतंक फैलाते थे।

पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार को जल्द ही एहसास हो गया कि मुस्लिम घुसपैठिए उसके लिए एक अनुकूल वोट हैं, विशेषकर बांग्लादेश से सटे सीमावर्ती जिलों में। 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे को सत्ता में बनाए रखने में मुस्लिम वोट बैंक प्रमुख कारकों में से एक था, जो उसके 34 वर्ष के निर्बाध शासन का आधार बना। बांग्लादेश से घुसपैठ, विशेष रूप से मुसलमानों की घुसपैठ को बढ़ावा देने के लिए, वाम मोर्चा सरकार के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश सीमा के 2200 किलोमीटर में से केवल 500 किलोमीटर क्षेत्र में ही बाड़ लगाई गई थी। यह 500 किलोमीटर लंबी बाड़ भी निम्न गुणवत्ता की थी, जिसे घुसपैठिए आसानी से भेद सकते थे।

पश्चिम बंगाल : घुसपैठियों के वकील

यह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी जिसने वर्ष 2002 में ‘वन बॉर्डर, वन फोर्स’ नीति लागू की। इससे पहले अर्धसैनिक बलों को आवश्यकता के अनुसार भूमिकाएं सौंपी जाती थीं। परिणामस्वरूप भारत-बांग्लादेश सीमा अपेक्षाकृत उपेक्षित रही। जब 2002 की नीति लागू हुई, तब भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा बीएसएफ की जिम्मेदारी बनी। अपने सैन्य करियर के दौरान मैंने वर्ष 1995 के बाद से सिक्किम और पश्चिम बंगाल सहित भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में काफी समय बिताया है।

मेरे विभिन्न दौरों और जनसंपर्कों से यह स्पष्ट था कि पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने बांग्लादेश से घुसपैठ को लगभग वैध बना दिया था। उस समय कांग्रेस शासित असम में भी घुसपैठ की स्थिति कुछ ऐसी ही थी। हालांकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल सरकार बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ का विरोध करने के मुद्दे पर ही वर्ष 2011 में सत्ता में आई थी, लेकिन उसे जल्द ही ऐसे एक बंधे हुए वोट बैंक की चुनावी शक्ति का एहसास हो गया। तृणमूल सरकार को मुस्लिम समर्थक के रूप में देखा गया और पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों, विशेष रूप से मुसलमानों और रोहिंग्याओं को बढ़ावा देने में उसकी खासी भूमिका रही।

तृणमूल कांग्रेस बांग्लादेशी घुसपैठियों को फर्जी पहचान पत्र उपलब्ध कराने के लिए सिंडिकेट संचालित करने की हद तक चली गई। वास्तव में, बड़ी संख्या में घुसपैठियों के पास अब आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र सहित भारतीय नागरिकता के लगभग सभी सरकारी प्रमाण उपलब्ध हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अपना वोट बैंक खोने के डर से ही तृणमूल कांग्रेस ने वर्ष 2025 के बाद से चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का विरोध करना शुरू कर दिया था।

तृणमूल कांग्रेस ने बांग्लादेश से हाेने वाली घुसपैठ का दोष बीएसएफ पर मढ़ने की कोशिश की। जबकि तृणमूल ने ही अपने शासनकाल में बीएसएफ को सीमा पर बाड़बंदी करने के लिए भूमि का आवंटन करने से इनकार किया था। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने राज्य में घुसपैठ रोकने के लिए बीएसएफ को सशक्त बनाने की लगभग हर कोशिश का विरोध किया। बाद में केन्द्र सरकार के दबाव के कारण तृणमूल कांग्रेस ने सीमा बाड़बंदी के लिए छोटे-छोटे हिस्सों में भूमि आवंटन शुरू किया,लेकिन पूरी भूमि उपलब्ध नहीं कराई।

बंगाल से विशेष रिपोर्ट : सेंधमार सीमा से बाहर

नई सरकार और नई दिशा

सत्ता में आने के एक सप्ताह के भीतर ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बीएसएफ को सीमा पर बाड़बंदी के लिए 600 हेक्टेयर भूमि आवंटित कर दी है। बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ के प्रति पश्चिम बंगाल की नई सरकार का रवैया पिछली तृणमूल सरकार से बिल्कुल विपरीत है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार भविष्य में होने वाली किसी भी घुसपैठ के लिए एक बड़ी बाधा है। वे सभी सिंडिकेट, जो पहले घुसपैठ कराते थे अब गायब होते जा रहे हैं।

इस वर्ष मई में पश्चिम बंगाल में भाजपा की शानदार जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य के लोगों ने बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ मतदान किया है। यह वास्तव में खुशी की बात है कि बड़ी संख्या में घुसपैठिए अपने मूल देश लौटने के लिए भारत-बांग्लादेश सीमा पर कतार में खड़े हैं। हालांकि बांग्लादेश द्वारा उसके अपने ही नागरिकों को वापस लेने में यथासंभव देरी किए जाने की संभावना है। बांग्लादेश सरकार ने पहले भेजी गई घुसपैठियाें की सूची पर भारत सरकार के अनुरोध पर अभी तक निर्णय नहीं किया है।

केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ के मुद्दे से निपटने के अपने संकल्प पर दृढ़ हैं। आइए हम राष्ट्र की सुरक्षा और प्रगति के हित में घुसपैठ के खतरे को समाप्त करने के लिए हाथ मिलाएं और अपने देश के वास्तविक नागरिकों को समृद्धि तथा विकास में उनका उचित हिस्सा दिलाएं।

‘केंद्र शासित प्रदेश’ की मांग

Topics: वोट बैंक की राजनीतिजिया-उर-रहमानभारत-बांग्लादेशपाञ्चजन्य विशेषनागरिकतासीमा बाड़बंदीपश्चिम बंगालसीमा सुरक्षातृणमूल कांग्रेसघुसपैठ और सुरक्षाशुभेंदु अधिकारीबांग्लादेशी घुसपैBSFवाम मोर्चाकट्टरपंथी संगठनपहचान और दस्तावेजराष्ट्र की सुरक्षाफर्जी पहचान पत्र
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