भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सबसे संवेदनशील भू-भाग ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक)’ के आसपास अचानक हुई ज़मीन की खरीद-बिक्री ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की सीमाओं से सटे बिहार के किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड स्थित भेलागुड़ी मौजा में सेना के नए स्टेशन के लिए 189.68 एकड़ भूमि अधिग्रहण की तैयारी चल रही है। लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान दिल्ली और उत्तर प्रदेश के सात बाहरी लोगों द्वारा करीब 70.91 एकड़ जमीन की ताबड़तोड़ खरीद ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है।
सबसे चौंकाने वाला नाम कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का है, जिनके नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में 1.61 एकड़ भूमि की रजिस्ट्री दर्ज है। सवाल यह नहीं कि किसने जमीन खरीदी, बल्कि यह है कि आखिर सेना के प्रस्तावित प्रोजेक्ट की सुगबुगाहट के बीच इतनी बड़ी खरीदारी कैसे और क्यों हुई?
क्या अंदरूनी जानकारी का हुआ इस्तेमाल?
सरकारी दस्तावेजों और रजिस्ट्री की पड़ताल बताती है कि सैन्य स्टेशन की योजना आकार लेने के साथ ही बाहरी खरीदारों ने तेजी से जमीन खरीदनी शुरू कर दी। सामान्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में एक साथ इतनी बड़ी मात्रा में भूमि की खरीद-बिक्री असामान्य मानी जाती है। ऐसे में यह आशंका भी उठ रही है कि कहीं प्रस्तावित अधिग्रहण और संभावित सरकारी मुआवजे की जानकारी पहले से कुछ लोगों तक तो नहीं पहुंच गई थी।
किसने खरीदी कितनी जमीन?
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार प्रमुख खरीदारों में शामिल है। जिसमें मोहम्मद सलमान खान (दक्षिण दिल्ली) — 14.09 एकड़,मोहम्मद सुल्तान (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) — 13.93 एकड़,सुलेमान खान (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) — 13.12 एकड़,मोहम्मद शमीम (जसोला, दक्षिण दिल्ली) — 11.72 एकड़,मोहम्मद अनस (मऊ, उत्तर प्रदेश) — 9.05 एकड़,तश्कील अहमद (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) — 7.35 एकड़,राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) — 1.61 एकड़
कुल मिलाकर इन सात लोगों के नाम पर 70.91 एकड़ भूमि की खरीद दर्ज हुई है।
देश की सुरक्षा से जुड़ा इलाका, इसलिए बढ़ी संवेदनशीलता
भेलागुड़ी मौजा कोई सामान्य गांव नहीं है। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद निकट स्थित है, जिसे भारत की सामरिक सुरक्षा का सबसे संवेदनशील गलियारा माना जाता है। यही कॉरिडोर पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। ऐसे रणनीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करती है।
ठाकुरगंज के अंचलाधिकारी मृत्युंजय कुमार का कहना है कि फिलहाल भूमि अधिग्रहण की औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। अभी केवल संबंधित जमीनों की जांच, नापी और सत्यापन का कार्य चल रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही अधिग्रहण की औपचारिक कार्रवाई शुरू होगी।
सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है
असल तस्वीर तब साफ होगी, जब रक्षा मंत्रालय और जिला प्रशासन प्रस्तावित अधिग्रहण की अंतिम खाता-खेसरा (प्लॉट) सूची सार्वजनिक करेंगे। तभी यह स्पष्ट होगा कि जिन जमीनों की खरीद हुई है, वे वास्तव में सेना के प्रस्तावित स्टेशन की सीमा में आती हैं या नहीं। यदि खरीदी गई जमीनें अधिग्रहण क्षेत्र में शामिल पाई जाती हैं, तो कई गंभीर प्रश्न स्वतः खड़े होंगे—
- क्या भूमि अधिग्रहण की गोपनीय जानकारी पहले ही बाहर आ गई थी?
- क्या संभावित सरकारी मुआवजे के लाभ को ध्यान में रखकर यह खरीदारी की गई?
- क्या इतने संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीद की गहन जांच होनी चाहिए?
- क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीति?
फिलहाल इस मामले में किसी भी प्रकार की अनियमितता या अवैधता का आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि खरीदी गई सभी जमीनें प्रस्तावित सैन्य स्टेशन की सीमा में आती हैं या नहीं। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में भूमि खरीद का यह घटनाक्रम कई गंभीर सवाल छोड़ रहा है। अब सभी की निगाहें अंतिम अधिग्रहण सूची और संभावित जांच पर टिकी हैं, क्योंकि इनके सामने आने के बाद ही तय होगा कि यह महज संयोग था या फिर इसके पीछे कोई बड़ा खेल छिपा है।

















