भारत-चीन संबंधों पर अटल दृष्टि : China को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की नीति और चेतावनी
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भारत-चीन संबंधों पर अटल दृष्टि : China को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की नीति और चेतावनी

1950 के दशक में ही अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में चीन के इरादों पर सवाल उठाए थे। नेहरू युग की भूलों से लेकर मोदी काल की दृढ़ नीति तक, जानिए भारत-चीन संबंधों में अटल दृष्टि का महत्व।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Dec 24, 2025, 08:00 am IST
inभारत, विश्लेषण

1950 के दशक के अंत में ही पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के मंच से चीन के इरादों को लेकर स्पष्ट और निर्भीक सवाल उठाए थे। उन्होंने न केवल तत्कालीन नेहरू सरकार की चीन नीति पर सवाल खड़े किए, बल्कि रक्षा मंत्री के दृष्टिकोण पर भी संदेह जताया। उस दौर में यह राजनीतिक साहस साधारण बात नहीं थी।

भारत की चीन नीति का स्मरण

जब भी अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती आती है, उनकी चीन नीति स्वतः स्मरण हो जाती है। अटल जी चाहते थे कि भारत-चीन सीमा विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से हो, लेकिन किसी भ्रम या आत्ममुग्धता के बिना। उनकी नीति का मूल था—शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, लेकिन चीन की विस्तारवादी मानसिकता की पूरी समझ के साथ।

सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और चीन की असलियत

आजादी के तुरंत बाद ही सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी चीन के इरादों को भांप चुके थे। उन्होंने बार-बार नेहरू सरकार को चेताया, लेकिन वह चेतावनियां नजरअंदाज कर दी गईं। यही वह ऐतिहासिक चूक थी, जिसने आगे चलकर 1962 के युद्ध की भूमिका तैयार की।

नेहरू सरकार की रूमानियत और उसकी कीमत

यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि संसद में उठे सवालों और नेताओं के पत्रों के बावजूद नेहरू सरकार अपनी चीन-प्रेमी रूमानियत से बाहर नहीं आ सकी। संभवतः इसी वजह से चीन को यह गलतफहमी हुई कि भारत का नेतृत्व हमेशा नरम रहेगा। डोकलाम, गलवान और तवांग में भारत के सख्त रुख ने इस भ्रम को तोड़ने का काम किया।

चीन की तानाशाही और उसकी कमजोरी

आज दुनिया जानती है कि चीन की तानाशाही व्यवस्था जितनी बाहर से कठोर दिखती है, भीतर से उतनी ही असुरक्षित है। तिब्बत, तियानआनमेन और ताइवान जैसे मुद्दों पर चीन की झिझक उसके डर को उजागर करती है। आम नागरिकों के विरोध से घबराने वाला तंत्र भारत जैसे लोकतंत्र से आंख मिलाने में सहज नहीं हो सकता।

पोकरण-2 और अटल जी की रणनीतिक स्पष्टता

पोकरण-2 परमाणु परीक्षण अटल जी की चीन को समझने वाली दीर्घकालिक रणनीति का परिणाम था। उद्देश्य स्पष्ट था—भारत को ऐसी स्थिति में लाना कि चीन कभी परमाणु धमकी देने का साहस न कर सके। इसके बावजूद अटल जी चाहते थे कि सभी विवाद संवाद और कूटनीति से सुलझें।

सीमा विवाद पर वार्ता और चीन की समय-नीति

अटल जी के प्रयासों से एक समय ऐसा भी आया जब भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने के लिए विशेष दूत प्रणाली पर सहमति बनी। लेकिन चीन ने इसे भी केवल समय बिताने का औजार बना लिया। यह चीन की पुरानी कूटनीतिक शैली का उदाहरण रहा है।

वैश्विक दृष्टि में अटल बिहारी वाजपेयी की चीन नीति

चाइना रिफॉर्म फोरम से जुड़े मा जियाली ने 2018 में लिखा कि 1998 के परमाणु परीक्षण से लेकर 2003 की सीमा वार्ता प्रक्रिया तक भारत की चीन नीति के वास्तुकार अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी 2003 की चीन यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता आई और राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक सहयोग बढ़ा।

मोदी और वाजपेयी की नीति में निरंतरता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अटल जी की तरह भारत-चीन संबंध सामान्य करने के प्रयास किए हैं। यदि वाजपेयी चीन जाने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री थे, तो मोदी पांच बार चीन यात्रा करने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री हैं। यह नीति सावधानी, दृढ़ता और स्पष्टता का संतुलित उदाहरण है।

सौजन्य – पाञ्चजन्य आर्काइव

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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