1950 के दशक के अंत में ही पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के मंच से चीन के इरादों को लेकर स्पष्ट और निर्भीक सवाल उठाए थे। उन्होंने न केवल तत्कालीन नेहरू सरकार की चीन नीति पर सवाल खड़े किए, बल्कि रक्षा मंत्री के दृष्टिकोण पर भी संदेह जताया। उस दौर में यह राजनीतिक साहस साधारण बात नहीं थी।
भारत की चीन नीति का स्मरण
जब भी अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती आती है, उनकी चीन नीति स्वतः स्मरण हो जाती है। अटल जी चाहते थे कि भारत-चीन सीमा विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से हो, लेकिन किसी भ्रम या आत्ममुग्धता के बिना। उनकी नीति का मूल था—शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, लेकिन चीन की विस्तारवादी मानसिकता की पूरी समझ के साथ।
सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और चीन की असलियत
आजादी के तुरंत बाद ही सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी चीन के इरादों को भांप चुके थे। उन्होंने बार-बार नेहरू सरकार को चेताया, लेकिन वह चेतावनियां नजरअंदाज कर दी गईं। यही वह ऐतिहासिक चूक थी, जिसने आगे चलकर 1962 के युद्ध की भूमिका तैयार की।
नेहरू सरकार की रूमानियत और उसकी कीमत
यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि संसद में उठे सवालों और नेताओं के पत्रों के बावजूद नेहरू सरकार अपनी चीन-प्रेमी रूमानियत से बाहर नहीं आ सकी। संभवतः इसी वजह से चीन को यह गलतफहमी हुई कि भारत का नेतृत्व हमेशा नरम रहेगा। डोकलाम, गलवान और तवांग में भारत के सख्त रुख ने इस भ्रम को तोड़ने का काम किया।
चीन की तानाशाही और उसकी कमजोरी
आज दुनिया जानती है कि चीन की तानाशाही व्यवस्था जितनी बाहर से कठोर दिखती है, भीतर से उतनी ही असुरक्षित है। तिब्बत, तियानआनमेन और ताइवान जैसे मुद्दों पर चीन की झिझक उसके डर को उजागर करती है। आम नागरिकों के विरोध से घबराने वाला तंत्र भारत जैसे लोकतंत्र से आंख मिलाने में सहज नहीं हो सकता।
पोकरण-2 और अटल जी की रणनीतिक स्पष्टता
पोकरण-2 परमाणु परीक्षण अटल जी की चीन को समझने वाली दीर्घकालिक रणनीति का परिणाम था। उद्देश्य स्पष्ट था—भारत को ऐसी स्थिति में लाना कि चीन कभी परमाणु धमकी देने का साहस न कर सके। इसके बावजूद अटल जी चाहते थे कि सभी विवाद संवाद और कूटनीति से सुलझें।
सीमा विवाद पर वार्ता और चीन की समय-नीति
अटल जी के प्रयासों से एक समय ऐसा भी आया जब भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने के लिए विशेष दूत प्रणाली पर सहमति बनी। लेकिन चीन ने इसे भी केवल समय बिताने का औजार बना लिया। यह चीन की पुरानी कूटनीतिक शैली का उदाहरण रहा है।
वैश्विक दृष्टि में अटल बिहारी वाजपेयी की चीन नीति
चाइना रिफॉर्म फोरम से जुड़े मा जियाली ने 2018 में लिखा कि 1998 के परमाणु परीक्षण से लेकर 2003 की सीमा वार्ता प्रक्रिया तक भारत की चीन नीति के वास्तुकार अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी 2003 की चीन यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता आई और राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक सहयोग बढ़ा।
मोदी और वाजपेयी की नीति में निरंतरता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अटल जी की तरह भारत-चीन संबंध सामान्य करने के प्रयास किए हैं। यदि वाजपेयी चीन जाने वाले पहले भारतीय विदेश मंत्री थे, तो मोदी पांच बार चीन यात्रा करने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री हैं। यह नीति सावधानी, दृढ़ता और स्पष्टता का संतुलित उदाहरण है।
सौजन्य – पाञ्चजन्य आर्काइव

















