21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ‘राष्ट्र प्रथम’ (नेशन फर्स्ट) की विचारधारा वाली एक राजनीतिक पार्टी, ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की, जो बाद में ‘भारतीय जनता पार्टी’ (बीजेपी) के रूप में विकसित हुई। डॉ. मुखर्जी (जन्म: 6 जुलाई, 1901) की 125वीं जयंती मनाना एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण है। इन दो अहम घटनाओं को जोड़ने से एक ऐसे राष्ट्रवादी राजनीतिक विकल्प के विकास को समझने में मदद मिलती है, जो आज भारत की प्रमुख सत्ताधारी पार्टियों में से एक है। डॉ. मुखर्जी ने स्वतंत्रता के बाद की शुरुआती शासन व्यवस्था और एक सुव्यवस्थित राष्ट्रवादी राजनीतिक दृष्टिकोण के बीच एक आधारभूत कड़ी का काम किया। 1950 के ‘लियाकत-नेहरू समझौते’ के विरोध में भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद, डॉ. मुखर्जी ने भारत के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मूल्यों पर आधारित एक लोकतांत्रिक राजनीतिक विकल्प बनाने का लक्ष्य रखा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े सांस्कृतिक और बौद्धिक हस्तियों जिनमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी शामिल थे। डॉ. मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को ‘भारतीय जनसंघ’ (BJS) की स्थापना की। जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए उनके आह्वान, जिसमें उन्होंने कहा था कि “एक राष्ट्र में दो संविधान, दो नेता या दो झंडे नहीं हो सकते”, पार्टी की दिशा, दृष्टि और मूल सिद्धांतों को आकार दिया। 1953 में कश्मीर में डॉ. मुखर्जी के निधन ने देश की क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय एकता से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई। इसने आम लोगों के बीच देशभक्ति की भावना को जगाया और इस आंदोलन के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए एक मार्गदर्शक शक्ति का काम किया।
इस राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलन का विकास कई चरणों से होकर गुजरा
भारतीय जनसंघ ने 1951-52 के अपने पहले आम चुनाव में हिस्सा लिया और तीन सीटें जीतीं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानवदर्शन’ प्रस्तुत किया, जो पार्टी की प्रमुख वैचारिक अवधारणा बनी। इसमें भारतीय दर्शन को समकालीन सामाजिक और आर्थिक कल्याण की अवधारणाओं के साथ जोड़ा गया। 1967 में BJS कई राज्यों में गठबंधन सरकारों का हिस्सा बना। 1975 से 1977 के बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का जनसंघ ने कड़ा विरोध किया और लोकतंत्र की बहाली के लिए काम किया। इस दौरान आपातकालीन शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए, 1977 में जनसंघ कई दलों से मिलकर बनी ‘जनता पार्टी’ में शामिल हो गया। इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रमुख नेता केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बने।
जनता पार्टी के साथ मतभेदों के बाद, जनसंघ के पूर्व सदस्यों ने अलग होकर ‘भारतीय जनता पार्टी’ (BJP) का गठन किया, जिसके संस्थापक अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने। 1984 में केवल दो सीटों से शुरुआत करने के बाद, लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को मजबूती से अपनाया और हिंदुत्व के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। साथ ही, पार्टी ने पूरे देश में ‘राम जन्मभूमि आंदोलन’ का नेतृत्व किया। पार्टी तेजी से आगे बढ़ी और 1996 के आम चुनावों में सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने यह साबित कर दिया कि गैर-कांग्रेसी गठबंधन भी अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सकता है। साथ ही, इस सरकार ने परमाणु क्षमताओं, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढाँचे के विकास को भी बढ़ावा दिया।
वर्तमान में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया। इसके साथ ही, पार्टी ने डॉ. मुखर्जी के दृष्टिकोण और 1951 की ‘राष्ट्र प्रथम’ विचारधारा से जुड़े अपने प्रमुख वादों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाए, जिनमें 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करना भी शामिल है। मोदी के शासनकाल में भाजपा ने वंशवादी राजनीति और वोट बैंक की राजनीति के विकल्प के रूप में अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है।
आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक ढाँचा
1950 के दशक में, भारत का आर्थिक ढाँचा मुख्य रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ से तय हुआ था, जिनमें केंद्रीय नियोजन और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व पर बहुत जोर दिया गया था। इसके विपरीत, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व वाले ‘जनसंघ’ ने, जिसकी विचारधारा को बाद में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने आगे बढ़ाया, एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया-
राज्य समाजवाद और केंद्रीकरण का विरोध: जनसंघ ने सोवियत शैली की सरकारी नियोजन प्रणाली की आलोचना की। उसका तर्क था कि सरकार का अत्यधिक नियंत्रण नौकरशाही में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है और व्यक्तिगत उद्यमशीलता में बाधा डालता है।
छोटे उद्योगों और कृषि पर जोर: 1950 के दशक के अपने घोषणापत्रों में, जनसंघ ने बड़े सरकारी भारी उद्योगों के बजाय कृषि, छोटे ग्रामीण उद्योगों और स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देने की वकालत की।
स्वदेशी (आत्मनिर्भरता): विदेशी कर्ज और सहायता पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ समय बाद ही देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था।
व्यापारियों और छोटे व्यवसायों का समर्थन: बढ़ते सरकारी करों और लाइसेंसिंग की जटिलताओं के बीच, जनसंघ ने खुद को छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और स्वरोजगार करने वाले लोगों के समर्थक के रूप में स्थापित किया।
‘स्वदेशी’ और ‘अंत्योदय’ (समाज के सबसे वंचित वर्ग तक पहुँचना) जैसे अपने मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए, आज की भाजपा ने 21वीं सदी की वैश्वीकृत और तकनीक-प्रधान अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है।
व्यावहारिक बाजार अर्थव्यवस्था: आधुनिक भाजपा की नीतियाँ बाजारोन्मुख विकास को सरकारी भागीदारी के साथ जोड़ती हैं। ये निजी निवेश, विदेशी पूँजी और बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने के साथ-साथ सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे, जैसे राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क की बड़ी परियोजनाओं के लिए भी वित्तपोषण करती हैं।
आत्मनिर्भर भारत (स्वदेशी का नया रूप): 1950 के दशक में आत्मनिर्भरता की अवधारणा के विपरीत, वर्तमान ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल का लक्ष्य ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) जैसी योजनाओं के माध्यम से भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं (Global Supply Chains) में एक मजबूत भागीदार के रूप में स्थापित करना है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘इंडिया स्टैक’ के विकास और विस्तार को बढ़ावा दिया है, जिसमें आधार, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और डिजिलॉकर जैसी डिजिटल सेवाएँ शामिल हैं। इनके माध्यम से तकनीक का इस्तेमाल करके अर्थव्यवस्था को अधिक औपचारिक बनाने और सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में होने वाली कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया है।
पूँजीगत व्यय और आपूर्ति-पक्षीय सुधार: वर्तमान नीतियों में पूँजीगत निवेश, कर सुधारों (जैसे कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती और वस्तु एवं सेवा कर यानी GST की व्यवस्था) तथा वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है। ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अब केवल एक सामुदायिक और स्वैच्छिक विचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से भी आगे बढ़ाया जा रहा है। इन योजनाओं के जरिए लाखों परिवारों को आवास, स्वच्छता, बिजली और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।
ऐतिहासिक रूप से, भारत में चुनावी रणनीतियाँ अक्सर विशिष्ट जातिगत गठबंधनों और मंडल राजनीति पर आधारित रही हैं। भाजपा ने ‘लाभार्थी’ वर्ग के रूप में एक ऐसे मतदाता समूह को विकसित करने का प्रयास किया है, जो जातिगत सीमाओं से परे जाकर सरकारी योजनाओं से सीधे लाभ प्राप्त करने वाले लोगों पर केंद्रित है। इसमें वे लोग शामिल हैं जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छता सुविधाओं, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और पीएम-किसान जैसी योजनाओं से लाभ मिला है।
भाजपा ने ‘पन्ना प्रमुख’ (मतदाता सूची के एक पन्ने के प्रभारी) के स्तर तक लोगों को संगठित करके और वास्तविक समय में डिजिटल संचार का उपयोग करके एक व्यापक संगठनात्मक ढाँचा तैयार किया है। इससे पार्टी को लगातार चुनावी संपर्क बनाए रखने में मदद मिली है। आधार-आधारित पहचान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से सब्सिडी, पेंशन और अन्य सहायता राशि सीधे बैंक खातों में भेजकर, सरकार ने नागरिकों और कल्याणकारी योजनाओं के बीच सीधा संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है। इससे योजनाओं के वितरण में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने में मदद मिली है।
कल्याणकारी योजनाओं को केवल राजनीतिक लाभ के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय, सरकार ने ‘संतृप्ति’ की रणनीति अपनाई, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्धारित योजनाओं का लाभ प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक पहुँचे। साथ ही, सरकार ने नीतिगत चर्चाओं के बजाय ‘सेवा वितरण’ यानी लोगों तक सुविधाएँ पहुँचाने पर अधिक जोर दिया है। वर्षों तक, राजनीतिक विरोधी भाजपा की मुख्य विचारधारा को केवल चुनावी रणनीति मानते रहे और उनका तर्क था कि गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों के कारण ये वादे पूरे नहीं हो पाएँगे। लेकिन मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद, भाजपा ने अपने ऐतिहासिक वैचारिक, संवैधानिक और राष्ट्रीय एजेंडे के कई प्रमुख मुद्दों पर कदम उठाए:
अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करना (2019): इस कदम से जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त हुआ और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में पुनर्गठित किया गया। इसे 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा उठाए गए उस मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण एकीकरण की वकालत की थी।
राम मंदिर का निर्माण (2024): अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा ने सांस्कृतिक महत्व वाले एक लंबे समय से चले आ रहे आंदोलन के एक प्रमुख चरण को पूरा किया। इस घटनाक्रम ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में और अधिक प्रमुखता दिलाई।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA): इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के पात्र व्यक्तियों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विशेष प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने इसे पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न का सामना करने वाले अल्पसंख्यकों को राहत देने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया है।
बुनियादी ढाँचे को राजनीतिक पूँजी बनाना: राजमार्गों का निर्माण, हाई-स्पीड रेल, हवाई अड्डों का विस्तार और डिजिटल बुनियादी ढाँचे का विकास अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक मामले नहीं रह गए हैं, बल्कि चुनावी अभियानों का प्रमुख हिस्सा भी बन गए हैं।
विदेश नीति को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ना: विदेश नीति का इस्तेमाल घरेलू राजनीति में राष्ट्रीय गौरव का संदेश देने के लिए भी किया गया है। G20 की अध्यक्षता जैसी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी नीतियों को मतदाताओं के सामने वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘विश्वमित्र’ की अवधारणा भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
पूर्वोत्तर जैसे उन क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाकर, जहाँ पहले भाजपा की उपस्थिति अपेक्षाकृत सीमित थी, तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और दलितों जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़कर, भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव जीतने के लिए अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार का विस्तार किया है। इसके जवाब में, विपक्षी दलों ने भी एकजुट होकर ‘इंडिया’ गठबंधन बनाया, ताकि वे भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के मेल को चुनौती दे सकें। अब समय आ गया है कि भाजपा 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में मजबूती से आगे बढ़े और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस दृष्टिकोण को ध्यान में रखे, जिसमें उन्होंने एक सशक्त, एकजुट और आत्मनिर्भर राष्ट्र की परिकल्पना की थी।
















