भारत में सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से बच्चों और किशोरों में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही है, जिससे अभिभावक काफी चिंतित हैं। अत्यधिक स्क्रीन समय से नींद की गुणवत्ता में कमी, अकादमिक प्रदर्शन में गिरावट, अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी के मामले देखे जा रहे हैं। साथ ही इससे आउटडोर खेल और शारीरिक गतिविधियों में भी कमी आई है। लोकल सर्कल्स के 302 शहरी जिलों में किए गए हालिया सर्वे के मुताबिक, ज्यादातर भारतीय माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे हर दिन तीन घंटे या उससे ज्यादा समय सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन गेम्स पर बिता रहे हैं।
नए नियम काफी नहीं
केंद्र सरकार ने पिछले माह डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन (DPDP) नियम, 2025 को अधिसूचित किया, जिससे बच्चों को सोशल मीडिया के हानिकारक प्रभावों से बचाने की उम्मीदें जगी। लेकिन मौजूदा सुरक्षा उपाय बच्चों को सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन गेमिंग के खतरों से बचाने के लिए काफी नहीं होंगे। ये नतीजे ऐसे समय में आए हैं जब डिजिटल एक्सेस तेजी से बढ़ रहा है, स्मार्टफोन सस्ते हो रहे हैं और बच्चे कम उम्र में ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इस नए नियम का उद्देश्य नाबालिगों के लिए माता-पिता की सहमति, बच्चों के डिजिटल डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें सोशल मीडिया एवं ओटीटी प्लेटफार्मों के अनियंत्रित उपयोग से बचाना है, लेकिन माता-पिता के लिए इन्हें लागू करना और उम्र का वेरिफिकेशन अभी भी बहुत बड़ी चिंता है।
शहरी बच्चों में स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा
सर्वे के अनुसार, 9 से 17 साल के बच्चों वाले 49 प्रतिशत शहरी माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे हर दिन औसतन तीन घंटे या उससे ज्यादा समय सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन गेमिंग पर बिता रहे हैं। चिंता की बात यह है कि 22 प्रतिशत माता-पिता बताते हैं कि उनके बच्चे रोजाना छह घंटे से ज्यादा स्क्रीन समय बिताते हैं। ऐसे बहुत कम माता-पिता हैं, जिनके बच्चे दिन में एक घंटे से भी कम समय ऑनलाइन बिताते हैं, जबकि कुछ मानते हैं कि उन्हें सही समय का पता नहीं है। वहीं, सर्वे में 25 प्रतिशत अभिभावक चाहते हैं कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से पहले माता-पिता की मंजूरी अनिवार्य की जानी चाहिए। शोध से यह भी पता चलता है कि डिजिटल एंटरटेनमेंट बच्चों की रोजाना की जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन गया है, जो आउटडोर खेल और परिवार के साथ बातचीत की जगह ले रहा है। इसकी वजह से बच्चे गुस्सैल, डिप्रेशन में, सुस्त और हाइपरएक्टिव हो रहे हैं।
इंटरनेट पर बच्चों की लत क्या?
सर्वे में शामिल अधिकतर माता-पिता मानते हैं कि उनके बच्चे एक या ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म के आदी हो गए हैं। लगभग 70 प्रतिशत लोगों का कहना है कि उनके बच्चों को वीडियो, ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब और स्ट्रीमिंग सर्विस की लत है। कई माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे हर दिन इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के लिए परेशान हो जाते हैं। सिर्फ 21 प्रतिशत माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे बताई गई किसी भी डिजिटल एक्टिविटी के आदी नहीं हैं।
व्यवहार, मानसिक स्वास्थ्य में बदलाव से माता-पिता चिंतित
माता-पिता का कहना है कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना सिर्फ टाइम-मैनेजमेंट की समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यवहार और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल रहा है। सर्वे से पता चलता है कि 61 प्रतिशत माता-पिता ने अपने बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ने की बात नोटिस की है, जबकि 58 प्रतिशत ने उनके गुस्सैल होने की बात स्वीकार की है। वहीं, 50 प्रतिशत का कहना है कि उनके बच्चे हाइपरएक्टिव हो गए हैं। इसके अलावा ज्यादातर माता-पिता ने डिप्रेशन और सुस्ती के लक्षण भी बताए हैं। बहुत कम माता-पिता का कहना है कि स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से उनके बच्चे पहले से खुश और ज्यादा सोशल हुए हैं। इससे पता चलता है कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने के फायदे से ज्यादा नुकसान हैं।
क्या करें
यह सच है कि भारत में स्क्रीन की लत के बढ़ते जोखिमों से निपटना एक जटिल चुनौती है, लेकिन बच्चों पर नियंत्रण, माता-पिता की निगरानी, स्कूल में सेमिनार आयोजित कर इसके नुकसान के बारे में बताकर इस पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

















