G RAM–G विधेयक : क्या सचमुच योजना का विरोध है, या राम का?
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G RAM–G विधेयक : क्या सचमुच योजना का विरोध है, या राम का?

मनरेगा का नया नाम VB–G RAM–G क्यों बना विवाद का केंद्र? नाम नहीं, राम की असहजता और वास्तविक नीति सुधार पर बहस।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Shivam Dixit
Dec 21, 2025, 08:00 am IST
in भारत, विश्लेषण

भारतीय राजनीति में कुछ बहसें समय-समय पर यह स्पष्ट कर देती हैं कि विवाद किसी एक नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सभ्यतागत प्रतीकों को लेकर चली आ रही वैचारिक असहजता का विस्तार है। मनरेगा के पुनर्गठन और उसके नए नाम ‘विकसित भारत–G RAM G’ पर उठे हंगामे ने यही संकेत दिया है। यदि नाम विवाद से ऊपर उठकर तथ्यों को देखा जाए, तो प्रश्न स्वतः उभरता है क्या यह सचमुच योजना का विरोध है, या राम का?

नाम परिवर्तन – प्रशासनिक सुधार, न कि केवल प्रतीक

दो दशक पुराने मनरेगा ढांचे में समय के साथ लीकेज, भुगतान–देरी, फर्जी जॉब कार्ड जैसी समस्याएँ सामने आईं। नई व्यवस्था में रोजगार के दिन 100 से 125, डिजिटल उपस्थिति/DBT की सख्ती, परिसंपत्ति–निर्माण व आजीविका पर जोर, राज्य–जवाबदेही में वृद्धि जैसे संरचनात्मक सुधार किए गए हैं। स्पष्ट है यह केवल नाम बदलना नहीं, बल्कि नीति सुधार है।

विपक्ष का विरोध -नीति–विमर्श से अधिक प्रतीक–विवाद

यदि विरोध वित्तीय साझेदारी, कृषि–मौसम, या मजदूर–हित पर केंद्रित होता, तो वह नीतिगत कहलाता। लेकिन संसद में बहस का केंद्र बार-बार राम रहा, गांधी बनाम राम का कृत्रिम द्वंद्व, और धार्मिक राजनीति के आरोप। इससे यह शंका बलवती होती है कि विरोध का लक्ष्य कानून नहीं, नाम है।

ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में नामकरण की ऐतिहासिक असंतुलन की ओर ध्यान दिलाया। निशिकांत दुबे ने तीखे अंदाज़ में यह प्रश्न उठाया कि जब दशकों तक नीतिगत निर्णयों में गांधी का संदर्भ गौण रहा, तो आज अचानक ‘गांधी की याद’ क्यों?

गांधी–नेहरू–इंदिरा–राजीव के नाम पर व्यापक संरचनाएँ

आरटीआई और संसदीय आंकड़े एक स्पष्ट तस्वीर रखते हैं। देश में 600 से अधिक योजनाएं, संस्थान, पुरस्कार, भवन, ट्रॉफियाँ और छात्रवृत्तियाँ केवल नेहरू गांधी परिवार की तीन हस्तियों जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर संचालित रही हैं। 58 केंद्रीय योजनाओं में से 24 योजनाएं केवल इंदिरा और राजीव गांधी के नाम पर थीं। इसके अतिरिक्त 98 विश्वविद्यालय व शैक्षणिक संस्थान, 39 अस्पताल, 74 सड़क/भवन, 66 पुरस्कार–छात्रवृत्तियाँ, 47 खेल प्रतियोगिताएँ/ट्रॉफियाँ और 6 एयरपोर्ट/बंदरगाह यह संख्या किसी सामान्य सम्मान से आगे बढ़कर एक लगातार अपनाई गई राज्य-नीति की ओर संकेत करती है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि राज्य किसी एक परिवार या विचारधारा का विस्तार नहीं, बल्कि समाज की साझा स्मृति है। इसलिए सार्वजनिक योजनाएँ व्यक्ति-केन्द्रित नहीं, उद्देश्य-केन्द्रित होनी चाहिए; और नामकरण हो तो वह सर्वस्वीकृत, बहुलतावादी और ऐतिहासिक संतुलन के साथ हो। एक ही परिवार के नाम पर सैकड़ों संरचनाएँ सम्मान नहीं, बल्कि स्मृति का एकाधिकार बन जाती हैंजो अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 324 (निष्पक्ष चुनाव) की भावना के विपरीत राजनीतिक ब्रांडिंग को बढ़ावा देती हैं। योगदान अनेक महापुरुषों का रहा है , पटेल, आंबेडकर, सुभाष, शास्त्री, टैगोर, विवेकानंद, बिरसा मुंडा, सावित्रीबाई फुले सम्मान यदि एकरूप हो जाए तो इतिहास सिमट जाता है। अंततः, सुशासन नाम से नहीं, निष्पादन से आता है। राष्ट्र किसी परिवार की विरासत नहीं; सार्वजनिक योजनाएँ स्मारक नहीं, जन-सेवा का माध्यम हैं। इसलिए नाम कम, काम अधिक यही लोकतंत्र का स्वस्थ मार्ग है। दिक्कत नाम से नहीं, ‘राम’ से है।

राम : प्रतीक नहीं, सभ्यता — और असहजता की निरंतर परंपरा

भारतीय राजनीति में राम केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सभ्यतागत चेतना हैं। यही कारण है कि जब भी राम सार्वजनिक विमर्श या नीति से जुड़ते हैं, कांग्रेस की प्रतिक्रिया अक्सर नीतिगत कम और वैचारिक अधिक दिखाई देती है। इतिहास इसका साक्षी है। राम मंदिर का प्रश्न दशकों तक सत्ता में रहते हुए टाला गया। 1989 का शिलान्यास आधा-अधूरा रहा और 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी सांस्कृतिक उत्सव से दूरी बनी रही। 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा में शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति ने संदेश दिया- कानून स्वीकार्य है, राम का उत्सव नहीं। 2007 में राम सेतु पर UPA सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा कि राम ऐतिहासिक नहीं परियोजना-बचाव से आगे बढ़कर आस्था पर सरकारी प्रश्नचिह्न था। 2008–13 के बीच भगवा आतंक/हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों ने नैरेटिव-क्रिमिनलाइज़ेशन को बढ़ाया। कोविड काल में दीप-प्रतीकों का उपहास, कुंभ–कांवड़ पर चयनात्मक पर्यावरणीय नैरेटिव, मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण ये सब चयनात्मक सेक्युलरिज़्म का पैटर्न दिखाते हैं। इसी कड़ी में दीपोत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों पर महाभियोग के लिए हस्ताक्षर करना असहमति नहीं, बल्कि प्रतीकों के प्रति असहजता का तीखा उदाहरण है। आज VB–G RAM–G नाम पर हंगामा भी इसी परंपरा का विस्तार प्रतीत होता है, जहाँ नीति से अधिक ‘राम’ से चिढ़ दिखती है। राम किसी दल के नहीं सभ्यता के हैं। और जब असहजता बार-बार एक ही दिशा में दिखे, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

व्यक्ति–पूजा स्वीकार्य, ईश्वर–स्मरण अस्वीकार्य क्यों?

‘VB–G RAM–G’ विधेयक पर उठे विरोध ने एक पुराने वैचारिक विरोधाभास को उजागर किया है। भारतीय राजनीति में व्यक्ति–पूजा को अक्सर धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण माना गया, गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के नाम पर सैकड़ों योजनाएँ, विश्वविद्यालय, अस्पताल, सड़कें और एयरपोर्ट बिना आपत्ति के चलते रहे। इन्हें न कभी संविधान-विरोधी कहा गया, न धर्मनिरपेक्षता पर खतरा। पर जैसे ही राम, शिव या हनुमान जैसे सभ्यतागत/ईश्वरीय नाम आते हैं, अचानक धार्मिक राजनीति, संविधान का संकट और सेक्युलरिज़्म का शोर शुरू हो जाता है। प्रश्न सीधा है यदि व्यक्ति के नाम पर योजना स्वीकार्य है, तो ईश्वर के नाम पर क्यों नहीं? भारतीय दर्शन में ईश्वर–स्मरण विनम्रता और नैतिकता सिखाता है, जबकि व्यक्ति–पूजा सत्ता केंद्रित अहं को जन्म देती है। यदि नामकरण ही समस्या होती, तो गांधी–नेहरू–राजीव के नाम भी खटकते—पर ऐसा नहीं हुआ। इसलिए निष्कर्ष स्पष्ट है: दिक्कत नाम से नहीं, ‘राम’ से है। यह नीति-विरोध नहीं, चयनात्मक या कहें नकली सेक्युलरिज़्म का खुलासा है।

क्यों नई योजना वास्तविक बदलाव ला सकती है

किसी भी बड़े सुधार की शुरुआत में बहस अक्सर नाम और नीयत पर सिमट जाती है, जबकि इतिहास बताता है कि समाज का भविष्य शोर से नहीं, सुधार से तय होता है। यदि नाम-विवाद से ऊपर उठकर देखें, तो नई ग्रामीण रोजगार योजना केवल पुनर्नामकरण नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधार है, जो सही क्रियान्वयन के साथ गरीब और मजदूर की जिंदगी में ठोस बदलाव ला सकती है। सबसे बड़ा परिवर्तन रोजगार के दिनों का 100 से 125 होना है। इसका सीधा अर्थ है—अधिक काम, अधिक आय, कर्ज पर निर्भरता में कमी और मजबूरी में होने वाले पलायन पर रोक। यह सुधार सैद्धांतिक नहीं, बल्कि पेट भरने और बच्चों की पढ़ाई से जुड़ा व्यावहारिक बदलाव है। दूसरा बड़ा कदम डिजिटल प्रणाली है, जिससे मजदूरी सीधे बैंक खाते में जाएगी। फर्जी जॉब कार्ड और बिचौलियों पर अंकुश लगेगा और “काम कोई करे, पैसा कोई ले जाए” जैसी गड़बड़ियां कम होंगी। यह व्यवस्था गरीब के लिए सुरक्षा-कवच बन सकती है। खेती के मौसम और गैर-मौसम में काम का संतुलन किसान और मजदूर—दोनों के हित में है। इससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्राकृतिक चक्र के अनुरूप चलेगी। राज्यों की बढ़ी भागीदारी से स्थानीय जवाबदेही मजबूत होगी, जिससे भ्रष्टाचार पर वास्तविक नियंत्रण संभव है। यह योजना भ्रष्टाचार का दायरा सीमित करेगी और गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम साबित हो सकती है। अंततः, गरीब को नाम से नहीं, नीयत, नियोजन और निष्पादन से न्याय मिलता है और यह बदलाव उसी दिशा में एक सकारात्मक अवसर है।

नई योजना : गरीबों के लिए ‘राम’ एक निर्णायक निष्कर्ष

भारत के अनेक राज्यों में हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं और उनकी आय से प्रशासन व ऑडिट शुल्क वसूले जाते हैं—जैसे तमिलनाडु में लगभग 14% प्रशासन और 4% ऑडिट। यह निर्विवाद तथ्य है कि वर्षों से हिंदू आस्था से जुड़ा धन सार्वजनिक प्रशासनिक ढांचे में प्रवाहित होता रहा है। ऐसे में किसी जनकल्याणकारी योजना का नाम भगवान राम से जोड़ने पर आपत्ति तर्कसंगत नहीं है।

दशकों तक गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव जैसे व्यक्तियों के नाम पर योजनाएँ चलीं और उन्हें धर्मनिरपेक्ष माना गया। फिर राम नाम आते ही संवैधानिक संकट क्यों? संविधान धर्म-विरोधी नहीं, बल्कि सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का समर्थक है—जो सभी आस्थाओं के प्रति समान सम्मान की बात करता है।
‘राम’ यहाँ धर्म थोपने का प्रतीक नहीं, बल्कि न्याय, करुणा और प्रजा-हित के सार्वभौमिक मूल्यों की स्वीकृति है। इसलिए मनरेगा जैसे कार्यक्रम को ‘राम’ से जोड़ना कानूनी, तार्किक और नैतिक रूप से उचित—ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और गरीब के प्रति संकल्प है।

राम केवल किसी एक पंथ, पूजा-पद्धति या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं हैं। राम मर्यादा, न्याय, करुणा और प्रजा-हित के शाश्वत आदर्श हैं—ऐसे आदर्श, जिन पर किसी भी न्यायपूर्ण शासन और लोककल्याणकारी व्यवस्था की नींव रखी जा सकती है। यही कारण है कि राम भारतीय समाज की सभ्यतागत चेतना हैं, न कि केवल धार्मिक प्रतीक। महात्मा गांधी का राम भी यही था। वह मंदिर का राम नहीं था, बल्कि नैतिक चेतना का राम था जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने, दुर्बल के साथ खड़े होने और सत्ता को सेवा में बदलने की प्रेरणा देता है। हे राम गांधी के जीवन का अंतिम शब्द था—यह संयोग नहीं, बल्कि उनके विचारों की अंतिम घोषणा थी। यदि कोई नई योजना , गरीब को अधिक दिन रोजगार दे, मजदूर को समय पर और पूरा पारिश्रमिक दे, गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ले जाए, और भ्रष्टाचार के रास्ते बंद करे, तो वह योजना वास्तव में गरीबों के लिए ‘राम’ बनती है, एक ऐसा सहारा, जो संकट में संबल देता है और अन्याय के विरुद्ध ढाल बनता है। यही कारण है कि असली प्रश्न योजना के नाम का नहीं, उसके परिणाम का होना चाहिए। यदि व्यक्ति के नाम पर योजनाएँ दशकों से स्वीकार्य रही हैं, तो ईश्वर-स्मरण पर अचानक असहजता क्यों? क्या डर नाम से है, या उस नैतिकता से जो राम स्मरण कराता है?

आज आवश्यकता विरोध की नहीं, ईमानदार क्रियान्वयन की है। क्योंकि जब कोई योजना गरीब के जीवन में न्याय और करुणा उतारती है, तो उसका नाम ‘राम’ होना संविधान के विरुद्ध नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा न्याय, समानता और मानव गरिमा के पूर्णतः अनुरूप होता है।

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दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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